बाबा साहेब आंबेडकर की वकालत: जानें कैसे उनकी धाक ने न्याय के मैदान में मचाई हलचल

Baba Sahib
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DR. BR. Ambedkar: डॉ. भीमराव आंबेडकर का नाम भारतीय न्याय व्यवस्था में न केवल एक प्रमुख संविधान निर्माता के रूप में गूंजता है, बल्कि वे एक अद्भुत वकील भी थे, जिन्होंने न्याय की प्रक्रिया में बदलाव और समाज में समानता के लिए अपार संघर्ष किया। वकालत का पेशा उन्होंने व्यक्तिगत उन्नति के लिए नहीं, बल्कि भारतीय समाज में व्याप्त असमानताओं और भेदभाव को खत्म करने के लिए चुना था। बाबा साहेब की वकालत की दुनिया में धाक इतनी थी कि उनका योगदान आज भी भारतीय समाज और न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण माना जाता है।

शिक्षा का महत्व और संघर्ष की शुरुआत

बाबा साहेब ने अपनी शिक्षा के दौरान कई कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उनकी पढ़ाई का उद्देश्य स्पष्ट था—भारत के शोषित और दलित वर्ग के लिए न्याय प्राप्त करना। 1913 में बॉम्बे के एलफिंस्टन कॉलेज से स्नातक होने के बाद, डॉ. आंबेडकर ने उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय का रुख किया। बड़ौदा के सयाजीराव गायकवाड़ महाराज से मिली आर्थिक मदद ने उन्हें इस शिक्षा यात्रा की ओर अग्रसर किया। अमेरिका में उन्होंने अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, एथिक्स और मानवविज्ञान का अध्ययन किया और 1915 में ‘भारत का प्राचीन व्यापार’ पर एमए की डिग्री हासिल की।

बाबा साहेब का शिक्षा का सफर न केवल उनके व्यक्तिगत विकास के लिए था, बल्कि उन्होंने इन विषयों के माध्यम से भारतीय समाज के जटिल सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने को समझने का प्रयास किया। वे जानते थे कि केवल शिक्षा के द्वारा ही वह समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए आवाज़ उठा सकते हैं।

लंदन में कानून की शिक्षा और बैरिस्टर बनने की राह

सिर्फ शिक्षा में रुचि ही नहीं, बल्कि डॉ. आंबेडकर ने अपनी वकालत की पढ़ाई के लिए लंदन का रुख किया। वहां उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमिक्स में अर्थशास्त्र में शिक्षा प्राप्त की और ग्रेज़ इन में नामांकन कर कानून की डिग्री भी प्राप्त की। इसके बाद 1922 में उन्होंने बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त की और भारत में वकालत शुरू की। यह उनकी महान कार्यशक्ति का प्रतीक था, क्योंकि वकालत के दौरान वे समाज के सभी वर्गों के लिए एक सशक्त आवाज बन गए।

वकालत में संघर्ष और सामाजिक उद्देश्य

जब डॉ. आंबेडकर ने वकालत शुरू की, तब उन्होंने इसका उद्देश्य केवल कानून के मामलों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने समाज में व्याप्त असमानता और जातिवाद के खिलाफ कड़ा संघर्ष किया। उन्होंने अपने मुवक्किलों के मामलों को सिर्फ कानूनी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संदर्भ में भी देखा। आंबेडकर ने अपने जीवन का उद्देश्य दलितों और शोषितों के लिए न्याय प्राप्त करना रखा था। उन्होंने कई बार अपने मुवक्किलों के साथ अपना खाना भी साझा किया और उनके दुख-दर्द को समझने की पूरी कोशिश की।

उनकी वकालत का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि उन्होंने हर व्यक्ति को समान रूप से न्याय दिलाने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दी। उनका मानना था कि एक अच्छे वकील का धर्म केवल कानूनी लड़ाई लड़ना नहीं है, बल्कि समाज में व्याप्त असमानताओं और भेदभाव के खिलाफ भी संघर्ष करना है।

महत्वपूर्ण मुकदमे और सामाजिक योगदान

डॉ. आंबेडकर के कई महत्वपूर्ण मुकदमे थे, जिनमें उन्होंने अपने मुवक्किलों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ी। उनका एक प्रमुख मुकदमा ‘महाड़ सत्याग्रह’ था, जिसमें उन्होंने अछूतों के लिए सार्वजनिक जलस्रोतों से पानी पीने का अधिकार दिलवाने के लिए संघर्ष किया। इस मामले में उन्होंने अदालत में अपनी दमदार दलीलें पेश की और अंततः जीत हासिल की। इसके अलावा, उन्होंने ‘देश के दुश्मन’ केस और आरडी कर्वे के मामले जैसे अन्य महत्वपूर्ण मुकदमे भी लड़े, जो समाज में सुधार और शोषितों के अधिकारों की रक्षा से जुड़े थे।

डॉ. आंबेडकर ने हमेशा अपनी वकालत में सत्य, न्याय और समानता के सिद्धांतों को प्राथमिकता दी। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनके मुवक्किलों को न केवल कानूनी न्याय मिले, बल्कि उनके जीवन में सुधार के लिए भी काम किया जाए।

डॉ. आंबेडकर की वकालत की दुनिया में धाक केवल उनके कानूनी कार्यों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनके द्वारा उठाए गए सामाजिक और राजनीतिक कदमों ने उन्हें एक सशक्त नेता बना दिया। उनकी वकालत ने न केवल भारतीय न्याय व्यवस्था को प्रभावित किया, बल्कि उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त असमानताओं और भेदभाव के खिलाफ एक मजबूत संघर्ष भी किया। उनकी मेहनत और समर्पण ने न केवल दलितों और शोषितों को आवाज़ दी, बल्कि भारतीय समाज को न्याय और समानता की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाया।

 

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