Financial Emergency: Indian constitution में तीन तरह की इमरजेंसी का जिक्र किया गया, नेशनल इमरजेंसी यानी कि राष्ट्रीय आपातकाल, प्रेसिडेंट रूल्स जिसे राष्ट्रपति शासन या फिर राज्य आपातकाल कहा जाता है और फाइनेंशियल इमरजेंसी यानी कि वित्तीय आपातकाल। संविधान के भाग 18 में अनुच्छेद 352 से लेकर अनुच्छेद 360 तक में तीनों आपातकालों के बारे में बताया गया है। हालांकि भारत में जहां पूरे देश में नेशनल इमरजेंसी 3 बार लगी है, राज्यों में लगने वाला राष्ट्रपति शासन अब तक 134 बार लगा है तो वहीं वित्तीय आपातकाल संविधान लागू होने के बाद कभी भी नहीं लगाया गया है। लेकिन बावजूद इसके वित्तीय आपातकाल का बारे में आपका जानना जरूरी है। क्योंकि मान लीजिए कि कभी ऐसी सिचुएशन आ जाए, जब देश में फाइनेंशियल इमरजेंसी लगानी पड़े तो इसी सूरत में आपको क्या क्या करना चाहिए, और उसके पहले कैसे इसकी तैयारी करें साथ ही अगर ये लग जाता है तो आपको किन किन बातों का ध्यान रखना अनिवार्य है। अपने इस लेख में हम फाइनेंशियल इमरजेंसी को डिटेल में जानेंगे।
जानिए क्या है वित्तीय आपातकाल – Financial Emergency
Indian constitution के आर्टिकल 360 में फाइनेंशियल इमरजेंसी यानी कि वित्तीय आपातकाल की स्थिति, उससे निपटने के समाधान, उसे लागू करने और लागू करने के बाद के नियमों के बारे में बताया गया है। आर्टिकल 360 कहता है कि जब देश बहुत भारी आर्थिक संकट से जूझ रहा हो, और देश को चलाने के लिए जिस बेसिक रिसोर्सेज़ की जरूरत हो, वो भी पूरे नहीं हो पा रहे हो तो ऐसी सूरत में केंद्र सरकार के पास ये अधिकार होगा कि वो राष्ट्रपति की मजूरी के साथ देश में फाइनेंशियल इमरजेंसी लागू कर सकते है। इसी स्थित 1991 के बनी थी, जब देश मे फॉरेन एक्सचेंज क्राइसिस के कारण केवल दो हफ्तों का ही एक्सपोर्ट करने की फॉरेन करेंसी बची थी।
भारत में पहली बार वित्तीय आपातकाल
भारत सरकार को देश का 20 टन सोना यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड को गिरवी रखना पड़ा और फिर बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान के पास गिरवी करीब 47 टन सोना गिरवी रख कर देश को चलाने के लिए करीब 605 मिलियन डॉलर जुटाये थे, उस वक्त स्थिति ऐसी थी कि देश में पहली बार वित्तीय आपातकाल लगाने की नौबत आ गई थी, लेकिन तभी सरकार में। फाइनेंस मिनिस्टर डॉ मनमोहन सिंह ने LPG रिफॉर्म लागू कर दिया, जो नई इकनॉमिक पॉलिसी थी जिससे देश में पहली बार libralisation, प्राइवेटाइजेशन, और ग्लोबलाइजेशन को शुरुआत हुई, उसने देश की अर्थव्यवस्था को बूम पर पहुंचा दिया था। लेकिन मानिये की अगर फाइनेंशियल इमर्जेंसी लागू हो जाती तो इसी सूरत में क्या होता।
कब होगी फाइनेंशियल इमर्जेंसी लागू
आर्टिकल 360 के तहत राष्ट्रपति को ये शक्ति दी गई कि की अगर उन्हें ये कहता है कि भारत के किसी भी हिस्से में या पूरे देश में आर्थिक संकट है, या देश की साख पर बन आई है तो ऐसे में वित्तीय आपातकाल लगा दिया जाता है। जिसके लगने के 2 महीने के अंदर दोनों सदनों राज्यसभा और लोकसभा से मंजूरी मिलनी चाहिए। फाइनेंशियल इमर्जेंसी लागू होने के बाद इसकी कोई समय सीमा नहीं होती, ये अनिश्चितकाल के लिए लगाई जा सकती है। जिसके लिए हर 6 महीने में उसे एक्सटेंड करके की जरूरत नहीं होती।
अगर फाइनेंशियल इमर्जेंसी लागू हो जाती है तो सबसे पहले केंद्र और राज्य में जितने भी सरकारी पदों पर काम करने वाले कर्मचारी है उनके वेतन में कटौती की जाएगी। वहीं उसमें सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट समेत सभी कोर्ट के जज शामिल है। केंद्र सरकार के पास शक्ति होती है कि वो किसी भी राज्य की फाइनेंशियल इश्यू को लेकर फैसला ले सकते है। चाहे वो बढ़ाने को लेकर हो या कटौती करने को लेकर। उसके अलावा राज्य और केंद्र सरकार जो भी मनी बिल लाती है उसे पहले राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा, जब तक वो परमिशन नहीं देते तब तक बिल आगे नहीं बढ़ेगा। इसी के साथ राष्ट्रपति के पास ये शक्ति होती है कि वो टैक्स और इनकम को लेकर राज्य या केंद्र के जो भी बदलाव करना चाहे कर सकते है। वित्तीय आपातकाल में सबसे ज्यादा असर सरकारी व्यवस्था पर ही पड़ेगा। हालांकि अब तक इसी स्थिति उत्पन्न नहीं हुई है।



