Top 5 Dalit news: बाबा साहब ने कहा था कि शिक्षा ही दलितों को जातिगत भेदभाव से बचा सकती है लेकिन संविधान लागू होने के करीब 76 सालों के बाद भी न तो उन्हें सम्मान से शिक्षा मिल रही है और न ही समानता। तो चलिए आपको इस लेख में पिछले 24 घंटे में दलितों के साथ होने वाली घटनाओं के बारे में बतायेंगे, जो आपको ये सोचने पर मजबूर कर देगा कि क्या वाकई में बाबा साहब की सीख अब काम भी कर रही है या ये केवल किताबी बातें मात्र रह गई है।
केरल के मल्लपुरम में दलित पीएचडी छात्रा से भेदभाव
1, दलितों से जुड़ा पहला मामला केरल के मलप्पुरम से है, जहां पिछले 5 दिनों से दलित जाति की छात्रा ने जातिगत भेदभाव को लेकर अपने ही कॉलेज फैकल्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दरअसल ये मामला मलप्पुरम के थुंचथ एझुथाचन मलयालम विश्वविद्यालय (टीईएमयू) का है। जहां पर्यावरण विज्ञान विद्यालय में डॉक्टरेट करने वाली दलित छात्रा अनाघा सासी 15 अगस्त से ही कॉलेज के बाहर धरने पर बैठी है। अनाघा ने अपने ही सहायक प्रोफेसर अरुण बाबू वी पर आरोप लगाया है कि उसने 2 साल पहले मार्च 2024 में ही दाखिला लिया था, लेकिन उसकी जाति के कारण आज तक उसे लैब इस्तेमाल ही नहीं करने दिया गया। इतना ही नहीं जब अनघा ने प्रोफेसर के इसका कारण पूछा तो उन्होंने अनघा पर जातिगत टिप्पणी करते हुए कहा कि उसकी जाति के कारण उसे दाखिला मिला है। अनाघा ने बताया कि पहले तो उससे लैब औऱ क्लास की साफ सफाई कराई जाती थी, लेकिन दो साल होने के बाद भी उसपर कई बार जातिगत टिप्पणी की गई, जो अब बर्दाश्त के बाहर हो गया था, क्योंकि प्रोफेसर की हरकत से उसकी शिक्षा में बाधा आ रही थी, इस कारण थक हार कर छात्रा न्याय के लिए खुद धरने पर बैठ गई है। अनाघा ने बताया कि बाकी बच्चों के पढ़ाते वक्त उसे क्लास के बाहर कर दिया जाता है या उसे जानबूझ कर खड़ा रखा जाता है। यहां तक कि अनाघा को विरोध को देखते हुए उसकी फेलोशिप को कैंसिल कर दिया है.. औऱ उससे हर्जाने की मांग की जा रही हा। अनघा के आरोपो से अब सनसनी मच गई है.. वहीं प्रोफेसर ने इन आरोपो को खारिज किया है। वहीं पीड़िता ने उच्च शिक्षा मंत्री आर. बिंदू से मदद मांगी है लेकिन वहां से अब तक कोई मदद नहीं मिली है.. अब देखना ये होगा कि छात्रा के इस खुलासे के बाद प्रशासन का क्या रवैया होता है।
केवल चमार बोलने से जातिगत अपमान नहीं होता
2, दलितों से जुड़ा अगला मामला उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से है। जहां जातिगत टिप्पणी को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक कड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने ज्योगत टिप्पणी को एससीएसटी एक्ट के दायरे से बाहर रखने की बात है, बशर्ते वो टिप्पणी किसी को अपमानित करने के लिए intentional न कही गई हो। न्यायमूर्ति संतोष राय ने एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि जब तक अपमानित करने के लिए चमार जैसे शब्दों का इस्तेमाल न हो, तब तक वो प्रथम दृष्टया एससीएसटी अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जाता है। दरअसल ये मामला बरेली जिले के इज्जतनगर पुलिस स्टेशन का है जहां हिम्मत सिंह, उसके पिता वेगराज सिंह और बड़े भाई दौलत के खिलाफ जातिगत टिप्पणी केरने को लेकर मामला दर्ज कराया गया था। लेकिन सबूतो के अभाव में वेगराज सिंह और दौलत सिंह को रिहा कर दिया गया, मगर कोर्ट ने अब इस मामले में सुनवाई करते हुए तर्क दिया कि केवल चमार बोलने से ये साबित नहीं होता कि ये मानहानी करने के लिए गलत इरादे से बोला गया था। इस मामले में अपील करने वाले की स्पष्ट भूमिका का पता नहीं चल रहा है.. इसलिए ये सिद्ध ही नहीं होता है कि जातिगत अपमान किया गया है। इसलिए ये मामला ही बेबुनियाद है.. कोर्ट के फैसले के बाद जातिगत अपमान करने की बात करके जो मुकदमा दर्ज किया गया था वो रद्द हो गया.. लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब पीड़ित ने कहा कि उसका जातिगत अपमान हुआ.,..और वहां चश्मदीद भी थे तो फिर कोर्ट किस भूमिका को तलाश रही थी। कोर्ट के इस फैसले से क्या आप सहमत है।
बांदा में दलित उत्पीड़न के आरोपी को 4 साल की सजा
3, दलितों से जुड़ा अगला मामला उत्तर प्रदेश के बांदा से है, जहां एक दलित नाबालिक किशोरी को आखिरकार 6 साल बाद फाइनली न्याय मिल ही गया। ये घटना बांदा के चिल्ला थाना क्षेत्र के एक गांव का है, जब 3 जनवरी 2021 को पीड़िता की मां ने पुलिस को तहरीर दी थी कि एक मनचला उसे पिछले काफी समय से तंग कर रहा था, लेकिन 29 दिसंबर 2020 को शाम को 4 बजे के करीब जब पीड़िता घर के बाहर खेल रही थी तब आरोपी सुकदेव बच्ची के साथ अश्लील हरकतें करने लगा। जिसके बाद वो बच्ची को बहलाने फुसलाने लगा लेकिन पीड़िता ने शोर मचाना शुरू कर दिया, जिसक बाद पीड़िता की मां वहां पहुंच गई। लेकिन आरोपी ने दोनों माँ बेटी को जातिसूचक गालियां देते हुए धमकी दी कि आज वो बच गई है लेकिन अगली बार नहीं बचेगी। जिसके बाद पुलिस ने तुरंत जांच शुरू की और आखिरकार करीब 6 साल के बाद विशेष लोक अदालत ने आरोपी को 4 साल की सजा और 8 हज़ार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माना न भरे जाने पर पांच महीने की सजा बढ़ जाएगी। जुर्माना पीड़िता की मदद के लिए दिया जाएगा। शायद इसे ही कहते है देर आए दुरुस्त आए।
गाजियाबाद में दलित युवक की संदिग्ध मौत
4, दलितों से जुड़ा अगला मामला उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से है जहां एक दलित युवक की छत से गिरने से हुई मौत के बड़ा खुलासा हुआ है। पीड़ित परिवार ने मृतक की प्रेमिका और उसके परिवार पर दलित युवक की हत्या किए जाने का शक जताया है। पीड़ित परिवार का कहना है दोनों के बीच जातिगत भेदभाव के कारण उनके बच्चे की ऑनर किलिंग हुई है। ये सनसनीखेज घटना 13 अगस्त को तब घटी थी जब पुलिस को खबर मिली कि गाजियाबाद के कवि नगर में एक युवक की ऊंची बिल्डिंग से गिर कर मौत हो गई। शुरुआत में तो सब कुछ नॉर्मल लग रहा था , लेकिन इस घटना के करीब एक हफ्ते बाद पीड़ित परिवार ने खुलासा किया कि युवक की प्रेमिका ऊंची जाति की थी और युवक उससे शादी करना चाहता था, लेकिन लड़की के घरवालों ने इसका विरोध किया। इसी बीच लड़की के कहने पर वो परिवार से मिलने गया था लेकिन उसकी मौत की खबर आई। पुलिस ने पीड़ित परिवार की तहरीर पर तुरंत एक्शन लिया scst एक्ट लगा कर मामले की जांच शुरू कर दी है। वहीं कथित आरोपी परिवार से पूछताछ जारी है है। वहीं पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक गिरने के का बहुत क्या खून बहने से उसकी मौत हुई थी। इस मामले में पीड़ित परिवार के आरोपों के बाद पुलिस नए एंगल से मामले की जांच में जुट गई है। हालांकि हैरानी की बात है अभी तक किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया गया है। अब देखना ये होगा कि पुलिस जांच के बाद क्या खुलासा होता है।
लखनऊ के कैब ड्राइवर का नया वीडियो
5, दलितों से जुड़ा अगला मामला rapido द्वारा 99 सालों का बैन झेलने वाले कैब ड्राइवर को लेकर है। लखनऊ में कैब चलने के दौरान जब पीड़ित ड्राइवर ने जातिगत टिप्पणी किए जाने के खिलाफ पैसेंजर को आधे रास्ते में उतार दिया तो इस मामले ने बड़ा तूल पकड़ा। Rapido ने एक्शन लिया और 99 साल के लिए ड्राइवर को बैन कर दिया गया लेकिन इस मुद्दे को लेकर इतना ज्यादा बवाल हुआ कि आखिरकार rapido को झुकना पड़ा और निलंबन भी रद्द करना पड़ा। इसकी जानकारी खुद कैब ड्राइवर अंकित कुमार ने वीडियो जारी कर दी है। अंकित ने उन तमाम लोगों का धन्यवाद किया जो उसकी इस मुसीबत की घड़ी में खड़े थे, और rapido के बॉयकॉट करने की मुहिम चला रहे थे। अंकित ने भीम आर्मी चीफ चंद्र शेखर आजाद और उनके सभी कार्यकर्ताओं का तहे दिल से आभार व्यक्त किया है जो इस नाजुक वक्त में शुरू से उसके साथ खड़े थे। Rapido ने जिस तरह से बहुजन एकता के आगे हार मानी, वो सबूत है कि बहुजन भले ही कमजोर हो, लेकिन अगर वो एकजुट हो जाएं तो करोड़ों की कंपनी को भी झुका सकते है तो फिर कोई सरकार और राजनेता भला क्या कर सकते है। वैसे आप बहुजन एकता की ताकत को लेकर क्या सोचते है।



