संन्यासी ने कैसे राजकुमार सिद्धार्थ को 'बुद्ध' बना दिया!
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बुद्ध पूर्णिमा का दिन सनातन और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए विशेष होता है.
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इस दिन देशभर में उत्सव जैसा माहौल रहता है, बौद्ध मठों और मंदिरों को सजाया जाता है.
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इस अवसर पर विशेष पूजा और सत्संग का आयोजन किया जाता है, कुल मिलाकर कहें तो देश-दुनिया में बौद्ध पूर्णिमा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.
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लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक राजा का बेटा, महल के ऐशो-आराम छोड़ कर एक संन्यासी कैसे बन गया?
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विश्व गुरु बुद्ध के जीवन की वो चार घटनाएं, जिन्होंने इतिहास बदल दिया..563 ईसा पूर्व, नेपाल के लुम्बिनी में सिद्धार्थ का जन्म हुआ.
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एक दिन बगीचे में टहलते हुए सिद्धार्थ ने एक लाचार वृद्ध को देखा, फिर एक रोगी को और तीसरे दिन एक शव यात्रा को, इन दुखों ने उन्हें झकझोर दिया,
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लेकिन चौथे दिन उन्हें दिखा एक संन्यासी, जिसके चेहरे पर अद्भुत तेज और शांति थी, सिद्धार्थ समझ गए कि सत्य महल में नहीं, खोज में है,
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महज 29 साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ दिया, 6 साल की कठोर तपस्या के बाद वैशाख पूर्णिमा के दिन ही बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें 'सत्य ज्ञान' मिला,
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उन्होंने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया और दुनिया को अहिंसा और करुणा का मार्ग दिखाया..