Buddha marriage: जरा सोचिये.. जब भी बरसात आती है तो लोग बरसात में निकलने वाले कीड़े मकोड़े को मारने, उनसे निपटने के लिए तरह तरह के कीटनाशक लगा कर उपाय करते है.. मगर एक ऐसा भी समुदाय है जो बरसात के दिनो में केवल इसलिए बाहर यात्रा करने से बचते है ताकि उनके पैरो तले किसी जीव की हत्या न हो.. उसके लिए भले ही उन्हे कई कई दिनो तक भूखा ही क्यों न रहना पड़े.. जी हां, बौद्ध धर्म एक ऐसा धर्म है, जिसमें सबसे ऊपर अहिंसा का मार्ग होता है..बुद्ध ने दुखों के निवारण के लिए अहिंसा का मार्ग सुनने की सीख दी.. एक सात्विक जीवन जीने की सीख ही बुद्ध के करीब ले जाने का मार्ग प्रशस्त करती है.. बरसात शुरु होती है आषाढ़ के महीने से,, और जिसके बाद 3 महीनों तक बारिस का मौसम रहता है.,.और वो 3 महीने हर एक बौद्ध के लिए बेहद अहम रहते है। इन तीन महीनो में वर्षावास में जाना, बुद्ध के बताये अहिंसा के मार्ग पर चलने और आध्यत्मिकता के और करीब जाने का मार्ग है…वहीं सावन के मौसम का बौद्ध धर्म में बेहद महत्व है.. अपने इस लेख में हम सावन औऱ बुद्ध का क्या कनेक्शन है उसके बारे में जानेंगे।
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राजकुमार सिद्धार्थ गौतम का सफर
बौद्ध धर्म की स्थापना के बाद पहली बार बुद्ध ने वर्षावास की शुरुआत की थी। उसके पीछे कई कारण थे। जिसमें सबसे बड़ा कारण था कि भिक्षुओं को जीव हत्या के पाप से बचाना। बारिश के कारण कीट पतंगे, कीड़े मकोड़े सभी अपने अपने बिलो से निकल कर बाहर निकल जाते है, जिससे भिक्षुओं के पैरो तले आकर उनकी मौत हो सकती थी। और वो हत्या के पापी हो जाते। जिनसे बचाने के लिए बुद्ध ने ही वर्षावास की शुरुआत की। इसकी शुरुआत आषाढ़ महीने की पूर्णिमा से ही होती है। आषाढ़ के पूर्णिमा के अगले दिन सावन शुरु होता है। आषाढ़ पूर्णिमा का बौद्ध धर्म में इस लिए काफी महत्व है क्योंकि इसी दिन राजकुमार सिद्धार्थ गौतम का सफर बुद्ध बनने के लिए शुरु हुआ था। आषाढ़ पूर्णिंमा की आधी रात को ही बुद्ध ने अपनी पत्नी अपने बेटे सबका त्याग कर सत्य की खोज की यात्रा शुरु की थी।
शिवरात्रि का बौद्ध कनेक्शन?
यानि की ये वहीं तारीख से जिसके बाद से बुद्ध का सबसे मोह खत्म हो गया.. उनकी पत्नी यशोधरा, जिनसे उन्होंने 13 साल पहले 16 साल की ही उम्र में शादी की थी, और एक साल का बेटा राहुल.. किसी को पीछे मुड़कर नहीं देखा औऱ वो सावन में बारिश की झमाझम के बीच नदी के तेज वेग की तरह अपनी दिशा तलाशने के लिए बहते चले गए। इस घटना को बौद्ध धर्म में महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है। हालांकि ज्ञान प्राप्ति के बाद करीब 7 सालो के बाद बुद्ध वापिस कपिलवस्तु लौटे थे, लेकिन तब वो वहां के राजकुमार नहीं शाक्य मुनि बुद्ध थे। वहां पहली बार बौद्ध धर्म में भिक्षुणी संघ की शुरुआत हुई थी। बुद्ध ने इस दौरान वर्षाकाल को लेकर भी नियम भिक्षुणी के लिए तय किये थे। जिन्हें वर्षाकाल के दौरान पुरुष भिक्षुओं की तरह साधना करनी होगी,, भिक्षुओ को सुबह 4 बजे से उठकर अपना पूरा समय विपश्यना, ध्यान साधना करने औऱ अपने अंदर मानसिक शुद्धि का संचार करने में लगाना होता हैं।
बौद्ध धर्म से जुड़े धम्म ग्रंथों का अध्ययन और पाठ करने में समय बिताना। इस समय को “धम्म सावन” भी कहा जाता है। इस दौरान बौद्ध भिक्षु बाहर नहीं निकलते, बल्कि गृह्स्थ बौद्ध अनुयायी उनके पास खाना और कपड़े लेकर आते है। बौद्ध ग्रंथो की माने तो बुद्ध ने वर्षावास के दौरान ही अंगुलीमाल डाकू के बारे में सुनने के बाद उससे मिलने गए थे और उसका हृदय परिवर्तन करके उसे बुद्ध के मार्ग में लाये थे, जो आगे चलकर बड़ा बौद्ध भिक्षु बना था। हालांकि शिवरात्री वैसे तो हिंदू धर्म में काफी अहम माना जाता है और सीधे तौर पर इस तारीख का बौद्ध धर्म से कोई संबंध नहीं है.. लेकिन सावन में बौद्ध धर्म में कई रात्री की जिक्र है.. जो भिक्षुओं की साधना के लिए अहम माना जाता है, इस कारण तीथि को लेकर शिवरात्री का जिक्र किया जाता है। वर्षावास वो समय है जो हर भिक्षु के लिए सबसे अहम है.. जिसमें सावन सबसे मायने रखता है.. क्योंकि ये उस यात्रा का साक्षी है जब बुद्ध पहली बार बुद्ध बनने के रास्ते पर चले थे। और सावन महीने के आसपाल ही एक साल भटकने के बाद बुद्द को बोधि वृक्ष के नीचे तप कर के सत्य की तलाश करने का मार्ग मिला था।



