जब नदी के बहते पानी से बुद्ध ने शिष्यों को दी जीवन की सबसे बड़ी सीख, आँखें खोल देने वाले किस्से! – Buddha River water story

Buddha River water story
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Buddha River water story: बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध ने कई शिक्षायें दी है, जो मानवता की रक्षा के लिए है, लेकिन क्या आप जानते है कि वो हर कर्म के साथ अपने शिष्यों को एक नई शिक्षा देते थे.. चाहे वो नदी का गंदा होकर फिर से साफ से हो जाना हो, या फिर पाप धोने के लिए गंगा  नदी में डुबकी लगाने वाले ब्राह्मणों को पाप धुलने का सही मार्ग बताना है.. यहां तक कि राजकुमार सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध बनने के सफर में भी रोहिणी नदी का महत्व बेहद खास है। अपने इस लेख में बुद्ध और नदी से जुड़े कुछ किस्सों को जानेंगे, कैसे नदी के कारण वो वैरागी बने तो वहीं कैसे नदी ने ही उनके शिष्यों को शांत मन का सही मुल्य बताने में सहायता की।

गौतम बुद्ध के वैरागी बनने के कई कारण इतिहासकार बताते है, जिसमें से एक कारण है रोहिणी नदी का बंटवारा, जब उनके पिता और उनके नाना आपस में लड़ पड़े थे, जिन्हें शांत करने के लिए ही सिद्धार्थ ने वैराग्य धारण कर लिया था। ये कहानी तब की है जब सिद्धार्थ कपिलवस्तु में राजकुमार बन कर रह रहे थे।

ताराचंद महाविद्यालय में बुद्ध के जीवन से जुड़े साक्ष्य

महराजगंज जिले के निचलौल में स्थित राजेंद्र प्रसाद ताराचंद महाविद्यालय में बुद्ध के जीवन से जुड़े कई ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद है, बुद्ध के जीवन को बेहद करीब से समझने वाले और खुद बौद्ध धर्म अपना कर नवयान बौद्ध परंपरा की शुरुआत करने वाले डॉ बाबा साहब भीम राव अंबेडकर की लिखी किताब लॉर्ड बुद्धा में उन्होंने बुद्ध के वैरागी बनने की अलग ही कहानी लिखी है, जिसे न तो किसी ने कभी पढ़ी होगी न सुनी होगी। जहां अब तक हम ये सुनते आये है कि राजकुमार के रूप में उन्होंने एक बच्चे, एक बिमार, एक बूढां और एक शव देख कर वैराग्य धारण करने का फैसला किया था, वहीं अंबेडकर कहते है कि बुद्ध के वैरागी बनने के पीछे का कारण उनके पिता और नाना के राज्य के बीच बहने वाली रोहिणी नदी का पानी का बंटवारा था।

रोहिणी नदी के पश्चिम में शाक्यों के वंश

बाबा साहब ने किताब में लिखा कि रोहिणी नदी के पूर्व में कोलियों वंश, जो कि बुद्ध के नाना का वंश था, उनकी राजधानी देवदाह थी, तो वहीं रोहिणी नदी के पश्चिम में शाक्यों के वंश की राजधानी कपिलवस्तु स्थित थी। ये छोटे छोटे गणराज्य थे, जो कौशल राजतंत्र के अधीन आते थे। यानि की अपने राज्य पर शासन करने का अधिकार तो उनके पास था लेकिन युद्ध जैसे बड़े फैसले वो खुद से नही ले सकते थे। दोनो नदी के बीच रोहिणी नदी उनकी जीवन धारा थी, लेकिन नदी का पानी अपने राज्य की तरफ मोड़ने को लेकर दोनो राज्यों में विवाद हो गया.. ये विवाद इतना बढ़ गया कि दोनो ने आपस में युद्ध करने का फैसला कर लिया..लेकिन बुद्ध कोलिय वंश के खिलाफ हमला करने के लिए तैयार नहीं हुए, जिससे नाजार दरबारियों ने उन पर राजद्रोह करने का आरोप लगा कर राज्य से निकाल दिया।

सिद्धार्थ के सन्यासी बनने से राज्यों के बीच का टकराव खत्म

मगर इसकी खबर जब कौशल राजतंत्र को लगी तो वो काफी नाराज हो गए और उन्होंने तय कर लिया कि अगर शाक्य कोलिय वंश पर हमला करता है तो वो भी शाक्यों पर हमला करेंगे..राजुकमार सिद्धार्थ ने जब ये अस्तथिरता देखी तो वो विचलित हो उठे और उन्होंने इस सब से विरक्त होने के लिए सन्यास धारण करने का फैसला कर लिया। बुद्ध के संयास लेने की खबर जब दोनो वंशो को लगी तो वो भागते हुए बुद्ध के पास पहुंचे औऱ वैरागी न बनने का आग्रह किया। सिद्धार्थ ने कहा कि अगर उनके सन्यासी बनने से दोनो राज्यों के बीच का टकराव खत्म हो सकता है और शांति स्थापित हो सकता है कि तो उनका वैरागी बनना ही सही है. सिद्धार्थ ने कहा कि हो सकता है कि इस कर्म के पीछे भी कोई बड़ा ध्येय छिपा हो। इसमें भी संसार का भला हो.. बुद्ध ने इस विचार के साथ अपने निर्णय को और मजबूत कर लिया और हमेशा के लिए गृह का त्याग कर दिया।

मेढ़क पर पैर पड़े जाने पर 108 बार गंगा स्नान

अगर रोहिणी नदी के पानी को लेकर शाक्य और कोलिय वंश के बीच लड़ाई न होती तो शायद बुद्ध को किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं पड़ती और न ही शांति स्थापित करने के लिए उन्हें वैरागी बनना पडता.. बुद्ध के जीवन में नदी का बहुत महत्व रहा… अपने ज्ञान के माध्यम से उन्होंने एक ऐसे ब्राह्मण के भ्रम को दूर कर दिया जो मेढ़क पर पैर पड़े जाने पर 108 बार गंगा स्नान करने गया था, क्योंकि वो अश्देध और पापी हो गया था और पवित्र होने के लिए गंगा स्नान अनिवार्य था। लेकिन बुद्नेध ने उस ब्राह्मण से पूछा कि अगर वाकई में गंगा में नहाने से पाप धुलते है, मुक्ति मिलती है तो फिरगंगा में जीव क्यों रहते है। वो तो जैसे ही गंगा में जन्में तभी उन्हें मोक्ष पा लेना चाहिए। .ये केवल एक भ्रांति है, भ्रम है जो लोगो को बेवकूफ बनाने के लिए फैलाई गई है।

बुद्ध ने बताया कि नदी केव हमारी प्यास ही नहीं बुझाती बल्कि वो हमे जीवन में शांत और विलेकशील रह कर कैसे मानसिक शुद्धता पाई जाती है उसकी भी सीख देती है। जैसे शांत पानी में कोई कंकड़ मारोगे तो वो थोडी देर के लिए पानी गंदा होगा, मगर उसे शांत छोड़ दोगे तो वो उस गंदगी के हटने पर जो शुद्ध और सही है उसे देख सकेगा, वैसे ही जब आप क्रोधित होते है, विचलित होते है तो आपको सही और गलत नहीं दिखता, इसलिए सदैव क्रोध और विचलित अवस्था में खुद को शांत करके वो समय गुजर जाने दिजिये. उसके बाद उस सच्चाई को देखिये, जो शांत मन रहने के बाद आपको समझ आया। यही जीवन का सार है। बुद्ध की शिक्षाओं ने सदैव मुक्ति का मार्ग की प्रशस्त किया है।

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