Haibaspur: पटना जिले के रनिया तालाब थाना क्षेत्र के हैबसपुर गांव में 1997 में हुए दलितों के नरसंहार के मामले में सिविल कोर्ट की विशेष अदालत ने साल 2018 में सभी 28 आरोपितों को बरी कर दिया था। विशेष न्यायाधीश मनोज कुमार सिंह ने इस मामले की सुनवाई करते हुए आरोपियों को साक्ष्य की कमी के कारण बरी किया और उन्हें रिहा कर दिया। 23 मार्च, 1997 को हुए इस नरसंहार में 10 दलितों की हत्या कर दी गई थी, और यह मामला वर्ष 2018 से अदालत में लंबित था। अब इस फैसले के बाद यह सवाल खड़ा हो गया है कि आखिरकार इस मामले में न्याय कैसे मिल सकता है, और क्या यह फैसला सही था?
नरसंहार की घटना और प्रारंभिक जांच
रनिया तालाब थाना क्षेत्र के हैबसपुर गांव में 23 मार्च, 1997 को रणवीर सेना के समर्थकों ने 10 दलितों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। इस घटना के बाद लक्ष्मण मांझी के बयान पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी। कुल 32 लोग इस मामले में आरोपित किए गए थे, और अभियोजन ने 28 गवाहों का बयान दर्ज कराया था। हालांकि, मुख्य अभियुक्त लंगरा और भोजपुरिया फरार थे, और कई गवाहों ने आरोपियों की पहचान नहीं की थी। मृतकों की चारों पत्नियों ने भी अदालत में गवाही दी और कहा कि उन्हें आरोपियों की पहचान नहीं हो पाई थी।
मृतकों के परिवारों का बयान और आरोपी की पहचान न होना
मृतकों की पत्नियों ने भी अदालत में कहा कि नरसंहार के जिम्मेदार मुख्य आरोपी लंगरा ही था। उन्होंने यह भी कहा कि लंगरा ने ही अपने समर्थकों के साथ इस हत्या को अंजाम दिया था। हालांकि, बाकी गवाहों ने भी आरोपियों की पहचान से इनकार किया। इस तथ्य के बावजूद कि नरसंहार में शामिल होने का आरोप इन 28 लोगों पर लगाया गया था, गवाहों द्वारा आरोपियों की पहचान न करने के कारण अदालत ने उन्हें बरी कर दिया।
नरसंहार के आरोपी लंगरा की भूमिका
यह घटना तब हुई जब रणवीर सेना के कमांडर बनने के लिए लंगरा ने यह कायरतापूर्ण कदम उठाया। वह अपनी ताकत बढ़ाने और इलाके में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए नरसंहार को अंजाम देना चाहता था। बाद में लंगरा फरार हो गया था और 10 साल बाद उसकी हत्या कर दी गई। इस घटना को लेकर आरोप था कि लंगरा ने अपने समर्थकों के साथ दलितों को बुलाकर कतार में खड़ा किया और फिर उन्हें गोलियों से भून डाला। बाद में, हत्यारों ने घरों की दीवारों पर “रणवीर सेना” लिख दिया। लूलन मांझी को भी कतार में खड़ा किया गया था, लेकिन वह किसी तरह बच गया।
साक्ष्य की कमी और आरोपितों की बरी होने की स्थिति
अदालत ने इस मामले में साक्ष्य की कमी के कारण आरोपितों को बरी कर दिया। हालांकि यह सवाल उठता है कि इतने बड़े नरसंहार में लंगरा अकेला नहीं हो सकता था, और इसके साथ कई अन्य लोग भी शामिल हो सकते हैं। पुलिस ने जिन लोगों को जांच के दौरान नहीं पकड़ा, उन्हें क्यों आरोपित नहीं किया गया? क्या यह जांच में कोई कमी थी? इसके साथ ही, यह भी सवाल है कि क्या सरकार इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देगी और जिन लोगों ने इस नरसंहार को अंजाम दिया, उन्हें सजा दिलवाने की कोशिश करेगी?
क्या यह फैसला न्यायपूर्ण था?Massacre
सभी आरोपितों को बरी किए जाने के बाद यह सवाल उठता है कि क्या इस फैसले से न्याय मिला है? क्या सचमुच साक्ष्य की कमी के कारण इन आरोपितों को बरी किया जा सकता था? क्या इस फैसले के बाद पीड़ित परिवारों को न्याय मिलेगा? इन सवालों का जवाब केवल उच्च न्यायालय के फैसले के बाद ही स्पष्ट हो सकता है, जब इस मामले को अपील के लिए उठाया जाएगा।