Dr Ambedkar forgotten court case: बाबा साहब डॉ भीम राव आंबेडकर कहते थे कि हमें जीवन लंबा नहीं महान बनाना है, और जीवन को महान बनाने के लिए व्यक्ति इन सेवा भाव का होना सबसे जरूरी है। आप किस पेशे से जुड़े है उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, अगर आप किसी जरूरतमंद के काम नहीं आते। किसी के लिए सेवा भाव लाखों करोड़ों रुपयों से ज्यादा सुकून और शांति देती है, ये संदेश खुद बाबा साहब ने दिया था। लंदन से बैरिस्टर की डिग्री हासिल करने के बाद भी बन साहब ने किसी ऊंचे सरकारी दफ्तर में बाबू बना कर नौकरी करने के बजाय दलितों और वंचितों के लिए न्याय की आवाज बनना तय किया। उन्होंने अपनी दलीलों से कई बार कोर्ट में वकीलों की बोलती बंद की थी, लेकिन आज जो हम आपको ये किस्सा सुना रहे रहे है, वो ये साबित कर देगा कि बाबा साहब ने केवल किताबी शिक्षा ही हासिल नहीं की थी बल्कि अपनी सूझ बूझ से वो उस सच को भी सामने ला सकते थे जिसे अब झूठ माना हो। आइये जानते है क्या था वो ऐतिहासिक मामला, जिसने विपक्षी वकील को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया था।
बाबा साहेब का गुमनाम मुकदमा
1923 में वकालत पूरी करने के बाद बाबा साहब मुम्बई के ही हाईकोर्ट में अपनी प्रेक्टिस कर रहे थे..जहां लंदन से डिग्री हासिल करने के बाद भी उन्हें वापिस भारत आकर जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा था। बाबा साहब ये तो समझ गए थे कि शिक्षा से वो जातिगत भेदभाव दूर नहीं कर सकते है लेकिन शिक्षा हासिल करने के बाद दलितो के अंदर ये शक्ति आती है कि वो अपने लिए इस जातिवादी समाज में न्याय की मांग कर सकें। शिक्षा उन्हें सहीं गलत की समझ देती है.. औऱ अपने साथ हुए अत्याचार के लिए लड़ने की समझ देती है.. इसी समझ की कहानी है सतारा के एक गरीब मजदूर रघु की..रघु एक दलित अछूत जाति से था.. और वो समय अछूतो से बेगारी करवाना काफी आम था। गांव का सबसे बड़ा जमींदार पाटिल काफी लालची और क्रूर किस्म का इंसान था। वो गरीब और दलित मजदूरो को अपने पैरो की जूती समझता और अपने अनुसार कठपुतली की तरह उनका इस्तेमाल करता था।
सरकारी अस्पताल पर जमींदार का कब्जा
बेचारे गांव के गरीब लोग उसका सामना करने की हिम्मत नहीं कर सकते थे क्योंकि जो पाटिल के खिलाफ जाता उसे गांव में कोई एक अन्न का दाना भी नहीं देता.. बेचारे अपने परिवार के लिए सभी शांति से बर्दाश्त कर रहे थे। हैरानी की बात तो ये थी कि वो मदद के लिए पुलिस के पास भी नहीं जा सकते थे.. जिसके दो कारण थे। बेगारी गैरकानूनी नहीं थी, दूसरा.. पुलिस वाले भी जमींदार के जेब में रहते थे। रघु की जिंदगी भी इसी तरह से गुजर रही थी, उसने अपने पिता को भी पाटिल के घर बेगारी करते देखा था और बचपन से रघु भी वहीं कर रहा था। लेकिन एक दिन अचानक रघु की पत्नी बहुत बीमार हो गई। गांव के सरकारी अस्पताल पर भी जमींदार का कब्जा था। वहां जाने के लिए भी पैसे चाहिए थे.. बेचारा रघु पाटिल के आगे मिन्नते करने पहुंचता है कि उसकी पत्नी बीमार है उसके ईलाज के लिए कुछ पैसे दे दें.. लेकिन पाटिल जैसा लालची इंसान रघु पर झूठे आरोप लगा कर कहता है कि तुमने मुझसे 2 साल पहले 500 रूपय उधार लिये, पहले वो वापिस कर.. बेचारे रघु के पैरों तले जमीन खिसक गई.. उसे समझ नहीं आया कि उसने पैसे कब लिये.. वो पाटिल से बहस करने लगा.. जो पाटिल के अंहकार पर जा लगा।
उसने रघु को अपने गुंड़ो से बुरी तरह से पिटवाया.. रघु की हालात बेहद गंभीर हो गई.. वहीं दूसरी तरफ पाटिल ने अपने अंहकार को साधने के लिए पुलिस बुला कर झूठी एफआईआर दर्ज करवा कर रघु पर 10 तोला सोना चोरी का आरोप लगा दिया.. पुलिस रघु को उसी हालत में जेल ले गई.. रघु की पत्नी औऱ उसके पिता पाटिल के आगे गिड़गिड़ाते रहे लेकिन उसका दिल नहीं पिघला.. मगर उसी पुलिस थाने में एक दलित हवलदार था, उसने उन्हें सलाह दी कि उसे यहां न्याय नहीं मिलेगा, उसे रघु को बचाना है तो मुम्बई में बाबा साहब अंबेडकर से जाकर मिलो..रगु की पत्नी और पिता बाबा साहब के पास पहुंचे.. उनकी हालात देखकर बाबा साहब हैरान रह गए.. उन्होंने दोनो की पूरी कहानी सुनी और गरजते हुए बोले.. तुम फिक्र मत करों तुम्हारा रघु बेकसूर है और उसे रिहा करवा कर ही दम लेंगे।
बाबा साहब ने सबसे पहले गवाह मुंशी को बुलाया
जब सतारा के शेसन कोर्ट में मुकदमा शुरु हुआ तो पाटिल के वकील जो कि ब्राह्मण जाति से थे। बाबा साहब को कोर्ट में आता देख कर वो खुश हो गया कि एक अछूत भला उनका क्या मुकबला करेगा.. वो उसे चुटकी में हरा देंगे। बाबा साहब को अलग कुर्सी दी गई सबसे अलग.. ताकि वो किसी को छू न दें.. लेकिन बाबा साहब को इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता था। विरोधी वकील ने दलील की शुरुआत ही रघु की नीच जाति से की.. विरोधी वकील ने कहा.. रघु एक अछूत जाति से आता है.. गंदगी उनके खून में ही है। ये जन्मजात अपराधी प्रवृत्ति का है.. रघु जैसे लोग जो अपने ही अन्नदाता के साथ दगाबाजी करते है, उसे ऐसी सजा मिलनी चाहिए, जिसे सब याद रखे.. और कोई अपने अन्नदाता से दगाबाजी न करें। तमाम झूठे गवाह औऱ सबूत भी पेश किये गए। अब बारी थी बाबा साहब की.. बाबा साहब ने सबसे पहले गवाह मुंशी को बुलाया औऱ सवाल किया कि तुमने कहा कि तुमसे रघु को चोरी करके भागते देखा था.. वो भी अमावस्या की अंधेरी रात में.. तुम्हें 50 फीट की दूरी से रघु कैसे दिखा.. मुंशी ने पसीना पोछते हुए कहा कि उस दिन शायद बिजली चमकी थी।
बाबा साहब की दलीलों ने सबकी बोलती बंद
बाबा साहब मुस्कुराये.. शायद उन्हें पता था कि ये ही होने वाला है, वो अपना तैयारी पूरी करके आये थे। उन्होंने जज के सामने एक रिपोर्ट रखी, जो कि घटना वाले दिन की मौसम विभाग की थी.. जिसमें लिखा था आसमान साफ था.. बादल तक नहीं थे फिर भला बिजली चमकी कैसी.. सभी हक्के बक्के रह गए.. बाबा साहब ने उसके बाद उस बहीखाते की मांग की जिसमें 2 साल पहले लिये गए 500 रूपय का विवरण था। बाबा साहब ने उस विवरण को देखा और बोले.. जज साहब आप इस हिस्से को देखिये.. जो पूरी तरह से नई इंक की छपाई दिखा रहा है, वहीं उसके आगे पीछे वाला काफी पुराना इंक दर्शा रहा है। जज ने जब ध्यान से देखा तो वो भी हैरान रह गए। बाबा साहब ने कहा कि ये सबूत काफी है कि ये बहीखाता अभी नया तैयार किया गया है, जबकि कर्ज तो 2 साल पहले लेने की बात की जा रही है।
बाबा साहब की दलीलों ने सबकी बोलती बंद कर दी.. दूध का दूध और पानी का पानी हो गया था। विपक्षी वकील ने जिन्हें उनकी जाति के कारण हीन समझा था उसने आज अपनी शिक्षा की ताकत दिखा दी थी। रघु बाइज्जत बरी हुआ और पाटिल पर भारी जुर्माना भी लगाया गया। बाबा साहब ने केवल शिक्षा हासिल नहीं की थी बल्कि हर किताब को जिया था। उनकी समझ और विवेक ने आज बड़े बड़े वकीलो की बोलती बंद कर दी थी। बाबा साहब ने दुनिया को ये सीख दी थी कि शिक्षा केवल पढ़ने के लिए हासिल नहीं करनी है बल्कि उसे जीना भी है.. तभी आप उसे दूसरो की मदद के लिए इस्तेमाल कर सकेंगे।



