यह एक ऐसा सवाल है जिसका सही उत्तर जानने की जिज्ञासा बहुतों को होगी। इसका जवाब कहीं और खोजने की आवश्यकता नहीं,
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क्योंकि स्वयं बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपनी पुस्तक Who Were the Shudras? में इसका प्रमाण दिया है। वह अपनी पुस्तक में बताते हैं कि शूद्र आर्य समुदाय का ही हिस्सा थे।
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प्रारंभिक वैदिक काल में आर्य समाज केवल तीन वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को मान्यता देता था। उस समय शूद्र कोई अलग वर्ण नहीं थे।
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बल्कि वे क्षत्रिय वर्ग से ही आए थे। शूद्र वर्ण के जन्म का कारण क्षत्रिय राजाओं और ब्राह्मणों के बीच हुआ संघर्ष था।
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बाबा साहेब ने अपनी किताब में लिखा है कि ब्राह्मणों ने शूद्र राजाओं के उपनयन संस्कार यानी जनेऊ धारण करने की परंपरा को रोक दिया।
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उपनयन संस्कार के बिना उनका सामाजिक पतन हुआ और उन्हें समाज के चौथे वर्ण में धकेल दिया गया।
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समय के साथ, शूद्रों को निम्न स्थान दिया जाने लगा और उन्हें शिक्षा तथा अन्य सामाजिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया।