BNS section 113: आतंकवाद की नई परिभाषा (Section 113) पहली बार देश के सामान्य आपराधिक कानून (BNS) में ‘आतंकवाद’ (Terrorist Act) को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है, जो पहले केवल विशेष कानूनों (जैसे UAPA) में था। 1 जुलाई 2024 को इंडियन पेनल कोड के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता 2023 का उपयोग अमल में आया, जिसके बाद कुछ कानूनों और प्रावधानों में भी पारदर्शिता ली गई.. इसमें आतंकवाद को परिभाषित करना वाली धारा 113 को भी जोड़ा गया।
जिसमें पहला बार आतंकवाद को नए रूप से परिभाषित किया गया साथ ही आतंकवाद की गतिविधियों में शामिल व्यक्ति को सजा का प्रावधान भी सम्मिलित किया गया। इसी के साथ केवल भारत में ही नहीं बल्कि भारत के बाहर रह कर भी आतंकी गतिविधियों में शामिल होने को लेकर विस्तार से शामिल किया गया है। जानते है कि क्या बीएनएस की धारा 113 में.. जिसके बाद से आतंकी गतिविधियों में शामिल लोगो के बचने का चांसेस ही खत्म हो गये है।
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क्या कहती है BNS की धारा 113
धारा 113 कहती है कि देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता को चोट पहुंचाने के लिए या फिर लोगो में डर और आतंक फैलाने के इरादे से किया गया कोई भी कृत्य,जिसमें विस्फोटकों, firearms, lethal weapons, खतरनाक पदार्थ जैसे वस्तुओ का इस्तेमाल किया गया हो, उसे आतंकवाद की श्रैणी में रखा गया है। इस दौरान किसी की मृत्यु होना, संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, किसी विशेष समुदाय के लिए आर्पूर्ति को बाधित करना, मौद्रिक स्थिति नुकसान पहुंचाना (जिसमें भारतीय जाली कागजी मुद्रा या सिक्के को बनवाना और उसकी गैरकानून रूप से तस्करी और परिचालन करना शामिल है), जबरन किसी को अगवा कर सरकार को कोई ऐसा कार्य करने के लिए मजबूर करना, जो संविधान के खिलाफ है तो वो आतंकवाद की श्रैणी में ही सम्मिलित किया जायेगा।
आतंकवाद विरोधी कानून UAPA
आईपीसी 1860 में आतंकवाद को विशेष कानूनों के तहत देखा जाता था, उसके लिए गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम 1967 का इस्तेमाल होता था, जिसे UAPA भी कहा जाता है, इसकी धारा 15 में आतंकवाद को अच्छी तरह से परिभाषित किया गया है। बीएनएस के लागू होने के बाद भी आज भी सबसे प्रमुख भारत का आतंकवाद विरोधी कानून UAPA का ही माना जाता है।
अपराध के अनुसार 5 साल से लेकर आजीवन कारावास
जिस व्यक्ति पर धारा 113 के तहत मामला चलता है और उसके अपराध के कारण किसी की मृत्यु हो जाती है तो वो एक गैर जमानती अपराध है, और अपराध सिद्ध होने के बाद अपराधी को पैरोल की संभावना के बिना की आजीवन कारावास की सजा और 10 लाख रूपय तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। वहीं अगर किसी की मृत्यु नहीं होती लेकिन अपराधी का अपराध धारा 113 के ही अंतर्गत आता है तो ऐसी सूरत में अपराधी को उसके अपराध के अनुसार 5 साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा सकती है और कम से कम 5 लाख रूपय का जुर्माना भी होता है। वहीं आतंकवादियों को शरण देने वाले, उनकी सुरक्षा करने की कोशिश करने वाले, या उनके साथ मिलकर षड्यंत्र करने वाले को भी 3 साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा सुनाने का प्रावधान बनाया गया है।



