क्यों बाबा साहेब की सलाह को अनसुना करना देश पर भारी पड़ा?
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क्या 1947 का नरसंहार टाला जा सकता था, ऐसा माना जाता है कि अगर बाबासाहेब अंबेडकर के विचारों पर गौर किया जाता, तो शायद इतिहास के पन्नों पर खून के धब्बे नहीं होते..
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आखिर पाकिस्तान को लेकर क्या थी बाबासाहेब की वह 'कड़वी' लेकिन 'व्यावहारिक' सोच, इसके बारे जानते हैं..
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1945 में published अपनी किताब 'पाकिस्तान या भारत का विभाजन' में बाबासाहेब ने चेतावनी दी थी कि हिंदू-मुस्लिम तनाव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक दरार है, उन्होंने कहा था.
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विभाजन को भावनाओं से नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों से समझो, उनका मानना था कि जबरदस्ती थोपी गई एकता कभी भी स्थायी समाधान नहीं हो सकती.
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बाबा साहेब का तर्क था कि यदि पाकिस्तान बनता है, तो उसे पूरी तरह 'Homogeneous' होना चाहिए, यानी पाकिस्तान से सभी हिंदू भारत आएं और भारत से सभी मुसलमान पाकिस्तान जाएं.
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ताकि भविष्य में सांप्रदायिक हिंसा की जड़ ही खत्म हो जाए हालांकि, उन्होंने पाकिस्तान के विचार का समर्थन अंधाधुंध नहीं किया,
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उन्होंने इसके आर्थिक, प्रशासनिक, सैन्य पहलुओं पर सवाल भी उठाए, अंबेडकर ने चेताया था कि विभाजन के बाद दोनों देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण रह सकते हैं और यह लंबे समय तक अस्थिरता का कारण बन सकता है..