Babasaheb Ambedkar: किसी योद्धा के लिए उसका शस्त्र की सबसे अहम होता है लेकिन क्या जो जंग के मैदान में युद्ध लड़ता है, रक्तपात मचाता है वहीं योद्धा है, नहीं, हरगिज नहीं.. हर वो शख्स जो अपने लोगो के लिए लड़ रहा है, उनके भले के लिए, उनके उत्थान के लिए लड़ रहा है वो योद्धा है.. भले ही सकी लड़ाई तलवार से नहीं हो , लेकिन कलम से लड़ने वाली लड़ाई भी युद्ध है..वो युद्ध जो दलितो के भगवान बाबा साहब अंबेडकर ने पूरे जीवनभर लड़ा था.. और इस युद्ध का हथियार थी उनकी किताबें, उनकी शिक्षा और उनकी कलम.. जिसके दम पर बाबा साहब ने न केवल उन अछूतों, वंचितो और पिछड़ो को हुंकार भरने की ताकत दी थी।
बल्कि खुद उन्हें लड़ना भी सिखाया था। अपने इस लेख में हम बात करेंगे बाबा साहब से जुड़ी एक ऐसा कहानी की, जब पहली बार बाबा साहब को गर्व महसूस हुआ था अपनी इस ताकत पर.. जिसने एक 18 साल के लड़को को योद्ध बना दिया था। जानेंगे बाबा साहब से जुड़ी इस कहानी को।
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ये उस समय की बात है जब बाबा साहब अपने मुम्बई के अपने निवास स्थान राजगृह में रहा करते थे.. उनका ज्यादातर समय अपने घर में बनाई लाइब्रेरी में किताबों के बीच ही गुजरता था… कहते है कि उनकी लाइब्रेरी में करीब 35 हजार किताबें हुआ करती थी..ऐसे ही एक रात बाबा साहब अपनी किताबों में व्यस्त थे.. उन्हें देश का संविधान तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी, जिसके लिए वो दिन रात मेहनत कर रहे थे, वो भारत को ऐसा संविधान देना चाहते थे जो समाज को बराबरी दें, जातिगत भेदभाव से मुक्त देश हो.. इसलिए उन्होंने अपने द्वारपाल को सख्त आदेश दिये थे कि जब वो लाइब्रेरी में हो तो कोई उन्हें डिस्टर्ब न करें.. मगर एक रात अचानक 2 बजे के करीब दरवाजे पर जोर जोर से दस्तक हुई। चुंकि बाबा साहब की लाइब्रेरी दूसरे माले पर थी, और बंद होने के कारण आवाज उन तक नहीं पहुंची थी, लेकिन गार्ड ने चौकन्ने स्वर में दरवाजे के अंदर से आने वाले मेहमान का परिचय पूछा।
बाहर से एक कांपती हुई आवाज आई, मेरा नाम माधव है मुझे बाबा साहब से मिलना है.. पहरेदार ने दरवाजा खोला, तो स्तब्ध रह गया। सामने करीब 20 साल का एक नौ जवान था, जो भीगे होने के कारण बुरी तरह से कांप रहा था.. हाथ में एक मैली कुचैली कपड़े की पोटली थी.. उसकी स्तिथि बता रही थी कि कुछ तो उसके साथ बहुत बुरा हुआ था.. वो हाथ जोड़ कर बोला, साहब जी, मुझे बाबा साहब से मिलना है, कृप्या एक बार उनसे बुलवा दिजिये। पहरेदार ने भोहें सिकोड़ते हुए कहा कि समय देखा है, ये कई वक्त है बाबा साहब से मिलने का.. जाओ कल सुबह आना.. इस वक्त बाबा साहब तुमसे नही मिल सकते है। लेकिन माधव जो जैसे एक फैसला करके ही आया था कि या तो वो आज बाबा साहब से मिलेगा वरना वहीं प्राण दे देगा। वो मिन्नते करने लगा। मुझे बस एक बार अपने भगवान के दर्शन करने है, मैं विदर्भ के एक छोटे से गांव से कई हफ्तों की यात्रा करके आया हूं, मुझे औज और अभी ही न्हें देखना है।
वो इतना जोर जोर से मिन्नते कर रहा था कि आवाज दूसरी मंजिल पर बैठे बाबा साहब के पास भी पहुंची.. वो अपना काम छोड़ कर तुंरत नीचे आये, पहरेदा से पूछा, इतनी रात को शोर क्यों मचा रहे हो, कौन आया है इस गहरे तूफानी रात में। बाबा साहब की आवाज में गहराई और गंभीरता साफ नजर आ रही थी। पहरेदार ने माधव जी तरफ इशारा करते हुए कहा कि ये लड़का विदर्भ से आया है केवल आपसे मिलने.. मैने कहा कि वो कल आये लेकिन कहता है कि कल तक का इंतजार किया तो कुछ हमेशा के लिए खत्म हो जायेगा। बाबा साहब ने पलट कर माधव को काफी गंभीरता से देखा.. माधव की आँखे पीड़ा और हताशा की कहानी कह रहे थे, जो बहुत कुछ सह चुके थे। लेकिन कुछ बदलने की आग भी थी, जो बहुत कुछ जलाने के लिए तैयार थी।
बाबा साहब ने माधव को इशारा किया कि मेरे साथ चलो, वहीं पहरेदार से चाय लाने को कहा.. और माधव को लेकर किताबों के सागर में ले गए, यानि की अपनी लाइब्रेरी में। बाबा साहब ने कुर्सी देते हुए कहा कि कुर्सी पर बैठ जाओ.. एक महापुरुष के आगे वो खुद कुर्सी पर बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.. वो जमीन पर बैठने ही वाला था कि बाबा साहब ने तीखी आवाज में कहा.. जब तक तुम खुद का ही सम्मान नही करोगे, तो भला कोई दूसरा तुम्हें क्यों ही सम्मान देगा। सबसे पहले अपन सम्मान करना सीखो। माधव पूरे आत्मशक्ति के साथ कुर्सी पर बैठ गया। उसने बोलना शुरु किया.. गांव में दलितों को जहां आज भी केवल सेवा के लिए माना जाता है वैसे में मैने सवर्णो के स्कूल जाकर पढ़ने की हिम्मत दिखाई.. मुझे लगा कि शायद वहां से ही भेदभाव के खिलाफ लड़ाई शुरु की जा सकती है.. लेकिन वहां सवर्ण शिक्षक मुझसे सीधे मुंह बात कर नहीं करते, मैरे सवालों का जवाब तक नहीं देते।
जबकि सरकार ने तो सबको सामान शिक्षा का अधिकार दिया है.. माधव ने कहा कि केवल स्कूल में सवाल पूछने के बदले उसे अपमानित किया गया और स्कूल से निकाल दिया गया, बाबा साहब मैं तो बस पढ़ लिख कर अपने समाज के लोगो के लिए कुछ करना चाहता हूं, तो क्या ऐसी इच्छा करना गुनाह है। मुझे गुस्से में स्कूल जलाने का मन करता है.. मुझे रास्ता दिखाईयें। बाबा साहब की पुरानी यादें ताजा हो गई..बाबा साहब ने माधव को टेबल पर रखे लैंप की तरफ इशारा करके पूछा कि अगर इसकी आग को इस कमरे में फैला दिया तो पूरे लाइब्रेरी में आग लगा सकती है, मेरी सालों से जमा की गई किताबो की इस पूंजी को जला सकती है, लेकिन वहीं आग जब लैंप में जल रही है तो न केवल प्रकाश दे रहा है बल्कि उस अँधेरे को भी दूर कर रही जिससे व्यक्ति को कुछ नहीं सूझता, वैसे ही गुस्सा आपको ही नुकसान पहुंचाता है।
इसलिए गुस्से को काबू करके शिक्षा की शांति और ज्ञान से उसे नियंत्रित कर लो, जो तुम्हे उस, समाज की नींव रखने में सहायक होगी, जिसकी तुम कल्पना करते हो, हथियार उठाने से केवल कुछ लोग डरेंगे, लेकिन वो केवल डरेंगे तुम्हारा सम्मान नहीं करेंगे। इसलिए तलवार नहीं कलम का हथियार उठाओ, और दिखा दो उन लोगो को कि तुम कितने शाक्तिशाली हो, जहां तुम्हारी शिक्षा ही तुम्हारा हथियार बनेगी.. जहां तुन्हारी जाति से नहीं तुम्हारी काबिलियत तुम्हारी पहचान होगी। माधव ने बाबा साहब साहब से आज वो सीख ली थी, जो उसमें नई उर्जा भर चुकी थी, वो बाबासाहब के पैर छुमे के लिए झुका तो बाबा साहब ने उसे रोका, और कहा कि वाकई में मेरा सम्मान करते हो तो खुद को इतना शिक्षित बनाओ कि कोई तुम्हारी बराबरी न कर सकें। माधव आज बाबा साहब के एक बड़ी शिक्षा लेकर पूरे आत्मविश्वास के साथ लौट रहा था। उसके चेहरे की चमक लौट आई थी.. और हाथ में उसका सबसे बड़ा औप मजबूत हथियार, बाबा साहब की कलम थी। वहां से उसकी पूरी जिंदगी जो बदलने वाली थी।



