Antonio Gramsci and Ambedkar: अंतोनियो ग्राम्शी और डॉ. भीमराव अंबेडकर, दोनों ही 20वीं सदी के प्रमुख विचारक और समाज सुधारक थे, जिन्होंने अपने-अपने समाजों में व्याप्त असमानताओं और शोषण के खिलाफ संघर्ष किया। हालांकि वे भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अलग थे, लेकिन उनके विचारों में कई समानताएँ पाई जाती हैं, जो सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों की मुक्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं।
सामाजिक पृष्ठभूमि और संघर्ष
अंतोनियो ग्राम्शी इटली के एक मार्क्सवादी दार्शनिक, राजनीतिक सिद्धांतकार और कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे। उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा जेल में बिताया, जहाँ उन्होंने “प्रिजन नोटबुक्स” लिखे। इन लेखों में उन्होंने सांस्कृतिक वर्चस्व (cultural hegemony) और नागरिक समाज (civil society) जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत किए। ग्राम्शी का मानना था कि शासक वर्ग केवल राजनीतिक और आर्थिक शक्ति के माध्यम से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक वर्चस्व के माध्यम से भी समाज पर नियंत्रण रखता है।
दूसरी ओर, डॉ. बी.आर. अंबेडकर भारत के एक प्रमुख समाज सुधारक, विधिवेत्ता और संविधान निर्माता थे। उन्होंने भारतीय समाज में जाति-आधारित भेदभाव और अस्पृश्यता के खिलाफ संघर्ष किया। अंबेडकर का मानना था कि सामाजिक और आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है। उन्होंने दलितों और अन्य वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया और भारतीय संविधान में समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों को स्थापित किया।
सांस्कृतिक वर्चस्व और सामाजिक सुधार
ग्राम्शी का “सांस्कृतिक वर्चस्व” का सिद्धांत बताता है कि शासक वर्ग अपने मूल्यों और विचारों को समाज पर थोपकर अपनी सत्ता को बनाए रखता है। यह वर्चस्व शिक्षा, धर्म, मीडिया और अन्य सांस्कृतिक संस्थानों के माध्यम से स्थापित किया जाता है। ग्राम्शी ने तर्क दिया कि वंचित वर्गों को इस वर्चस्व को चुनौती देने के लिए “काउंटर-हेजेमनी” विकसित करनी होगी, जो वैकल्पिक विचारधारा और सांस्कृतिक आंदोलन के माध्यम से संभव है।
अंबेडकर ने भी भारतीय समाज में ब्राह्मणवादी वर्चस्व और जाति-आधारित असमानताओं को चुनौती दी। उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण साधन माना और दलितों को शिक्षित होने, संगठित होने और संघर्ष करने का आह्वान किया। अंबेडकर ने “मनुस्मृति” जैसे प्राचीन ग्रंथों की आलोचना की, जो जाति-आधारित भेदभाव को वैधता प्रदान करते थे, और समानता पर आधारित समाज की स्थापना के लिए नए विचारधारात्मक ढांचे की आवश्यकता पर जोर दिया।
नागरिक समाज और राजनीतिक संघर्ष
ग्राम्शी ने नागरिक समाज को राज्य और परिवार के बीच की जगह के रूप में परिभाषित किया, जहाँ विचारधारात्मक संघर्ष होते हैं। उन्होंने माना कि राजनीतिक परिवर्तन के लिए नागरिक समाज में वैचारिक लड़ाई आवश्यक है, क्योंकि यही वह क्षेत्र है जहाँ सामाजिक मान्यताएँ और मूल्य निर्मित होते हैं। ग्राम्शी ने “ऑर्गेनिक इंटेलेक्चुअल्स” की अवधारणा प्रस्तुत की, जो वंचित वर्गों से उभरकर उनकी आवाज़ बनते हैं और सामाजिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अंबेडकर ने भी सामाजिक और राजनीतिक सुधार के लिए संस्थागत ढांचे के महत्व को समझा। उन्होंने भारतीय संविधान के माध्यम से सामाजिक न्याय, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को स्थापित किया। अंबेडकर ने राजनीतिक लोकतंत्र के साथ-साथ सामाजिक लोकतंत्र पर भी जोर दिया, जहाँ सभी नागरिकों को समान अवसर और अधिकार प्राप्त हों। उन्होंने वंचित वर्गों के सशक्तिकरण के लिए आरक्षण जैसी नीतियों की वकालत की, ताकि उन्हें मुख्यधारा में शामिल किया जा सके।
शिक्षा और चेतना का प्रसार
ग्राम्शी और अंबेडकर दोनों ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण साधन माना। ग्राम्शी ने तर्क दिया कि वंचित वर्गों को अपनी स्थिति सुधारने के लिए शिक्षा और सांस्कृतिक जागरूकता की आवश्यकता है। उन्होंने “सांस्कृतिक वर्चस्व” को चुनौती देने के लिए वैकल्पिक शिक्षा और सांस्कृतिक संस्थानों की स्थापना पर जोर दिया।
अंबेडकर ने भी शिक्षा को “मुक्ति का माध्यम” माना और दलितों को शिक्षित होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, “शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो।” अंबेडकर ने शिक्षा के माध्यम से सामाजिक चेतना और आत्म-सम्मान को बढ़ाने का प्रयास किया, ताकि वंचित वर्ग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर सकें।
अंतोनियो ग्राम्शी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर, दोनों ने अपने-अपने समाजों में व्याप्त असमानताओं और शोषण के खिलाफ संघर्ष किया। उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं और सामाजिक न्याय, समानता और मानवाधिकारों के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। उनके विचारों का अध्ययन और अनुप्रयोग, विशेष रूप से दक्षिण एशियाई संदर्भ में, सामाजिक सुधार और परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण है।