Meethalal Sharma: देश में इस वक्त दो ही टकराव चल रहा है… भारत के अंदर ही लोग दो गुटो में बंट गए है.. एक है श्रीराम वाले… और दूसरे ही बाबा साहब भीम राव अंबेडकर वाले.. सीधे शब्दो में कहें तो भगवा वर्सेस नीले रंग का द्वंद चल रहा है। हिंदू धर्म में जहां भगवा वाले श्रीराम को पूज रहे है तो इसी हिंदू धर्म से निकलने वाले दलित और वंचित समाज के लोगो के भगवान बदल गए है औऱ भारत के बड़े समाज सुधारको में से एक बाबा साहब अंबेडकर की ही मूर्ति को स्थापित कर उनकी पूजा शुरु कर दी गई।
अंबेडकर मूर्तियों में नहीं किताबों में हैं
हालांकि क्या सही मायने में अंबेडकर को हम समझ पायें.. न को श्रीराम ने कहा कि हमें पूजों, न बाबा साहब ने.. फिर क्यों.. राम मर्यादा पुरुषोत्तम बने तो पूजे गए.. लेकिन क्या बाबा साहब कभी चाहते थे कि उनकी मूर्ति बना कर पूजा जाये।अगर ऐसा होता तो वो खुद बौद्ध धर्म क्यों अपनाते.. जहां मूर्ति पूजा निषेध है। बाबा साहब हमेशा कहते थे उन्हें खोजना हो तो किताबों में खोजना, मूर्तियों में नहीं.. उन्हें उनके योगदान के लिए पढ़ने की जरूरत है न कि पूजने की.. अपने इस लेख में हम बात करेंगे कि आखिर बाबा साहब क्यों कहते थे कि उन्हें पढने की जरूरत है पूजने की नहीं।
समाजिक समानता औऱ सम्मान की लड़ाई
आज जब आप सड़को पर चलते है तो आपको एक तरफ भगवा रंग दिखेगा तो वहीं दूसरी तरफ नीला.. ये बंटवारा हम लोगो ने ही किया.. मगर बंटवारे की जरूरत ही क्यों पड़ी.. नीला रंग प्रतीक है बाबा साहब अंबेडकर का.. जिन्होंने आजीवन दलितो और वंचितो के लिए समाजिक समानता औऱ सम्मान की लड़ाई लड़ी.. सवर्णो की बस्ती में बाबा साहब उस पेड़ की तरह खड़े थे तो दलितो के लिए शीतल छाया बन गई थी। उन्होंने संविधान का निर्माण किया.. ताकि वो लोगो को अंधविश्वास के जंजाल से निकाल सकें.. वो कहते थे कि हिंदू धर्म झूठ प्रपंच. अंधविश्वास से बना है.. जिसका त्याग आवश्यक है।
बाबा साहब का संघर्ष
उन्होंने संघर्ष किया औऱ करते ही गए.. ताकि उनका समाज एक दिन सिर उठा कर जी सकें.. लेकिन बाबा साहब के योगदान को लोगो ने उनकी महानता समझ लिया.. औऱ उन्हें भगवान बना दिया। जबकि बाबा साहब की कभी ऐसी मंशा तो थी ही नहीं। जिस पाखंड, जिस ईश्वर से वो भागना चाहते थे, लोगो ने उन्हें उसी ईश्वर के बगल में खड़ा कर दिया। ये कहीं न कहीं बाबा साहब के विचारो का अपमान ही है। बाबा साहब भगवान बना दिये गए, लेकिन उनकी कही गई बातों को असल में न तो पढ़ना चाहते है, न ही समझना चाहते है औऱ न ही उसे अपने ऊपर लागू करना चाहते है।
सच तो ये है कि अंबेडकर को देवता बना कर उनके ही समाज ने उनके लड़ाई के असली उद्देश्य को ही दरकिनार कर दिया.. बाबा साहब जहां एक समता की सोच रखने वाले, विज्ञान को सम्मान देने वाले औऱ अंधविश्वास से परे एक समाज को चाहते थे। वो एक ऐसा समाज चाहते थे जहां भेदभाव न हो, जहां महिला हो या पुरुष सभी समान हो.. जहां सभी शिक्षित हो.. शिक्षा जो आपको सही गलत का फर्क समझने की समझ देती है। बाबा साहब की लिखी गई किताबे, जाति का विनाश, शूद्र कौन थे, हिंदू धर्म में पहेलियां, बुद्ध औऱ बुद्ध के धम्म जैसी तमाम किताबे है जो उनके असली विचारों को बताती है। जहां उन्होंने कही भी उन्हें ईश्वर मान कर पूजने जैसी बात नहीं की।
बाबा साहब के विचारों पर चर्चा
ये किताब केवल समाज में जातिगत क्रांतिकाली लाने और समाजिक बदलाव को लाने के लिए बेहतरीन मार्गदर्शन करती है। भगवान बना कर पूजने का मतलब है कि उनकी सोचने और समझने की शक्ति ही खत्म हो गई है औऱ वो किसी एक रूढ़ीवादी विचार को फॉलो कर रहे है। बाबा साहब के विचारों पर चर्चा तो बहुत की जाती है लेकिन असल मायने में आप में से कितने है जिन्होंने सही मायने में बाबा साहब को पढ़ा है, उन्हें समझा है। बाबा साहब अब केवल एक टूल बन कर रह गए है जिनके नाम पर राजनीति की जाती है और दलितों को मुर्ख बना कर वोट हासिल किया जाता है।
बाबा साहब ने हमेशा शिक्षा को महत्व दिया
बाबा साहब ने हमेशा शिक्षा को महत्व दिया और सभी को शिक्षा हासिल करने के लिए प्रेरित किया.. क्योंकि वो जानते थे कि जिस सामाजिक न्याय की लड़ाई को वो उतनी दूर तक लाये है उसे शिक्षित व्यक्ति ही आगे बढ़ा सकते है, क्योंकि जो शिक्षित नहीं है वो पाखंड के आधार पर ही चलेंगे। वो कभी अंधभक्ति से बाहर नहीं आ सकेंगे.. फिर उनके लिए जागरूकता भी मिट्टी के समान हो जायेगी। बाबा साहब को पढ़ने से आपको पता चलेगा कि आपको किसी पाखंड से नहीं उस व्यवस्था को लेकर चलना है जिसमें सवाल करने की शक्ति है, जो सही गलत का फर्क समझते है। जो भेड़ बकरियों की तरह सबसे आगे चलने के पीछे पीछे ही नहीं चलते है। बाबा साहब को मूर्ति में नहीं बल्कि विचारों में उतारिये.. उनकी बातों का अनुसरण करना जरूरी है। वो मूर्ति में नहीं किताबों में है.. जो आपको चेतना प्रदान करती है.. उन्हें पढियें. ताकि आप अपनी लड़ाई किसी के भरोसे नहीं अपने दम पर लड़ सकें। तभी बाबा साहब का किया गया संघर्ष सही मायमे में सफल होगा।



