Bodhgaya: बोधगया, जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, आज एक बड़े विवाद का केंद्र बन गया है। महाबोधि महाविहार का प्रबंधन बौद्ध समुदाय के हाथ में न होने से इस मामले ने तूल पकड़ लिया है। बौद्ध धर्म के अनुयायी वर्षों से मांग कर रहे हैं कि इस ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल का पूर्ण नियंत्रण बौद्धों को सौंपा जाए।
ब्राह्मणों का मंदिर प्रशासन में वर्चस्व
महाबोधि मंदिर प्रबंधन समिति (BTMC) का गठन 1949 के एक कानून के तहत किया गया था, जिसमें जन्म के आधार पर ब्राह्मणों को समिति में सदस्य नियुक्त करने की व्यवस्था की गई थी। यह प्रावधान बौद्ध समुदाय के लिए चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि यह बौद्धों के धार्मिक स्थल पर बाहरी नियंत्रण स्थापित करता है। बौद्ध धर्मावलंबियों का आरोप है कि ब्राह्मण सदस्य मंदिर को कभी विष्णु मंदिर, तो कभी शिव मंदिर बताकर इसका हिंदूकरण करने की कोशिश कर रहे हैं।
बौद्धों का विरोध और आंदोलन
बोधगया में इस समय बौद्ध भिक्षु आमरण अनशन पर बैठे हुए हैं, जिनकी मांग है कि महाबोधि महाविहार को बौद्ध समुदाय को सौंपा जाए और 1949 के अधिनियम को निरस्त किया जाए। बौद्ध समुदाय का कहना है कि यह अधिनियम संविधान विरोधी है और बुद्ध की विरासत को नष्ट करने का प्रयास है। आंदोलनकारियों का यह भी आरोप है कि मंदिर से मिलने वाले दान और संसाधनों का उपयोग बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के बजाय अन्य गतिविधियों में किया जा रहा है।
मीडिया और सरकार की चुप्पी
दिलचस्प बात यह है कि मुख्यधारा की मीडिया इस मामले को नजरअंदाज कर रही है, जबकि सोशल मीडिया पर इस आंदोलन को समर्थन मिल रहा है। कई बहुजन यूट्यूब चैनल इस मुद्दे को उजागर कर रहे हैं और बौद्धों के आंदोलन को देश-दुनिया तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। बौद्ध धर्म के अनुयायी अब बड़ी संख्या में बोधगया पहुंच रहे हैं और आंदोलन को मजबूत कर रहे हैं।
महाबोधि मंदिर अधिनियम और विवाद
1949 के महाबोधि टेंपल एक्ट के तहत:
- मंदिर और इसकी भूमि को हिंदू और बौद्ध दोनों के लिए पूजा स्थल माना गया है।
- ब्राह्मणों को ट्रस्ट का सदस्य नियुक्त किया जाता है।
- मंदिर प्रशासन पूजा-अर्चना और पिंडदान जैसी हिंदू परंपराओं को बढ़ावा देता है।
- किसी भी विवाद की स्थिति में अंतिम निर्णय राज्य सरकार लेती है।
बौद्ध समुदाय का कहना है कि यह प्रावधान बुद्ध की शिक्षाओं और धर्म की आत्मा के खिलाफ है। उनका कहना है कि भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति स्थल को पूरी तरह से बौद्धों के हाथों में सौंपा जाना चाहिए।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और बौद्ध धरोहर पर अतिक्रमण
इतिहासकार बताते हैं कि बोधगया सदियों तक बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र रहा है, लेकिन धीरे-धीरे इस पर ब्राह्मणवादी प्रभाव बढ़ता गया। चीनी यात्री ह्वेनसांग और फाह्यान की लिखी पुस्तकों में यह स्पष्ट है कि बोधगया एक महत्वपूर्ण बौद्ध तीर्थ स्थल था। ब्रिटिश काल में यहां खुदाई के दौरान बुद्ध मूर्तियां, स्तूप और बौद्ध ग्रंथ मिले, जो यह दर्शाते हैं कि यह स्थान मूल रूप से बौद्ध धर्म का केंद्र रहा है।
बुद्ध की विरासत को बचाने की मांग
बौद्ध समुदाय और आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगें:
- महाबोधि मंदिर को पूरी तरह से बौद्धों के हाथों में सौंपा जाए।
- 1949 के टेंपल मैनेजमेंट एक्ट को रद्द किया जाए।
- ब्राह्मणों की सदस्यता को समाप्त कर बौद्ध भिक्षुओं को समिति में शामिल किया जाए।
- महाबोधि महाविहार को एकमात्र बौद्ध तीर्थ स्थल के रूप में मान्यता दी जाए।
- बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार और सामाजिक कार्यों के लिए मंदिर के संसाधनों का सही उपयोग किया जाए।
बोधगया में चल रहा यह आंदोलन सिर्फ एक धार्मिक स्थल के स्वामित्व का मामला नहीं है, बल्कि यह बुद्ध की शिक्षाओं और उनकी विरासत को बचाने की लड़ाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर अपने संबोधनों में बुद्ध की धरती से जुड़ाव की बात करते हैं, ऐसे में उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे बौद्धों के इस ऐतिहासिक स्थल को उन्हें सौंपने की दिशा में कदम उठाएं।
बौद्ध भिक्षुओं का अनशन जारी है और सरकार की निष्क्रियता से यह आंदोलन और भी तेज हो सकता है। यदि सरकार ने जल्द ही इस मुद्दे का समाधान नहीं किया, तो यह आंदोलन देशभर में बड़े स्तर पर फैल सकता है।