By: Shikha

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इतिहास के पन्नों में दबा बंगाल का नामशूद्र आंदोलन

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19वी सदी के अंत और 20सदी की शुरूआत में बंगाल में जातिगत भेदभाव और हाशिए पर पड़े नामसुद्र समाज के लोगों

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के लिए सामाजिक और धार्मिक रूप से बराबरी और सम्मान देने के लिए नामसुद्र आंदोलन की शुरुआत की गईं थी।  

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ये आंदोलन हरिचंद ठाकुर औऱ गुरुचंद ठाकुर ने शुरु किया था। नामसुद्र समुदाय जिन्हें इस आदोंलन से पहले चंडाल समुदाय कहा जाता था।  

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जो कि एक अपमानित शब्द माना जाता था... लेकिन इस अपमान के खिलाफ ठाकुर भाइयो ने बंगाल में आंदोलन शुरु किया  

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1911 में ब्रिटिश सरकार में याचिका दायर की कि वो चंडाल शब्द का उच्चारण बैन कर के उसकी जगह नामसुद्र शब्द कहा जाये।  

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आंदोलन का लक्ष्य मानव समानता को बढ़ावा देने, उंची जाति वाली ब्राह्मणी परंपरा और रीति रिवाजो को न मानने और 

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मेहनत के दम पर रोजी रोटी कमाने की सोच रखने वाले मतुआ संप्रदाय की सोच से प्रेरित थी।   

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इसका नतीजा ये हुआ कि शोषित वर्गो ने अपने अधिकारों के लिए लड़ना शुरु कर दिया।  

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वो पूंजीवादियों के दमन के खिलाफ हड़ताल पर चले गए औऱ अपनी मेहनत के लिए उचित मेहनताना की मांग करने लगे।