बौद्ध धर्म में गणपति के तीन रूप जिन्हे तिब्बत में पूजा जाता हैं...
By: Shikha
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भगवान गणेश को हमेशा से हिंदू धर्म से ही जोड़ा जाता रहा है. लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा.
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गणपति का कनेक्शन बौद्ध धर्म से भी है और बौद्ध धर्म में काफी पद्धति से इनका आह्वान किया जाता है.
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दरअसल, बौद्ध धर्म में हिंदू धर्म के लोगों की तरह ही गणेश भगवान को सबसे पहले बाधा हरने वाले देवता के रूप में पूजा जाना शुरु हुआ था.
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जिन्हें महारक्त गणपति कहा जाता है. जिनके तीन रूप मुख्य हैं.
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हिंदू धर्म में जैसे गणेश जी के कई रूप हैं, वैसे ही धर्म के रक्षक और बुद्धि के देवता गणेश जी को बौद्ध लोग जम्भाला के रुप में पूजते हैं.
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8वीं शताब्दी में न्यिंग्मा संप्रदाय के संस्थापक पद्मसंभव तिब्बत की यात्रा पर गए थे.
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जहां उन्होंने बौद्ध धर्म का विस्तार किया लेकिन बावजूद इसके उन्होंने बौद्ध धर्म के ग्रंथों में गणपति जी को खास स्थान दिया.
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कहा जाता है कि बौद्ध धर्मगुरु पद्मसंभव ने जब तांत्रिक साधना के लिए धार्मिक क्रियाएं करने की कोशिश की तो उसमें लगातार विघ्न आने लगे.
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उसे रोकने के लिए उन्होंने विघ्नहर्ता गणपति को खुश करने का फैसला किया और उन्हें बौद्ध धर्म के धर्मरक्षक के रूप में स्थापित कर दिया.
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द्ध धर्म के वज्रयान समुदाय के लोग गणेश जी के कई रुपों को पूजते हैं.
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तीन रूप के गणपति ये महाकाल गणपति, नृत्यरत गणपति और महाबिघ्नेश गणपति, तीनों को ही पूजते हैं.
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