Gujarat Mahabodhi Andolan: पिछले कुछ समय से बिहार के बोधगया में महाबोधि मुक्ति आंदोलन चल रहा है जिनकी मांग है कि महाबोधि महाविहार को बौद्ध समुदाय को सौंपा जाए और 1949 के अधिनियम को निरस्त किया जाए। लेकिन न तो सरकार को इसकी सुध है और न ही किसी भी तरह के कोई कदम उठाए गए हैं. वही अब इस मामले को लेकर गुजरात में महाबोधि मुक्ति आंदोलन तेज हो गया है। स्वयं सैनिक दल (एसएसडी) के स्वयंसेवक बिहार के महाबोधि महाविहार मंदिर के प्रबंधन को गैर-बौद्धों के नियंत्रण से मुक्त कराने की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। तो चलिए आपको इस लेख में पूरे मामले के बारे में बताते है।
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जानें क्या है पूरा मामला ?
पिछले कुछ समय से महाबोधि आंदोलन चल रहा है, यह मुद्दा फिर एक बार गरमाय है जहां बिहार के बोधगया में महाबोधि मुक्ति आंदोलन चल रहा है, वहीं गुजरात में भी महाबोधि आंदोलन शुरू हो गया है, जी हां, बौद्ध धरोहर (महाबोधि महाविहार) की मुक्ति के लिए गुजरात के सभी जिलों और शहरों में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। स्वयं सैनिक दल की ओर से पोरबंदर, भरूच, वाव-थ्राद, गांधीनगर, बड़ौदा, अमरेली, पाटण समेत सभी जगहों पर जिला कलेक्टर के माध्यम से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गुजरात के मुख्यमंत्री को आवेदन सौंपे गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने कहा, “यह मंदिर बौद्ध धर्म की पवित्र धरोहर है। इसे गैर-बौद्धों के नियंत्रण से मुक्त कराना हमारा अधिकार है। हम चाहते हैं कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले और हमारी मांगों को पूरा करे।”
जिनकी मांग है कि महाबोधि महाविहार को बौद्ध समुदाय को सौंपा जाए और 1949 के अधिनियम को निरस्त किया जाए। बौद्ध समुदाय का कहना है कि यह अधिनियम संविधान विरोधी है और भगवान बुद्ध की विरासत को नष्ट करने का प्रयास है। आंदोलनकारियों का यह भी आरोप है कि मंदिर से मिलने वाले दान और संसाधनों का उपयोग बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के बजाय अन्य गतिविधियों में किया जा रहा है। अन्य गतिविधियों में किया जा रहा है।

महाबोधि मुक्ति आंदोलन के कारण
आंदोलनकारियों का दावा है कि मंदिर का प्रबंधन गैर-बौद्धों के हाथों में है, जो बौद्ध धर्म की परंपराओं और शिक्षाओं का पालन नहीं करते हैं। बौद्ध धर्मावलंबियों का आरोप है कि ब्राह्मण सदस्य मंदिर को कभी विष्णु मंदिर, तो कभी शिव मंदिर बताकर इसका हिंदूकरण करने की कोशिश कर रहे हैं। वही महाबोधि महाविहार बौद्ध धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है, और बौद्ध समुदाय इसे अपनी विरासत और धरोहर मानता है।
बोधगया मंदिर अधिनियम, 1949 (BT Act 1949): बौद्ध समुदाय इस अधिनियम को असंवैधानिक मानता है और इसे रद्द करने की मांग करता है। इस अधिनियम के अनुसार मंदिर के प्रबंधन में ब्राह्मण और बौद्ध दोनों शामिल हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि ब्राह्मणों द्वारा उन बौद्धों को ही प्रबंधन में रखा जाता है जो उनकी हां में हां मिलाते हैं।
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बुद्ध संगठनो का समर्थन
महाबोधि मुक्ति आन्दोलन को विभिन्न बौद्ध संगठनों से व्यापक समर्थन मिल रहा है। अखिल भारतीय दलित, आदिवासी, पिछड़ा और अल्पसंख्यक संयुक्त मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. ओम सुधा ने कहा, ब्राह्मण मुक्त बुद्ध विहार का आन्दोलन तेजी से आगे बढ़ रहा है। हम इस आन्दोलन का संपूर्ण समर्थन करते हैं। जो लोग बुद्ध में आस्था रखते हैं और बुद्धिस्ट हैं, उन्हें महाबोधि विहार का संचालन करना चाहिए। इसके विपरीत, गैर-बुद्धिस्ट लोग केवल वहाँ व्यापार कर रहे हैं। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए कि गया के बुद्ध विहारों को ब्राह्मण मुक्त किया जाना चाहिए।
इसके अलवा एसएसडी के स्वयंसेवक गुजरात के विभिन्न शहरों में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। वे जिला कलेक्टरों के माध्यम से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और गुजरात के मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंप रहे हैं। वे मंदिर के पूर्ण प्रबंधन को बौद्ध समुदाय को सौंपने की मांग कर रहे हैं। इस आन्दोलन को विश्व भर के बौद्ध समाज का समर्थन मिल रहा है।