Babasaheb Ambedkar: बाबा साहब ने कभी भी पूंजीपतियों के आगे सिर नहीं झुकाया, उन्होंने हमेशा अपने स्वाभिमान का सम्मान किया , भले ही उन्हें गरीबी, लाचारी और अभावो में जीवन गुजरना पड़ा, लेकिन वो कभी पूजींपति ठाकुरो के गुलाम बनने के लिए तैयार नहीं थे.. यहां तक कि बरौड़ा रियासत में मिली सरकारी नौकरी भी उन्होंने केवल गुलामी और जातिगत भेदभाव के कारण छोड़ दी थी.. लेकिन वकील बनने के बाद उनके हाथों में एक ऐसी शक्ति आ गई थी, जिसने न केवल उन्हें बल्कि उनके जैसे सैकड़ो वंचितों को न्याय दिलाने का हथियार दे दिया था।
बाबा साहब बड़े बड़े वकीलो से जिस तरह से बहस करते थे उससे ब्रिटिश वकीलों की भी बोलती बंद हो जाया करती थी.. एक ऐसी ही बहस बाबा साहब ने उन पूंजीपति ठाकुरों के खिलाफ की थी, जब उन्होंने कानून की उस कमी को भी उजागर कर दिया, जिसके दम पर कानून गरीब, वंचितों को प्रताड़ित करने का लाइसेंस हासिल कर लेता है। अपने इस लेख में हम एक ऐसे ही मामले की कहानी को जानेंगे।
दलितों औऱ अछूतो से बेगारी करवाना ठाकुरों का शौक
महाराष्ट्र का एक छोटा गांव शिरूर, जहां की दलित बस्ती में रामू नाम का एक व्यक्ति अपनी पत्नी और दो बच्चो के साथ बेहद गरीबी और अभावो में किसी तरह से जिंदगी गुजार रहा था। ये वो समय था जब गांवों में रसूखदार ठाकुरों और पूंजीपतियों की ही सत्ता चलती थी। इसी गांव में एक बेहद क्रूर औऱ घमंडी ठाकुर भवानी सिंह की सत्ता चलती थी। महाराष्ट्र समेत लगभग भारत के हर हिस्से में दलितों औऱ अछूतो से बेगारी करवाना तो जैसे ठाकुरों का सबसे बड़ा शौक हुआ करता था। रामू भी भवानी सिंह के खेतों में एक बेगार मजदूर की तरह ही काम करता था, जो कुछ भी ठाकुर के पास से मिलता, उससे गुजारा चला रहा था, लेकिन परिक्षा की घड़ी तो तब आई जब उसकी 6 साल की बेटी को तेज बुखार हो गया। इलाज के लिए उसके पास पैसे तक नहीं थे.. केवल एक ही रास्ता था कि वो भवानी सिंह से जाकर पैसे के लिए मिन्नते करें।
ठाकुरों ने रामू को बुरी तरह से पीटा
रामू के पास कोई रास्ता नहीं था, उसने ठाकुर से जाकर मजदूरी की पैसे मांगे, लेकिन ठाकुर को ये अपना अपमान लगा, वो तुरंत भड़क गया, उसे लगा कि रामू ने ठाकुर के सामने आवाज उठाकर बगावत की है, बस फिर क्या था, ठाकुर ने रामू को गालियां देना शुरु कर दिया और अपने गुंड़ो को आदेश दिया था कि एक अछूत को ठाकुरो से नजरे मिलाने की सजा मिलनी चाहिए.. ठाकुर के गुंड़ो ने रामू को बुरी तरह से पीटा और हवेली के बाहर फेंक दिया। रामू बदहवास लहूलूहान होकर घर पहुंचा.. पूरा परिवार उसे देखकर दहाड़े मार कर रोने लगा और अपनी किस्मत को कोसने लगा.. मगर दूसरी तरफ ठाकुर का गुस्सा तब भी शांत नहीं हुआ। उसने रामू के खिलाफ एक बड़ा साजिश रची।
कुल्हाड़ी से जानलेना हमला
रात को करीब 1 बजे रामू के झोपड़ी के बाहर दस्तक हुई.. जब घायल रामू ने दरवाजा खोला तो 4 पुलिस वाले मौजूद थे.. वो लोग जबरन रामू के घर में घुसे, और तलाशी शुरु कर दी। रामू ने जब ऐसा करने का कारण पूछा तो उन लोगो ने बताया कि ठाकुर भवानी सिंह ने उसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई है कि तुमने उनके घर में चोरी की है, और जब उन्होंने तुम्हे रोकने की कोशिश की तो उन पर कुल्हाड़ी से जानलेना हमला किया। रामू और उसका परिवार बुरी तरह से डर गया.. कि अब क्या होगा.. मगर वो पुलिसवाले खुद ठाकुर के चापलूस थे तो भला बेचारा रामू कैसे बचता.. रामू को पुलिस ले गई.. तमाम यातनायें दी गई, ऐसे सबूत प्लॉट किये गये, रामू के घर से गहने और कुल्हाड़ी रख कर बरामद किये जाने का बहाना बनाया गया..मुद्दा साफ था कि किसी भी कीमत पर रामू रिहा नहीं होना चाहिए था।
सावित्री की न्याय मिलने की उम्मीद टूटी
नतीजा निचली अदालत से ये मामला जिला सत्र अदालत में पहुंच गया.. वहीं रामू की पत्नी सावित्री महीनों वकीलो के चक्कर लगाती रही, ठाकुर भवानी सिंह का नाम सुनकर और केस की फाइल पढ़ने के बाद वकील केस लेने के लिए ही तैयार नहीं होते थे। बेचारी सावित्री न्याय मिलने की उम्मीद टूटने के बाद कोर्ट के बाहर ही फूट फूट कर रोने लगी। इस दौरान वहां एक सामाजिक कार्यकर्ता ने उसे देखा और उसकी आपबीती पूछी.. सावित्री ने शुरु से अंत तक सब कुछ बता दिया.. जिसके बाद उस शख्स ने केवल इतना कहा कि तुम्हारी मदद केवल एक ही शख्स कर सकता है.. डा बाबा साहब भीम राव अंबेडकर.. जो कि मुम्बई में रहते है। सावित्री किसी तरह से बाबा साहब के कार्यलय पहुंची.. जहां गरीब, मजबूरों की पुकार सुनी जा रही थी।
बाबा ने वकालतनामा देकर बाबा साहेब का केस लिया
सावित्री बाबा साहब को देखते ही उनके पैरो में गिर पड़ी.. साड़ी के पल्लू के कुछ सिक्के निकाल कर दिये और कहा कि उन्हें देने के लिए बस यहीं है.. उसके पति को बचा लें.. बाबा साहब ने पैसे वापिस करते हुए कहा – मुझे ये पैसे नहीं चाहिए। तुम मुझे बताओ क्या हुआ है तुम्हारे साथ.. सावित्री ने रोते रोते सारी आपबीती बताई.. बाबा साहब अपनी कुर्सी से उठे और कहा जो गुनहगार है उसे सजा होगी, लेकिन जो बेगुनाह है उसे कभी सजा नहीं होगी। उसके बादल रामू पर फैसले की घड़ी भी आ गई। ठाकुर को पूरी उम्मीद थी कि रामू को उम्रकैद से कम सजा नहीं होगी.. लेकिन तभी कोर्ट में बाबा साहब ने एंट्री की.. उसके चेहरे का आत्मविश्वास ऐसा था कि सरकारी वकील भी घबरा गया। बाबा साहब ने अपना वकालतनामा दिया औऱ कहा कि वो रामू का केस लगेंगे.. सरकारी वकील ने मजाक उड़ाया कि आज तो फैसले की घड़ी है, सबूत गवाह सबकुछ रामू के खिलाफ है.. बाबा साहब ने बड़ी शांति से कहा कि मामले में अभी सिक्के का दूसरा पहलू जानना बाकि है।
घटना वाले दिन अमावस्या थी रामू का चेहरा कैसे देखा
बाबा साहब ने सबसे पहले पुलिस वाले को बुला कर पूछा कि जब भी जब्ती की जाती है तो दो स्वतंत्र गवाह रहते है, क्या रामू के घर से कुल्हाड़ी औऱ गहने जब्त करते वक्त गवाह थे। दरोगा ने तब ठाकुर के मुंशी और नौकर का नाम लिया.. बाबा साहब ने कहा कि ये तो ठाकुर के लोग फिर वो रामू पर लगे आरोपो का ही समर्थन करेंगे, गांव के कोई स्वतंत्र गवाह क्यों नहीं है। फिर बारी आई मुंशी की, मुंशी ने गवाही दी थी कि रामू ने हवेली में घुस कर हमला किया था, और वो उस वक्त करीब 100 कदम दूर था, बाबा साहब ने पूछा कि घटना वाले दिन अमावस्या थी तो उन्हें काली रात में रामू का चेहरा कैसे दिखा। मुंशी का चेहरा काला पड़ गया., फिर बारी आई ठाकुर भवानी सिंह.. वो कटघड़े में पहुंचा और रौब के साथ अपने हाथ मे चले चोट को दिखाया.. और कहा की रामू ने ही कुल्हाड़ी से वार किया था।
बाबा साहब एक मेडीकल रिपोर्ट लेकर उठे और जज के सामने आकर बोले.. मेडीकल रिपोर्ट के अनुसार घाव आधा इंच गहरा है, और नीचे से ऊपर की तरफ है, वहीं ठाकुर रामू के लंबा है, अगर रामू कुल्हाड़ी से वार करता को घाव ऊपर से नीचे बनता। लेकिन रिपोर्च बताती है कि ये घाव खुद से किया गया था। जज की भौंहे चढ़ गई.. बाबा साहब ने आगे गरजते हुए उस सच से पर्दा उठाया, जिसे छिपाया जा रहा था। उन्होंने रामू की दुर्दर्शा औऱ ठाकुर के अत्याचार की सारी सच्चाई कोर्ट को बताई.. बाबा साहब की दलीले इतना प्रभावशाली थी कि पूरे कोर्ट में सन्नाटा छा गया। बाबा साहब ने रामू को न केवल बाइज्जत बरी करवाया बल्कि ठाकुर, मुंशी, और पुलिस वालों के खिलाफ मामला दर्ज कर मुकदमा चलाने का आदेश भी दिया। बाबा साहब के कारण फिर से न्याय की जीत हुई थी, एक रसूखदार ठाकुर की सांमतवादी सोच की हार हुई थी। शिक्षा के दम पर ही हम अपने अधिकारों के लिए लड़ना सीखते है।



