Ram Vilas Paswan के बाद बिहार में किसके हाथ में है दलित राजनीति की कमान?

Ram Vilas paswan, Bihar
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Ram vilas Paswan:  बिहार में 70 के दशक बाद दलित राजनीति में पांव पसारने शुरु किया औऱ उसी के साथ नक्सलवाद ने भी बिहार को अपनी चपेट में लिया था, जहां सवर्णों का बोलबाला था, वहां दलितों के लिए राजनीति में पकड़ बनाना भला कहां आसान होता.. लेकिन ऐसे में बिहार के खगड़िया में एक दुसाध परिवार में जन्में रामविलास पासवान ने न केवल दलित समाज को राजनीति में एक मजबूती दी थी, बल्कि एक के बाद एक जीत के साथ उन्होंने बिहार की जनता को बता दिया था कि अब सवर्णों का शासन खत्म हो गया और दलितो की बारी है। दलित अब कमजोर नहीं है.. उसने सम्मान और सुरक्षा के लिए लड़ना सीख लिया है, रामविलास पासवान राजनीति के इतने प्रखर ज्ञाता बन गए थे कि उनकी की गई भविष्यवाणी हमेशा सही साबित होती थी, और हवा का रूख देख कर सही गठबंधन कर लेते थे जिस कारण उन्हें भारतीय राजनीति का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता था, लेकिन 8 अक्टूबर 2020 को उनके निधन के बाद बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ, उनकी पार्टी लोकजनशक्ति पार्टी टूट गई.. और बेटे चिराग पासवान ने पिता की धरोहर को संभालने की पूरी कोशिश की, लेकिन सवाल ये है कि रामविलास पासवान के जाने के बाद बिहार की राजनीति में क्या क्या बदल गया।

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कौन थे रामविलास पासवान – Ram Vilas Paswan

8 अक्टूबर 2020 को लंबी बिमारी के बाद रामविलास पासवान का 74 साल की उम्र में निधन हो गया था, हालांकि तब तक उन्होंने अपने बेटे और लोजपा के उत्तराधिकारी चिराग पासवान को बिहार की रजनीति में प्रखर बनाने की कोशिश की थी, और लोजपा की गद्दी भी वो चिराग को दे चुके थे। वजह साफ थी कि वो चाहते थे कि उनकी विरासत को उनका बेटा संभाले.. मगर उनके जाने के बाद लोजपा में जो हुआ, वो बेहद हैरान करने वाला था… साल 2000 में जनता से अलग होकर लोकजनशक्ति पार्टी का गठन किया था, जिसे उन्होंने समय के साथ बिहार की एक ऐसी पार्टी बनाई जो दलितों और पिछड़ो की सबसे हितैषी पार्टी बन गई।

चिराग पासवान के हाथों में पार्टी की कमान

2020 तक सब ठीक था लेकिन रामविलास पासवान के जाने के बाद जहां चिराग पासवान के हाथों में पहले से पार्टी की कमान थी, तो वहीं उनके चाचा पशुपति कुमार पारस जो कि हाजीपुर विधानसभा क्षेत्र से थे, ने बगावत कर दी और चार सांसदो महबूब अली कैसर ( खगड़िया ), चंदन सिंह ( नवादा ), वीणा देवी ( वैशाली ) और प्रिंस राज ( समस्तीपुर ) से, के साथ मिलकर खुद को पार्टी का अध्यक्ष घोषित कर दिया.. पार्टी में टूट पड़ गई..पारस का पलड़ा भारी रहा और चिराग पासवान को उनके ही पिता की पार्टी से निकाल दिया गया, ये दलित राजनीति में बड़ा फेरबदल साबित हुआ। अब बारी थी चिराग पासवान की असली परिक्षा की, उन्हें पिता की साख भी बचानी थी और दलितों और पिछड़ो के एकजुट भी करना था। चिराग ने खुद को खड़ा किया और 2021 में लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास का गठन किया। रामविलास पासवान की करीब 5 दशक की मेहनत अब नजर आई.. चिराग पासवान को जनता का बहुत सहयोग मिला… और 2024 में लोजपा ने जो किया उसने इतिहास रच दिया।

रामविलास पासवान सबसे फेवरेट नेता

रामविलास पासवान के जाने के बाद वो छोटी पार्टियों जो खुद को दलित पिछड़ो की हितैषी साबत करने की कोशिश करती रही हास, उन्होंने पिछड़े और अति पिछड़ों को साधने की कोशिश की, लेकिन इसी बीच चिराग पासवान की वापसी मील का पत्थर साबित हुई और 2024 लोकसभा चुनावो में एनडीए के साथ गठबंधन में चिराग ने 5 उम्मीदवार उतारे, जिन्होंने 100 प्रतिशत हैट्रिक से जीत दर्ज कर बता दिया कि आखिर क्यों रामविलास पासवान सबसे फेवरेट नेता थे। पिता की ही तरह चिराग पासवान ने हाजीपुर संसदीय सीट को अपनी कर्मभूमि बना लिया.. एक समय में धरती पर गूंजे आसमान, हाजीपुर में रामविलास पासवान का नारा गूंजा करता था।

9 बार हाजीपुर लोकसभा से जीते

6 प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने वाले रामविलास पासवान 9 बार हाजीपुर लोकसभा से जीते थे। चिराग पासवान ने उनका लेगेसी को आगे बढ़ाया और आज वो खुद खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के 19वें मंत्री है, जिन्होंने न केवल राज्य की दलित, पिछड़े और अति पिठड़ो को फिर से एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई बल्कि जो उनके .युवा और नए होने के कारण उन्हें टक्कर देने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें भी ये जवाब दे दिया है कि वो भी रामविलास पासवान के बेटे है, औऱ राजनीति को उनके खून में बहती है। रामविलास पासवान की असली लेगेसी को वाकई में उनके बेटे के संभाला और राज्य की जनता उनमे अपना फेवरेट नेता देखने लगी है। जो उनके हैट्रिक से साबित हो गया। आने वाले समय में ये भी उम्मीद की जा सकती है कि चिराग बिहार की राजनीति में बड़ा ओहदा हासिल कर सकते है। आपकी क्या राय है हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

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