Shankar Bigha massacre: 25 जनवरी 1999 की रात बिहार के जहानाबाद जिले के शंकर बिगहा गांव में जो हुआ, उसे भूलना आज भी मुश्किल है। उस रात 22 दलितों को बेदर्दी से मौत के घाट उतार दिया गया। गांव में हर तरफ चीख-पुकार थी, मातम पसरा था और इंसानियत को तार-तार कर देने वाला नज़ारा दिख रहा था।
यह घटना बिहार में जातीय हिंसा के काले अध्यायों में से एक बन गई। यह वह दौर था जब जातीय नरसंहार चरम पर था। अगड़ी जाति और पिछड़ी जाति के बीच खूनी संघर्ष आम हो चुका था। पिछड़े और दलित समुदाय का नेतृत्व भाकपा माले कर रही थी, जबकि सवर्णों की ओर से रणवीर सेना मोर्चा संभाले हुए थी। बिहार में बेलछी नरसंहार (1977) से शुरू हुआ यह दौर मियांपुर नरसंहार (2000) तक जारी रहा।
शंकर बिगहा: जहां 22 जिंदगियां छीन ली गईं
शंकर बिगहा गांव दो टोले में बंटा हुआ था। एक ओर दलित समुदाय के लोग रहते थे, जबकि दूसरी ओर सवर्ण समुदाय के लोग बसे थे। दोनों के बीच दूरी लगभग एक किलोमीटर थी। आरोप लगाया गया कि सवर्णों ने दलितों को चुन-चुनकर मारा। इस मामले में 24 लोगों को अभियुक्त बनाया गया, लेकिन अंततः कोई भी दोषी साबित नहीं हुआ।
16 साल चला केस, आखिर में सभी बरी
इस नरसंहार की जांच 16 सालों तक चली, लेकिन नतीजा शून्य रहा।
- शुरुआत में गवाह सामने आए, लेकिन समय के साथ वे अपने बयान से पलटते गए।
- 13 जनवरी 2015 को जहानाबाद जिला अदालत ने सबूतों के अभाव में सभी 24 अभियुक्तों को बरी कर दिया।
- माना जाता है कि केस में दलितों की ओर से मजबूत पैरवी नहीं हुई, जिससे दोषियों को सजा नहीं मिल पाई।
प्रत्यक्षदर्शियों की दर्दनाक यादें
उस समय इस घटना को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार रमाशंकर मिश्रा ने बताया कि उन्हें 26 जनवरी की सुबह इस नरसंहार की खबर मिली थी। जब वह घटनास्थल पर पहुंचे, तो वहां दिल दहला देने वाला मंजर था।
“कोई गोली से छलनी था, किसी के हाथ कटे थे, किसी की आंखें निकाल दी गई थीं। चारों ओर खून ही खून था। यह सब उस समय हुआ, जब गांव में सांस्कृतिक कार्यक्रम हो रहा था। 100 से अधिक हथियारबंद लोग आए और अंधाधुंध गोलीबारी कर दी। जो जहां था, वहीं गिर पड़ा।”
बचे हुए लोगों की आपबीती
रमाशंकर मिश्रा ने बताया कि भैरव राजभर नामक व्यक्ति के परिवार के पांच सदस्य मारे गए थे।
- भैरव राजभर की दो बेटियां भी मारी गईं।
- वह खुद जान बचाने के लिए फूस की झोपड़ी के ऊपर छिप गए थे।
- जो लोग सो रहे थे, वे मौत की नींद सुला दिए गए।
जमीन के झगड़े से उपजा नरसंहार
यह नरसंहार सिर्फ जातीय संघर्ष नहीं, बल्कि जमीन विवाद का भी परिणाम था।
- रणवीर सेना और लेफ्ट संगठनों के बीच लंबे समय से तनातनी थी।
- दलितों ने ऊंची जाति के लोगों की जमीन पर कब्जा कर झंडा गाड़ दिया था।
- भूमि पर कब्जे को लेकर दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ता गया, जो अंततः इस भयावह नरसंहार में तब्दील हो गया।
गवाह मुकर गए, इंसाफ अधूरा रह गया
शंकर बिगहा नरसंहार का मुकदमा 2013 में शुरू हुआ, लेकिन जब गवाही देने का समय आया, तो
- कई चश्मदीद डर के कारण पीछे हट गए।
- साक्ष्य के अभाव में सभी 24 अभियुक्त बरी कर दिए गए।
इस केस में वैज्ञानिक जांच नहीं हुई, सिर्फ मौखिक गवाही पर मामला टिका रहा। चूंकि गवाह मुकर गए, इसलिए अदालत को भी मजबूरन फैसला सुनाना पड़ा।
अब गांव में कोई तनाव नहीं, लेकिन जख्म गहरे हैं
आज शंकर बिगहा और धोबी बिगहा के बीच कोई दुश्मनी नहीं बची। दोनों समुदाय शांतिपूर्ण तरीके से रह रहे हैं। लेकिन जो जख्म 25 साल पहले मिले, वे अभी भी हरे हैं।
क्या बिहार में जातीय हिंसा खत्म हो चुकी है?
बिहार में अब जातीय नरसंहार की घटनाएं कम हो चुकी हैं, लेकिन जातीय तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। सरकार ने कई प्रयास किए, जिससे संगठित हिंसा पर काफी हद तक लगाम लगी। जागरूकता और सरकारी नीतियों के कारण लोग अब राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा बनने से बचते हैं। लेकिन आज भी न्याय न मिल पाने की टीस शंकर बिगहा के लोगों में बनी हुई है।
26 साल बाद भी अधूरी है न्याय की लड़ाई
शंकर बिगहा नरसंहार के पीड़ितों को इंसाफ अब तक नहीं मिला। दोषियों को सजा नहीं मिली, क्योंकि गवाह अपने बयान से पलट गए। सरकार ने इस घटना को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया। न ही पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए कोई विशेष प्रयास किया गया।
शंकर बिगहा का नरसंहार बिहार के इतिहास में जातीय हिंसा की सबसे दुखद घटनाओं में से एक बन चुका है। 26 साल बाद भी परिवारों का दर्द वैसा ही है, बस अब उनकी उम्मीदें धुंधली पड़ने लगी हैं। सवाल यह है कि क्या यह न्याय अधूरा ही रह जाएगा, या फिर किसी दिन इन्हें इंसाफ मिलेगा?