Ashok Choudhary: दलितों के मुद्दों पर खुल कर बोलने वाले, और उनके लिए न्याय की आवाज उठाने वाले कई दलित नेता हुए, लेकिन अपने साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने का हौसला सबके कहां होता है, और खासकर जब आपके सामने एक बड़ी पार्टी खड़ी हो। जिसके आप खुद एक हिस्सा हो, उनके खिलाफ आवाज उठाना और अपने लिए न्याय के लिए लड़ाई लड़ने के बजाय अक्सर नेता उसे पार्टी की इच्छा मान कर स्वीकार कर लेते है। लेकिन बिहार की राजनीति में एक ऐसे कद्दावर नेता हुए जिन्होंने न केवल अपने ऊपर लगे आरोपों को नकारा बल्कि उसका पूरी शक्ति से सामान भी किया, और जीत हासिल की। जी हां हम बात कर रहे है जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता और बिहार सरकार में दलित मंत्री.. अशोक चौधरी के बारे में..
जानें कौन है दलित नेता अशोक चौधरी
सितंबर 2025 में एक खबर बिहार से आई थी,,राजनीतिक रणनीतीकार और जनसुराज पार्टी सुप्रीम प्रशांत किशोर ने एक खुलासा करते हुए अशोर चौधरी और उनकी बेटी शांभवी चौधरी पर अरोप लगाते हुए कहा था कि अशोक चौधरी और उनकी बेटी ने अपने कई रिश्तेदारों के नाम पर 200 करोड़ रूपय की बेनामी संपत्ति बना रखी है। शांभवा चौधरी 2024 में पहली बार समस्तीपुर लोकसभा सीट से चुनी गई थी। जिसमें उनके पिता का प्रभाव भी काफी रहा था.. वहीं विधानसभा चुनावों से ठीक पहले जेडीयू नेता पर इस तरह का संगीन आऱोप लगने के बाद दलित मुद्दा औऱ ज्यादा उछला था। अशोक चौधरी समेत कई दलित नेताओं ने प्रशांत किशोर को जातिवादी कहते हुए कहा था कि एनडीए को दलितों का समर्थन मिल रहा है इसलिए प्रशांत किशोर ने एक दलित नेता को निशाना बनाया है।
महावीर चौधरी बिहार कांग्रेस के एक कद्दावर नेता
अशोक चौधरी बिहार के उन कद्दावर नेताओं में से एक है जो कभी भी अन्याय का समर्थन नहीं करते है.. 25 फरवरी साल 1968 को बिहार के शेखपुरा जिला के बरबीघा गांव में जन्मे अशोक चौधरी की बचपन राजनीति की उठा पटक के बीच ही गुजरा। उनके पिता महावीर चौधरी बिहार कांग्रेस के एक कद्दावर नेता थे। जिन्होंने अपने दम पर दलितो का समर्थन हासिल कर 8 बार विधायक चुने गए थे, साथ ही वो बिहार सरकार में मंत्री भी थे। वहीं अशोक चौधरी हमेशा से राजनीति का हिस्सा नही थे। उन्होंने 1991 में political science से ग्रेजुएश और पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की थी। जिसके बाद उन्होंने पॉलिटिकल साइंस में ही पीएचडी करने का फैसला किया और उनके शोध का विषय था।
अशोक चौधरी ने पिता को देखकर राजनीति सीखी
“स्वतंत्र भारत में अनुसूचित जाति की महिलाओं” (Scheduled Castes women in Independent India).. इस थीसिस के दम पर उन्होंने पीएचडी हासिल की और वो डॉ अशोक चौधरी कहलायें। अशोक चौधरी अपने पिता को देखते हुए बड़े हुए थे, वो जानते थे कि बिहार में दलितो की स्थिति कैसी है, हालांकि उन्हें कभी जातिगत भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन अपने आसपास उन्होंने दलितो की स्थिति को देखते हुए दलित समाज को सदैव प्रोत्साहित किया कि कुछ भी हो जायें, अगर आपने गलत नहीं किया है तो आपको किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है।
कांग्रेस यूथ का हिस्सा बने अशोक
अशोक चौधरी एक न्याय प्रिय व्यक्ति है.. और उनके कार्यनीति बताती है कि उन्होंने खुद को एक जाति विशेष के दायरे में बांध कर नहीं रखा है। वो सभी जाति के लोगो के लिए सोचते है, उनके लिए खड़े रहते है। सक्रिय राजनीति में आने से पहले वो दलितो को एकजुट करने औऱ उन्हें उनकी ताकत पहचानने के लिए प्रेरिक करने के लिए कांग्रेस यूथ का हिस्सा बने थे। यहां कांग्रेस के प्रति दलितो की राय बदलने में उन्होंने जमीनी स्तर पर कार्य किया था। अशोक चौधरी ने अपनी पीएचडी करने के बाद साल 2000 में राजनीति में कदम रखा था, और उनके विचारो के कारण वो पहली ही बार में कांग्रेस प्राटी की टिकट से बरबीघा विधानसभा सीट से चुनाव लड़े औऱ जीत हासिल की। उनका प्रभाव देखते हुए पहली ही जीत के बाद उन्हें राबड़ी देवी के मंत्रीमंडल में कारा राज्य मंत्री चुना गया।
सोनिया गाँधी ने बिहार कांग्रेस अध्यक्ष पद से किया बर्खास्त
2005 में वो फिर से जीते लेकिन 2010 में उनकी हार हुई.. मगर फिर भी उनका कद बढ़ रहा था.. जिसे देखते हुए 2013 में अशोक चौधरी को बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी (BPCC) का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। अशोक चौधरी दिनरात एक करके बिहार में कांग्रेस की जमीन मजबूत करने में लगे रहे थे, लेकिन 2015 में जब कांग्रेस ने आरजेडी से हाथ मिलाया तो अशोक चौधरी ने इसका विरोध किया था। उन्होंने कांग्रेस आलाकमान को सलाह दी थी कि वो आरजेडी से दूर रहे वर्ना उनकी छवि भी खराब हो जायेगी और जनता का भरोसा वो खो देंगे, लेकिन कांग्रेस ने उनकी बात मानने के बजाय 2017 में सोनिया गांधी ने उन्हें बिहार कांग्रेस अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिया था। अशोक चौधरी को काफी आहत पहुंचा था.. वो हमेशा से कहते थे कि आरजेडी बिहार के कांग्रेस नेताओ के साथ भेदभाव पूर्ण व्यावहार करती है।
17 साल पुराना कांग्रेस से रिश्ता टूटा
जिससे उन्हें अपमानित महसूस होता है। अशोक चौधरी ने कांग्रेस नेताओ का ये फैसला मानने से इंकार कर दिया और 17 साल पुराना कांग्रेस से रिश्ता टूट गया। जब आरजेडी के कारण उन्हें इस तरह से अपमानित किया गया तो उन्होंने मीडिया के सामने रोते हुए बयान दिया था कि दो पीढ़ी से पार्टी की सेवा करने के बाद भी केवल दलित होने के कारण बलि का बकरा बना कर इस तरह से अपमानित किया गया है। यहां तक कि एक सम्मानजनक विदाई तक नहीं दी गई। वहीं 2017 में नीतिश कुमार ने भी महागठबंधन तोड़ कर बीजेपी का हाथ थामा तो अशोक चौधरी ने कांग्रेस छोड़ कर जेडीयू का हाथ पकड़ लिया। वहीं कांग्रेस के बिहार प्रभारी सीपी जोशी ने आरोप लगाया कि अशोक चौधरी ने नीतिश कुमार के साथ मिलकर साजिश की और कांग्रेस के विधायको को तोड़ा है।
सीएम सम्राट चौधरी के बेहद करीबी
इन सभी आरोपो के बाद अशोक चौधरी ने मार्च 2018 में तीन अन्य विधान परिषद सदस्यो के साथ आधिकारिक रूप से जेडीयू जॉइन कर ली थी.. आज भी वो जेडीयू के एक प्रमुख नेता माने जाते है जो पूर्व सीएम नीतिश कुमार औऱ वर्तमान सीएम सम्राट चौधरी के बेहद करीब है। वो आज भी बिहार सरकार में खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री (Minister for Food and Consumer Protection) हैं.. इतना ही नहीं राजनीति के साथ साथ वो एक शिक्षिक भी है, जो कि ए.एन. कॉलेज (A N College, Patna) के राजनीति विज्ञान विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर है और बिना वेतन लिए बच्चो को बढ़ाते है। एक शिक्षक जो सबको न्याय और बराबरी की सीख देता है वो भला खुद कैसे अन्याय सहता.. इसलिए अशोक चौधरी एक ताकतवर छवि के नेता कहलाते है।


