Una incident: जिसने देश की राजनीति हिला दी, आज वो दलित परिवार किस हाल में है?

Gujarat News
Source: Google

Una incident: गुजरात का एक जिला.. गिर सोमनाथ.. जिसे 2013 में ही जूनागढ़ जिले से अलग कर नया जिला होने का क्रेडिट मिला.. सुप्रसिद्ध सोमनाथ ज्योर्तिलिंग मंदिर के लिए फेमस गिर सोमनाथ में सिक्के का एक और पहलू है, जिसे अक्सर इग्नोर कर दिया था.. इसी जिले में एक कस्बा है ऊना..चूंकि 10 सालों का लंबा समय बीत चुका है तो हम में से तो 90 प्रतिशत लोगो को उस परिवार की त्रासदी तो याद ही नहीं होगी…जिसे जातिवादी मानसिकता के काऱण एक पूरे परिवार को न केवल झेलना पड़ा बल्कि इस अमानवता का मजाक बना कर पूरे देश में वाय़रल भी किया गया। शायद अब भी आपको याद न आ रहा हो तो आपको 11 जुलाई 2016 की एक वीडियो की याद दिलाते है।

Also Read: AISHE Report: उच्च शिक्षा संस्थानों में SC-ST महिला शिक्षकों का कम प्रतिनिधित्व, रिपोर्ट में चौकाने वाला खुलासा

गाय की चमड़ी निकाल रहे दलित व्यक्ति के साथ मारपीट

एक गांव है, जहां 4 लोगो को गांव वालों ने अर्धनग्न कर रखा है और पूरे गांव में घुमाते हुए पीट रहे है। इस पीटने वाली भीड़ का कहना था कि ये लोग दलित जाति से आते है, और उन लोगो ने एक जिंदा गाय को मार कर उसकी चमड़ी निकाली है। जिसके कारण ही भीड़ गुस्से में थी। और टूट पड़ी.. लेकिन क्या वाकई में सच ऐसा था। शायद नहीं… पीड़ितो को न केवल प्रताड़ित किया गया, बल्कि उनकी परेड निकाली गई.. शर्मिंदा किया गया। इस घटना ने पूरे परिवार की जिंदगी ही नहीं सोच ही बदल दी..विचारधारा बदल दी।

इस घटना के बाद पीड़ित परिवार को क्या क्या झेलना पड़ा, उससे पहले उस आपबीती को जानते है, जिसके कारण ये सबकुछ शुरु हुआ। दरअसल 11 जुलाई 2016 को ऊना के मोटा समाधियाला गांव में दलित जाति से आने वाले एक परिवार के चार सदस्य  वशरामभाई सोलंकी, उनके छोटे भाई रमेशभाई, भतीजे अशोकभाई और रिश्तेदार बेचरभाई सरवैया जो कि एक मरी हुई गाय की चमड़ी निकाल रहे थे.. इनका परिवार कई पुस्तो से मरे हुए जानवरो की चमड़ी निकालने औऱ उसका व्यापार करने का काम करता था, इन चारों को भी सूचना मिली थी कि बदिया गांव में मरी हुई गाय है और उसका चमड़ा इस्तेमाल किया जा सकता है।

चारो को अर्धनग्न करके पूरे गांव में घुमाया

वो लोग मरी गाय को ले आये और उसकी चमड़ी निकालने लगे, लेकिन तभी वहां पर दो कार से कुछ अज्ञात लोग आ गए, उन लोगो ने खुद को तथाकथि गौ रक्षक कहते हुए गौ हत्या का आरोप लगाया। चारो पीड़ितो ने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन वो नहीं माने, उल्टा उन लोगो ने चारों पर तेजधार हथियारो से हमला कर दिया, जिसके बाद कार में बांध कर उन्हें ऊना ले गए औऱ वहां चारो को अर्धनग्न करके पूरे गांव में घुमाया गया। जिसका वीडियो काफी वायरल हुआ था।

हमलावर कार में बैठ कर फरार

ये हमलावर पीड़ितो को तब तक मारते रहे जब तक वो लोग पुलिस स्टेशन नहीं पहुंच गए, जिसके बाद हमलावर कार में बैठ कर फरार हो गये, लेकिन इस घटना ने दलित समाज के अंदर एक अलग ही तरह का रोष भर दिया था। ये मुद्दा केवल एक छोटे से जिले का नहीं रह गया था, पूरे देश में जंगल की आग की तरह ये मामला फैला औऱ पीड़ितो के लिए न्याय की आवाज उठनी शुरु हुई। इस घटना के बाद पीड़ित परिवार की जिंदगी पूरी तरह से बदल गई.. 10 साल गुजर चुके है।

40 आरोपी में से 5 को ही सजा मिली

40 आरोपी बनाये गए, लेकिन सजा केवल 5 को ही हुई.. बाकि 35 बरी हो गये.. वहीं सजा के नाम भी खाना पूर्ती की गई.. 5 साल की सजा और 5 हजार रूपय जुर्माना.. जबकि अभियुक्त पहले ही 6 साल से जेल मे थे तो मामले की सुनवाई जब तक चलेगी, वो बाहर ही रहेंगे। फिर भला किसे सजा हुई.. हां, इस घटना ने पीड़ित परिवार के विश्वास को पूरी तरह से झकझोर दिया। इस परिवार के मुखिया बालूभाई सरवैया, जिन्होंने अपने परिवार को अपनी आंखो से सामने भीड़ द्वारा पीटते देखा था.. उन्होंने तय किया कि वो चमड़े का गंदा काम छोड़ देंगे.. उन्होंने वो काम छोड़ा.. और इज्जतदार काम करने लगे। मगर अब बहुत कुछ बदल गया।

Also Read: Uttar Pradesh: पुलिस कस्टडी में दलित व्यक्ति की मौत, शव को कब्जे में ले जबरन अंतिम संस्कार कराने का आरोप

घटना के बाद दलित संगठनो ने व्यापक आंदोलन किया

उनके पूरे परिवार ने इस मामले के कारण समाज का वो विभत्स रूप देखा जिसके बारे मे 2016 से पहले उन्हें पता तक नहीं था। इनकी लड़ाई पूरे देश की दलितों की लड़ाई बन गई.. और गुजरात में एक मजबूत औऱ व्यापक दलित बहुजन आंदोलन शुरु हो गया, ये परिवार जो कभी चमड़ा का काम करने के कारण अछूत कहलाते थे आज दलित अधिकार और न्याय के लिए लड़ने वाला परिवार बन गया। इस घटना के अगले ही दिन 12 जुलाई को अहमदाबाद के चांदखेड़ा इलाके में कई दलित संगठनो ने व्यापक आंदोलन किया जिसमें करीब 2000 दलित लोग शामिल हुए थे। 13 जुलाई को ऊना के मुख्य चौकत्रिकोण बाग तक रैली निकाली गई।

2018 में सरवैया परिवार ने बौद्ध धर्म अपनाया

अब ये मुद्दा केवल एक मॉब लिंचिग का नहीं रह गया था, वो दलित समाज की अस्मिता का मामला बन गया था। केस के दौरान सरवैया परिवार को बाबा साहब की लड़ाई, उनके विचारधारा को करीब से जानने का मौका मिला, जिसने उनकी सोच और जीने की दिशा ही बदल दी। पूरे परिवार को एक कॉंफिडेंस दिया समाज का आंख मिलाकर सामना करने का। बाबा साहब की विचारधारा और उनके जीवन से प्रेरित होकर 2018 में सरवैया परिवार ने बौद्ध धर्म अपना लिया।

घरो नहीं है हिन्दू देवी देवताओ की फोटो

बौद्ध धर्म अपनाने के बाद से इस परिवार ने जो बदलाव महसूस किया, उनके रोजमर्रा के जीवन में नजर आता है। घर की मुख्य महिला कुंवरबेन का कहना है कि हिंदू धर्म छोड़ना इतना आसान नहीं था, शुरु में दिक्कत हुई लेकिन अब वो हिंदू आंडबरो से दूर है, वो समझ गई है कि सबसे अहम है मानव को मानव समझना। जीवन का लक्ष्य इस जातिआधारित भेदभाव से लड़ना होना चाहिए।

आज उनके घरों में हिंदू देवी देवताओं की नहीं बल्कि बाबा साहब अंबेडकर, गौतम बुद्ध, ज्योतिबाराव फूले  की पूजा की जाती है। सरवैया परिवार समय के साथ उस हादसे से ऊबर रहा है लेकिन आज भी उन्हें सरकार से शिकायत है। राहुल गांधी और बसपा सुप्रीमों मायावती के अलावा किसी ने भी अपना कमिंटमेंट पूरा नहीं किया.. केवल हवाई वादें औऱ बातें ही कई गई.. मगर फिर भी उनकी जिंदगी अब स्टेबल है। वो दलित उत्पीड़न के खिलाफ अपना संघर्ष हमेशा जारी रखेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *