Ambedkar constitution: क्या हो जब शिक्षा के दम पर सामंतवादी विचारधारा को न केवल टक्कर दी गई बल्कि छुआछूत और जातिगत भेदभाव की दीवार को गिराने के लिए एक अकेला डॉक्टर जातिवादी जमींदारों से लड़ पड़ा, जिसमें उसकी सबसे बड़ी ताकत बनी बाबा साहब आंबेडकर द्वारा लिखी भारत की संविधान को किताब। इस किताब की ताकत वाकई में क्या है, उसे जाहिर किया एक डॉक्टर ने। जिसने न केवल अपने पर लगे आरोपो की खुद पैरवी की, बल्कि सांनतवादी विचारधारा पर चलने वालों को भी करारा जवाब दिया था कि अब ये देश जमींदारों के बनाये कानून से नहीं चलता है, अब ये देश संविधान की ताकत से चलता है, वो ताकत जिसे बाबा साहब ने देश के हर एक व्यक्ति को दिया था चाहे वो किसी भी जाति का था या फिर किसी भी धर्म का। अपने इस लेख में हम एक ऐसी ही कहानी के बारे में जानेंगे, जिसने दलितों का विश्वास संविधान के प्रति मजबूत किया था..
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ये बात है 1950 की, गर्मियों का मौसम शुरु हो चुका था और इसी साल 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और भारत से राजतंत्र खत्म कर गणतंत्र की शुरुआत हुई। इस दौरान लंदन से डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी कर एक शख्स भारत लौटा था, काफी अच्छे नंबरो से पास करने के कारण उसे लंदन और मुम्बई के बड़े अस्पतालों में प्रैक्टिस करने का मौका मिला था, लेकिन उसने नए भारत में एक ऐसे समाज की कल्पना की, जहां सबको बराबर इलाज मिले, जो अस्पतला में रह कर तो नहीं होता.. बस फिर क्या था, मध्य भारत के धामपुर कस्बे में एक छोटा सा क्लिनिक खोल लिया, जहां सभी मरीज उनके पास इलाज कराने आते थे.. इस डॉक्टर का नाम था अविनाश, जो स्वयं एक सवर्ण जाति से थे, लेकिन शिक्षा की बदौलत वो जातिगत भेदभाव के सख्त खिलाफ थे।
दलितों को पिछडो की स्थिति से वाकिफ होने के कारण उन्होंने बेहद कम पैसे में ही उनका इलाज किया.. गांव में एक सरकारी डिस्पेंसरी भी थी, लेकिन वहां पर शासन चलता था जमींदार ठाकुर गजराज सिंह का.. जमींदार के खौफ के कारण पिछड़े दलित समाज के लोग जो कि धूलिया बस्ती में रहते थे, डिस्पेंसरी जाने से कतराते थे। हालांकि गजरात डॉक्टर अविनाश के कामों में हस्तक्षेप नहीं करता था, लेकिन जब गर्मियां शुरु हुई तब धर्मपुर को हैजा बिमारी ने अपनी चपेट में ले लिया। चारो तरफ हाहाकार था, डॉ अविनाश ये ये देखा नहीं जा रहा था तो उन्होंने धूलिया बस्ती के लोगो को मदद करने का फैसला किया, लेकिन बिमारी को फैलता देख गजराज ने तुगलकी फरमान सुना दिया कि सरकारी डिस्पेंसरी की दवाई धूलिया बस्ती में नहीं जायेंगे। क्योंकि वो बस्ती गंदी है, दूसरी दवाई सवर्णों को कम न पड़ जायेँ।
डॉ अविनाश से ये अन्नाय बर्दाश्त नहीं हुआ, लेकिन उस वक्त उनका पहला लक्ष्य था कि पीड़ितो की मदद की जायें। उन्होंने अपने पास रखे सारे पैसो से दवा खरीदा औऱ धूलिया बस्ती पहुंच गए। वो लोगो को दवा देते, उनकी सेवा करते थे। दलित समाज के लोग उनके शुक्रगुजार थे.. लेकिन डॉ अविनाश का ये परोपकार गजराज से देखा नहीं गया और उसने अपने गुंडो को भेज कर धमकी दी कि वो धूलिया बस्ती के लोगो की मदद न करें नहीं तो परिणाम अच्छा नहीं होगा। लेकिन डॉक्टर अविनाश ने बिना डरे जवाब दिया कि वो जमींदार के अनुसार काम नहीं करेंगे, क्योंकि उनके लिए हर मरीज की जान की कीमत बराबर है, और सरकारी डिस्पेंसरी पर कबब्जा करके वो उनपर राज नहीं कर सकता है जल्द उसका सच कानून तक भी पहुंचेगा।
गजराज डॉक्टर अविनाश की इस घोषणा ने तिलमिला गया। उसने सीधा उन पर मानहानी, सरकारी दवा का दुरुपयोग, अधिकार क्षेत्र में गैर कानूनी क्लिनिक खोलने, और सार्वजनिक शांति भंग करने जैसे कई आरोप लगा दिये। पुलिस डॉक्टर अविनाश को ले गई..और मामला कोर्ट तक पहुंच गया।
गजराज जो कि अब तक अंग्रेजी हुकूमत के कानून से चलता आया था, उसे यकीन था कि उसका रसूख और जमींदारी यहां भी काम आएगी, लेकिन तब इसे ये अंदाजा नहीं था कि समय बदल गया है, अब देश में राजशाही नहीं लोकतंत्र है और संविधान का कानून चलता है। सुनवाई शुरू हुई, गजराज के वकील सामने आए और उन्होंने डॉक्टर अविनाश के खिलाफ बोलते हुए कहा कि गजराज एक रसूखदार और इज्जतदार व्यक्ति है, डॉ ने अवैध रूप से क्लिनिक खोला, डिस्पेंसरी की दवा का इस्तेमाल निजी लाभ के लिए किया था, जब गजराज ने ऐसा करने से उन्हें मना किया तो डॉ ने बीच चौराहे पर जमींदार को अपमानित कर उनका मान हानि किया। ऐसे डॉ की जगह समाज में हो ही नहीं सकती।
पूरा कोर्ट खचाखच भरा हुआ था, सबको लगा कि शायद डॉ अविनाश जमींदार के रसूख से घबरा जाएंगे और पीछे हट जाएंगे, लेकिन ये वही वक्त तक जब सही मायने में संविधान की ताकत दिखाने का वक्त आया था। जब जज साहब ने डॉ अविनाश से पूछा कि क्या उन्हें जमींदार के लगाए आरोप कबूल है, और उनका मुकदमा लड़ने वाला वकील कौन है तो अविनाश पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़े हुए। उन्होंने कहा कि वो सच्चे और सही है। इसलिए अपना मुकदमा वो खुद लड़ेंगे। और यहां से डॉ ने शुरू की अपनी दलील। अविनाश ने एक नीले रंग की छोटी सी किताब अपने जेब से निकली और पूरे कोर्ट में दिखाते हुए कहा कि ये बाबा साहब आंबेडकर द्वारा लिखी गई संविधान की किताब। जिसने उन्हें वो ताकत दी है जो जमींदार की मनमानी के बदले उसे सजा दिलाएगी।
उन्होंने कहा कि वो इस बात को स्वाकार करते है कि उन्होंने अपनी मर्जी से मरीजों का इलाज किया था, और ठाकुर का बीच चौराहे पर विरोध कर अपमान भी किया था, लेकिन क्या वो वाकई में शांति भंग करना और मानहानी था.. उन्होंने कि संविधान में हर नागरिक को मौलिक अधिकार दिये गए है जिसमें अनुच्छेद 191 ए कहता है कि हर व्यक्ति को अपनी बात कहने औऱ अपने विचार प्रकट करने की आजादी है, जमींदार ने गरीबो के लागू दवाइयों को कब्जे में ले लिया और धूलिया बस्ती के लोगो को मरने के लिए छोड़ दिया तो उसके खिलाफ आवाज उठाना अपराध नहीं उनका अधिकार है। रही बात सरकारी डिस्पेंसरी के दायरे में क्लिनिक खोलने की बात तो अनुच्छेद 19 वन जी ने ये अधिकार दिया है कि कोई भी व्यक्ति भारत के किसी भी कोने में जाकर अपनी इच्छा के अनुसार जीविका के लिए काम कर सकता है।
उसके लिए उसे किसी की भी इजाजत की जरूरत नहीं है.. ये हर एक भारतीय का मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 14 के अनुसार सब एक समान होते है तो फिर दवाई के बंटवारे में भेदभाव क्यों, अनुच्छेद 21 भारत के हर किसी को जीने का अधिकार देता है, फिर उससे छीनने का हक किसने दिया। डॉ अविनाश ने हर कार्य को संविधान के दायरे में रह किया था, जिसका नतीजा ये हुआ कि उनकी दलीलों ने पूरे कोर्ट में सन्नाटा बिखेर दिया था। जज साहब ने फैसला सुनाया, डॉ अविनाश ने देश को संविधान की असली ताकत से रूबरू कराया है, उन्होंने बताया कि अब नया भारत है, यहां अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना अपराध नहीं उनका संवैधिनाकि मौलिक अधिकार है, और जमींदारी और सांमतवादी नीतियां खत्म हो गई है। डॉ ने जो भी किया वो उनका मौलिक अधिकार था.. इसलिए उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया गया और गजराज पर दवा की कालाबाजारी करने में मामला चलाया गया। पहली बार समाज के दलितों औऱ पिछड़ो को ये अहसास हुआ था कि न्याय सबके लिए समान हो गया है, जो गलत करेगा वो सजा काटेगा। यहां अब जाति देखकर नहीं गुनाह देखकर फैसला किया जायेगा। डॉ अविनाश का मामला संविधान की ताकत का जीवंत उदाहरण था।



