Rahul Gandhi Manusmriti statement: 25 दिसंबर 1927 को बाबा साहब अंबेडकर ने हिंदूवादी परंपरा को बताने वाले ग्रंथ मनुस्मृति का दाह कर दिया था.. जिसमें दलितो को अपने मालिक का गुलाम करने के लिए कहा गया था.. ज्यादातर लोग मनुस्मृति को जलाने की यहीं वजह जानते होंगे…लेकिन सच तो ये है कि आज भारत की महिलायें पढ़ी लिखी होकर भी केवल चूल्हा चौका करने के लिए, बच्चों को पैदा करने और उन्हें पालने के लिए, घर परिवार का ख्याल रखने के लिए है, जैसी घिनौनी मानसिकता की वजह यहीं सो कोल्ड धर्मग्रंथ मनुस्मृति ही है।
राहुल गांधी ने मनुवादी मानसिकता पर साधा निशाना
इसने समाज को मानसिक गुलाम बनाया जिसमें देश की महिलाओं को पैरो की जूती और गुलाम से ज्यादा कुछ नहीं समझा, लेकिन अब देश बदल रहा है…अब मनुस्मृति का नहीं संविधान का कानून चलता है… और ये संवाधान ही औरत हो या पुरुष, सबको बराबरी देता है। लेकिन फिर भी रूढ़ीवादी परंपरा को फॉलो करने वाले हमारे बुजुर्गो के बाद इस मानसिकता का कोई गुलाम न हो उसके लिए खुद कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पुणे में आयोजित होने वाले ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में पहुंचे थे। यहां उन्होंने महिलाओं के अधिकारों, उनके साथ होने वाले भेदभाव, उनकी सामाजिक स्थिति को लेकर खुल कर बातचीत की..इतना ही नहीं राहुल गांधी ने छात्राओं को जागरूक करते हुए मनुस्मॉति को लेकर भी तीखी बातें की।
राहुल गाँधी ने छात्राओ को संबोधित किया
इस लेख में राहुल गांधी के उन विचारों को जानेंगे, जो महिलाओं को बराबरी देने की बात करते है। राहुल गाँधी ने छात्राओ को संबोधित करते हुए आज की नारी प्लेन भी उड़ा रही है, और बम भी.. उन्हें सिर्फ ‘बेटी, पत्नी या मां’ की चारदीवारी तक सीमित नहीं रखा सकता देश की करीब 70 करोड़ महिलाएं, 70 करोड़ अलग-अलग सपनों, उम्मीदों और यात्राओं का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो भारत की सबसे बड़ी ताकत और संपत्ति हैं। राहुल गांधी ने हमारे समाज में महिलाओं को लेकर बनी पारंपरिक औऱ विकृत सोच पर भी तीखे सवाल सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि समाज अक्सर एक औरत को केवल तीन दायरों—बेटी, पत्नी और मां—में ही बांट कर देखता है। मैं ये नही कहता कि इन पारिवारिक रिश्तों में कोई बुराई है, लेकिन किसी भी महिला की पूरी जिंदगी और पहचान सिर्फ इन्हीं रिश्तों से तय नहीं हो सकती। लोगों से रिश्ते होना एक बात है, लेकिन किसी दूसरे का ‘हो कर खुद के अस्तित्व को भुला देना बिल्कुल अलग।
महिलाओं की भूमिका के बिना देश में तरक्की संभव नहीं
हर एक महिला किसी की प्रसर्नल संपत्ति नहीं हैं, बल्कि आपकी अपनी पहचान है। आप सिर्फ अपनी हैं।” बेहतर है कि महिलाएं अपनी जिंदगी अपने हाथो में ले लें, खुद पर भरोसा करें, और अपने फैसले खुद लें। महिलाओं को अब मनुस्मृति का गुलाम बनने की जरूरत नहीं है. ये पढ़ा लिखा भारत है, यहां महिलाओं की भूमिका के बिना देश में तरक्की संभव नहीं है। महिलाओं को मनुस्मृति की गुलामी वाली मानसिकता से आजाद होना होगा। इसमें महिलाओं को जीवन के हर पड़ाव पर बचपन में पिता, शादी के बाद पति और बुढ़ापे में बेट के अधीन रहने की बात कही गई है। ये बेहद शर्मनाक मानसिकता है जो महिलाओं को कभी स्वतंत्र नहीं होने देना चाहती। अब संविधान का कानून है.. आधुनिक दौर चल रहा है जहां महिलाओं को अपने पैरों पर खड़े होने और अपनी जिंदगी की दिशा खुद तय करने का पूरा अधिकार होना चाहिए।
यहां राहुल गांधी मे पुरुषों और महिलाओ की खूबियों की तुलना करते हुए कहा कि कोई माने या न माने लेकिन हम सभी जानते है कि महिलाएं स्वभाव से पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा संवेदनशील, करुणामयी और दूरदर्शी होती हैं। देश के विकास में महिलाओं की इस स्वाभाविक क्षमता और विजन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होना ही चाहिए। देश तभी मजबूत बनेगा, जब महिलाएं खुद पर भरोसा करेंगी, अपने हक के लिए आवाज उठाएंगी और समाज उनकी व्यक्तिगत पहचान को स्वीकार करेगा, वो भी बिना उन्हें जज किये हुए।
राहुल गाँधी ने भविष्य के प्लान बनाया
इस कार्यक्रम में राहुल गाँधी ने छात्रांओ से उनके भविष्य के प्लान को लेकर भी बातचीत की। राहुल गांधी ने कहा कि उनका स्टैंड बेहद क्लियर है, वो यहां कोई राजनीति भाषण के लिए नहीं आये है, बल्कि युवाओं के मन की बात सुनने आए हैं.. वो जानने आये कि आज की महिलायें समाज में बदलाव को लेकर, आजादी को लेकर, आत्मनिर्भर बनने को लेकर क्या सोचती थी। राहुल गांधी ने इस दौरान देश में महिलाओं के खिलाफ बढ़ रही हिंसा और शिक्षा और रोजगार में होने वाले भेदभाव के मुद्दों पर भी आवाज उठाई.. उन्होंने कहा कि आज भी बहुत सी महिलाएं सिर्फ असुरक्षा के डर से आगे नहीं बढ़ पाती।
क्योंकि उनके पास आर्थिक आजादी नहीं है.. जब तक संपत्ति के मालिकाना हक और वित्तीय फैसलों में महिलाओं की बराबर की भागीदारी नहीं होगी, तब तक उनकी वास्तविक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी.. जब महिलायें आर्थिक आजाद होंगी तो उनके सोच का दायरा और बढ़ेगा.. वो अपने अपने स्तर पर और बेहतर कर सकती है। समाज में बदलाव सबको मिलकर ही लाना होगा.. जब महिलाओ की भागीदारी आधी आधी होगी.. और उनकी भागीदारी के उन्हें प्रोत्साहित किया जायेगा, तो वहीं नारी आसमान छू लेगी। राहुल गांधी ने अपने विचारों से बता दिया कि किसा समाज के लिए जितने पुरुष जरूरी है उतने ही महिलायें भी। राहुल गांधी के इन विचारों को लेकर आप क्या सोचते है।



