संसार को धम्म का मार्ग दिखाने वाले महात्मा बुद्ध क्या खुद किसी की पूजा करते थे? जानिए सच – Gautama buddha

Buddhist philosophy
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Gautama buddha: आपको बाबा साहब भीम राव अंबेडकर ने जब बौद्ध धर्म अपना कर नवयान परंपरा की शुरुआत की थी, उसके बाद उन्होंने एक बौद्ध अनुयायी होने के नाते 22 प्रतिज्ञायें ली थी, जिसमें किसी भी हिंदू देवी देवता के आगे सिर न झुकाने और उनकी पूजा न करने की भी प्रतिज्ञा थी। साथ ही उन्होंने बौद्ध धर्म को मानवता का धर्म कहते हुए किसी भी तरह की श्राद्ध पिंडदान जैसे क्रियाकलापो पर विश्वास नही करेंगे, मगर फिर भी जब आप थेरवाद या महायान परंपरा के बारे में जानेंगे तो पायेंगे कि इन परंपराओं में कई देवी देवताओ को पूजा जाता है… तो सोचने वाली बात ये है कि जिस बुद्ध ने कभी ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया, क्यां वो स्वंय किसी की पूजा करते थे, क्या कोई उनका भी आराध्य था, जिसका ध्यान को किया करते थे। अपने इस वीडियो में हम जानेंगे तथागत महात्मा गौतम बुद्ध जिन्होंने संसार को धम्म का मार्ग दिखाया है, क्या वो खुद किसी और की पूजा करते थे.. या फिर नहीं.. जानेंगे सबकुछ डिटेल में।

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क्या बुद्ध भी सनातन धर्म मानते थे?

गौतम बुद्ध जिनका बचपन का नाम सिद्धार्थ गौतम था.. जो कि शाक्य वंश से थे और कपिलवस्तु नामक राजधानी के युवराज थे। उनके पिता राजा शुद्धोधन थे और मां कोलिय वंश की राजकुमारी महामाया थी। चुंकि उनका जन्म 6 ईसा वर्ष पूर्व हुआ था..और उस वक्त भारत में सही मायने में केवल एक ही सनातन धर्म जिसे आज के समय में हिंदू धर्म कहा जाने लगा है.. ही पालन किया जाता था। बुद्ध भी सनातन धर्म मानते थे। जिसमें वैदिक परंपराओ का पालन किया जाता है, और वेदो पुराणों के अनुसार नियमों और संस्कृति को महत्व दिया जाता है। चार वर्ण पर वैदिक परंपरा चलती है, औऱ ब्राह्मण सबसे ऊपर और शूद्र सबसे नीचे माने जाते रहे है..जब बुद्ध ने घर छोड़ा तो वो 29 साल के थे, और बचपन से समातन धर्म और ब्राह्मणीं परंपरा के अनुसार ही जीवन जीते रहे थे।

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मुक्ति के लिए त्रिरत्न मार्ग पर चलना ही अनिवार्य

ऐसे में वैरागी बनने से पहले वो भी देवी देवताओ को पूजते थे, लेकिन जब उन्होंने घर छोड़ कर सत्य की तलाश शुरु की तब उन्हें पहली बार अहसास हुई कि शांति किसी देवी देवता को पूजने से नहीं बल्कि खुद को तलाशने से मिलेगी। उन्होंने करीब 6 सालो तक गया के बोधिवृक्ष के नीचे तप किया था.. जिसमें वो खुद को तलाश रहे थे.. जिसके लिए उन्होंने किसी भी देवी देवता, और अपने पूर्वजो का ध्यान नहीं किया था बल्कि खुद का ध्यान किया था। अपने अंतर्रमन का ध्यान किया था। जहां उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया था कि मुक्ति के लिए त्रिरत्न मार्ग पर चलना ही अनिवार्य है। ये त्रिरत्न मार्ग है सत्य, ज्ञान और करूणा। जिस व्यक्ति के अंदर ये तीन गुण समाहित हो गए वहीं असली मुक्ति पा सकता है। अब सवाल ये है कि क्या बुद्ध किसी देवी देवता की पूजा करते थे।

तंत्रयान में तंत्र साधना करके मुक्ति पाने का मार्ग

दरअसल बौद्ध धर्म में कई परंपरायें है, जिसमें महायान परंपरा, थेरवाद परंपरा, तंत्रयान परंपरा जैसी परंपराये है। उन परंपराओ को मानने वालों का एक ही लक्ष्य है मुक्ति लेकिन मुक्ति के मार्ग पर पहुंचने का रास्ता अलग अलग है। जैसे तंत्रयान में तंत्र साधना करके मुक्ति पाने का मार्ग खोजा जाता है, इस दौरान अनुयायी देवी तारा की पूजा करते है, इनके अलावा करूणा और दया के लिए अवलोकितेश्वर की, ज्ञान, बुद्धि औऱ शिक्षा के लिए मंजुश्री की, शक्ति औक उर्जा के लिए वज्रपाणि की, असीम प्रकाश अनंत जीवन के लिए अमिताभ, और सभी बुराइयो के नाश के लिए महाकाल की पूजा की जाती है। उनके अलावा भी कई देवी देवता है जो बौद्ध अनुयायि द्वारा पूजे जाते है। लेकिन गौतम बुद्ध ने कभी किसी देवी देवता की पूजा नहीं की। बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के बाद सबसे पहले संसार में ईश्वर के होने और सबकुछ किसी अदृश्य शक्ति के इशारे पर होने की बात को नकारा था।

उन्होंने संसार में ईश्वर जैसी किसी भी चीज के होने को सिरे से खारिज करते हुए कहा था कि कोई भी अदृश्य औऱ बाहरी शक्ति किसी भी मनुष्य को मुक्ति दिला ही नहीं सकती है। मुक्ति पाने के लिए व्यक्ति को त्रिरत्न को धारण करना होगा। व्यक्ति सत्य, करूणा और ज्ञान के माध्यम से ही अपने जीवन के सही मूल को समझ सकेगा, और मोहमाया का त्याग कर जीवन मरण के चक्र से मुक्ति पा सकेगा। हालांकि आप बौद्ध अनुयायी को बुद्द की मूर्ती के आगे सिर झुकाते देखते होंगे, लेकिन यहां वंदना करने का मतलब पूजा करना नहीं बल्कि बौद्ध अनुयायी बुद्ध को उनके ज्ञान से संसार को प्रकाशमय करने औऱ मुक्ति का मार्ग बताने के लिए आभार और सम्मान व्यक्त करने के लिए करते है। इसलिए भले ही अलग अलग परंपराओं में देवी देवता पूजे जाते हो लेकिन बुद्ध ने कभी भी किसी देवी देवता की पूजा करने का समर्थन नहीं किया है। बुद्ध ने सदैव अपने अंदर झांकने और अपने प्रकाश को देखने की सीख दी है, जिसके उस प्रकाश को पाया वहीं निर्वाण पाता है।

 

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