Article 368: बाबा साहब ने जब संविदान तैयार किया था तब उन्हें पता था कि मौजूदा स्थिति जैसी भी हो, आने वाले समय में कई बड़े बदलाव आयेंगे.. और जो संविधान उन्होंने तब तैयार किया था वो तब के समय की मांग थी, लेकिन समय के साथ स्थिति और जरूरते भी बदलती गई और संवैधानिक अधिकारों में भी बदलाव किया जाना अनिवार्य माना गया। इस बदलाव को बाबा साहब ने भी संविधान के आर्टिकल 368 में स्वीकार किया है। संविधान में जो भी प्रावधान, आर्टिकल दिये गए है, उनमें जरूरत पड़ने पर बदलाव किये जा सकते है.. बशर्ते उसके लिए कुछ शर्तों को पूरा करना अनिवार्य है। जिसे ही संविधान संधोधन प्रक्रिया कहा गया। अपने इस लेख में हम संविधान संशोधन प्रक्रिया Constitutional Amendment – Article 368 के बारे में जानेंगे। कैसे केवल संसद ही कोई कानून बदल सकती है और उसके लिए भी कई प्रोसेस है।
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संविधान में संशोधन कैसे किया जाता है?
संविधान के भाग 20 में संविधान में की जानी वाली संशोधन की प्रक्रिया के बारे में बताया गया है जो कि आर्टिकल 368 में मौजूद है। संशोधन को प्रक्रिया कैसे फॉलो होगी, इससे साउथ अफ्रिका के संविधान से लिया गया है। 1971 में सुप्रीम कोर्ट ने ये माना था कि संसद को संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने का अधिकार होगा सिवाये बेसिक स्ट्रक्चर के। तब 24 संशोधन किया गया था.. और इस क्लोज को आर्टिकल 368 में शामिल किया गया था। संसद को दिये गए इस शक्ति को संविधायी शक्ति (constituent power) कहा जाता है। संविधान में किसी भी तरह की शक्ति केवल संसद के पास ही होगी.. राज्यों की विधानसभा कोई भी ऐसा प्रावधान नहीं ला सकती है जो संवैधानिक न हो..और न ही कोई बदलाव कर सकती है। संशोधन किये जाने से पहले विधेयक तैयार किया जाता है, जिसे राज्य सभा और विधानसभा में प्रस्तावित किया जाता है, वहां से मंजूरी मिलने के बाद उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। जहां से मंजूरी मिलने के बाद भी संशोधन किया जा सकता है,..वही अगर किसी संशोधन को सदन में बहुमत नही मिलता तो सरकार वीटो पावर इस्तेमाल करके भी संशोधन नहीं कर सकती है।
किसी भी आर्टिकल में संशोधन करने के लिए तीन अलग अलग प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है।
1, साधारण बहुमत,- संशोधन करने के दौरान जो विधेयक केंद्र सरकार संसद में पेश करती है उसे लागू करने के लिए संसद में किये जाने वाले वोट में 50 प्लस 1 प्रतिशत वोट होना चाहिए.. साधारण बहुमत वाले संशोधन आर्टिकल 368 की सीमा से बाहर की होते है। जैसे नए राज्यों का गठन किया जाना, सीमाओं और नामों में बदलाव करना इत्यादी कार्य।
2, विशेष बहुमत- विशेष बहुमत के दौरान संसद में जितने भी सदस्य है, सभी को वोट डालने होगा औऱ उसमें दो तिहायी बहुमत की मंजूरी मिलनी चाहिए। ये अनुच्छेद 368 के उपधारा 2 में शामिल है। इसमें मौलिक आधिकारों में बदलाव हो या फिर राज्य की नीतियों के निदेशक सिद्धांतो में बदलाव करना हो तो आर्टिकल 368 का इस्तेमाल होगा।
3, विशेष बहुमत के साथ राज्यों का विशेष अनुसमर्थन- जब संशोधन से राज्य और केंद्र सरकार के बीच संघीय ढांचे में बदलाव आ रहा हो, और उससे दोनो सरकारो पर असर पड़ने वाला है, तब विशेष बहुमत के साथ साथ 50 प्रतिशत राज्यों का भी समर्थन होना अनिवार्य है। इसका इस्तेमाल कई जगहों पर होता है जैसे राष्ट्रपति का चुनाव प्रक्रिया में बगलाव लाना हो, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट से जुड़े प्रावधानों के लिए, विधायी शक्तियों के बंटवारे के मामले में, कार्यपालिका की शक्तियों के बंटवारे के मामले में.. विशेष बहुमत के साथ साथ राज्यों के समर्थन की भी आवश्यकता है। इस सारी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद संसद से पास होने के बाद अंत में राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है ताकि वहां से मंजूरी मिले। जिसके बाद ही संविधान का संशोधन स्वीकार्य होता है।



