जब Kanshiram के 22 संकल्पों ने जगाई बहुजनों में नई चेतना, जानिए राजनीति बदलने वाले वो मूलमंत्र

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Kanshiram: समाज के वंचित और पिछड़े लोगों को समाज में एक सम्मानजनक अधिकार और ओहदा दिलाने के लिए ज्योतिबा राव फूले, पेरियार, बाबा साहब अंबेडकर जैसे महान शख्सियत ने अपना पूरा जीवन झोंक दिया.. अछूतो, वंचितो के लिए इनकी लड़ाई को हमेशा स्वर्णिम अक्षरो में याद किया जाता है, लेकिन बाबा साहब अंबेडकर की लड़ाई में राजनैतिक बराबरी का भी महत्म था। जिसे आगे बढाया, आज के य़ुग के महापुरुष और दलितों को सामाजिक रूप से बराबरी दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले थे मान्यवर कांशीराम। जिन्होंने न केवल बहुजन समाज को एकजुट किया था बल्कि बहुजन समाज पार्टी की स्थापना कर उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजनो को एक मजबूत नींव भी दी थी। उन्होंने बहुजन समाज को कई संदेश दिये थे, जिनमें से आज हम 22 संदेशों के बारे में जानेंगे.. क्या थे कांशीराम के 22 प्रमुख संदेश.. जिसने बहुजनों में एक नई चेतना जगाई थी।

कौन थे Kanshiram?

कांशी राम, जिन्हें इस सदी का बहुजन नायक कहा गया  है…उत्तर प्रदेश में समाज सुधारक और बहुजन राजनीति में नई चेतना जगाने वाले कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के  पीरथीपुर बुंगा गांव में एक चमार जाति में हुआ था, जिन्हें पंजाब में रामदासिया सिख समुदाय कहा जाता है। हालांकि एक सिख होने के कारण उन्होंने बचपन में कभी भी ज्यादा जातिगत भेदभाव नहीं सहना पड़ा था.. लेकिन जब उन्होंने 60 के दशक में पुणे में विस्फोटक अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला में काम शुरु किया तब उन्हें पहली बार जातिगत भेदभाव झेलना पड़ा,… और यहीं से बहुजनों और वंचितो के लिए समान अधिकार की लड़ाई शुरु हो गई।

1964 में उन्होंने बाबा साहब अंबेडकर की किताब जाति का विनाश पढ़ी थी.. जिसने उनकी सोच और दिशा दोनो बदल दी.. कांशीराम ने शिक्षित  अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों को जागरूक करके खुद से जोड़ने के लिए 1971 में अखिल भारतीय एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक कर्मचारी संघ की स्थापना की। जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे कर नहीं देखा..

उन्होने बहुजनों को 22 प्रमुख संदेश दिया था..

जिस इस प्रकार है-

1,एक अंबेडकरवादी होने के नाते जहां बाबा साहब ने किताबों को जमा किया था, वहीं कांशीराम ने लोगो को इकट्ठा किया।

2, किसी लक्ष्य को पाने को चाहत सच्ची हो तो रास्ते खुद ही बनने लगते है

3, अगर आपका लक्ष्य सही नहीं है तो उसे पूरा न करने के हजारों बहाने बनते है।

4, भारत अब लोकतांत्रिक देश है, जहां क्या रानी, औऱ क्या दासी, सब एक समान ही है। सबके अधिकार सामान है।

5, जो आयोग्य है वहीं आरक्षण चाहते है, वो बेकार है, लेकिन कांशीराम के रास्ते पर जो चलेंगे, उन्हें वो योग्य बना सकते है। उनका निकम्मापन दूर किया जा सकता है.

6, कांशीराम कहते है कि मनुवाद व्यवस्था तभी हावी रह सकती है औऱ उंची जाति वाले दलितो पर राज कर सकते है जब दलित बेकार हो, अगर वो लायक हो जाते है तो सवर्णों का तख्ता पलत हो जायेगा।

7, दलित भला महलो में क्यों नहीं रह सकते है, उनका मोह झोपड़ी से क्यों नहीं जाता, जबकि हमें खुद को इंसान समझ कर अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए मेहनत करना चाहिए, खुद को शक्तिशाली और लायक बनाना चाहिए।

8, कांशीराम ने कहा कि वो कभी भी दलितो को प्रभावशाली व्यक्तियों की कठपुतली बन कर उनके इशारो पर चलते हुए नहीं देखना चाहते है।

9, वो कहते थे कि दलित समाज सदियो से कंगार और फटेहाल  स्थिति में रहने का आदि हो गया है, जबकि अब जरूरत है कि हम अपनी जिम्मेदारियो औऱ कर्तव्यों को समझे, और जो मिला है उसी में खुश रहने की आदत छोड़ दे।

10, ऐसी राजनीति पार्टी होनी चाहिए, जिसमें दलितो के हाथों में नेतृत्व होना चाहिए, हां उंची जाति अपनी खुशी से उस पार्टी का हिस्सा बन सकती है।

11, बहुजन समाज पार्टी में उंची जाति वालो को शामिल न करने के पीछे केवल एक ही ध्येय है कि उनके आने से पार्टी का मेन मोटो ही खो जायेगा और वो परिवर्तन को रोक सकते है।

12, उन्होंने कहा कि उन्हें उंची जाति के लोगो से डर लगता है क्योंकि वो जहां रहते है नेतृत्व करने की इच्छा रखते है, अगर ऐसा होता है कि जिस कारण हमारा आंदोलन शुरु हुआ, वो विफल हो जायेगा। जब तक मैं इस डर से नहीं निकल जाता, तब तक वो उंची जाति के नेतृत्व से दूर रहेंगे।

13, कांशीराम ने जातिवादी कांग्रेस से हमेशा दूरी बना कर रखी, वो कहते है कि कांग्रेस पार्टी के सदस्य उनसे मिलना चाहते है लेकिन कांशीराम ने उन्हें चेतावनी दी कि अगर कांग्रेस उन्हें कुछ देना चाहती है तो वो उनसे दूर रहे, हां अगर कुछ लेने की चाहत है तो उनका स्वागत है।

14, बहुजनों को अलग अलग जातियों में बंटने के बजाय एक ही समुदाय में खुद को बदलना होगा, तभी संगठन की ताकत दिखाई जा सकती हैष

15, कांशी राम कहते थे कि जाति है तभी तो उसका इस्तेमाल अपने समुदाय के फायदे के लिए किया जा सकता है, अगर किसी को उससे परेशानी है तो वो जाति व्यवस्था ही खत्म कर दें।

16, सिज समाज में ब्राह्मणवादा हावी है, वहां कुछ और कभी हावी नहीं हो सकता है इसलिए हमें संविधान की ताकत का इस्तेमाल करना चाहिये.. जो सामाजिक परिवर्तन को, मौलिक अधिकारों को समर्थन करती है।

17, जो सिस्टम दलितों को न्याय नही दे सकता है, उस सिस्टम को तोड़ना ही बेहतर है, हम बहुत समय से न्याय मांग रहे है लेकिन हमारा समाज न्याय से वंचित है।

18, भारत में फैसले असमानता की भावना को खत्म होने तक हमारी लड़ाई नहीं रूकेगी..हम जातिवादी व्यवस्था के सताये हर एक पीड़ित को एकजुट करेंगे.,.और उन्हें शसक्त बनायेंगे।

19, कांशीराम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की विचारधारा के सख्त खिलाफ थे, उन्होंने गांधी जी की शंकराचार्य और मनु से तुलना की थी, क्योंकि गांधी जी ने बड़ी चालाकी से 52 प्रतिशत ओबीसी को समाज में किनारे कर दिया था।

20, दलित समुदाय का भी राजनीति व्यवस्ता में प्रतिनिधि होना चाहिए, अन्यथा वो समुदाय मृत सामान है।

21, बहुजनों को सामाजिक न्याय के बजाय सामाजिक परिवर्तन पर जोर देना चाहिए, क्योंकि सामाजिक न्याय केवल नेतृत्व करने वाले पर निर्भर करता है लेकिन परिवर्तन होता है तो हमेशा के लिए ही होगा।

22, दलितो का राजनीति में सफल होना जरूरी है तभी सामाजिक और आर्थिक रूप से शसक्त हो सकते है। राजनैतिक सफलता के बल पर परिवर्तन संभव है।

कांशीराम ने दलितो को राजनैतिक शक्ति देने के लिए ही 1984 में बहुजन समाज पार्टी की शुरुआत की थी.. जिसने बहुजनव आंदोलन के जरिए दलितों और वंचितों को भी अपने अधिकारो के लिए जागरूक किया था। कांशी राम आज भी बहुजन समाज के लिए बेहद पूजनीय औऱ प्रभावशाली है।

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