Babasaheb Ambedkar जो कि खुद एक हिंदू परिवार में जन्मे थे, महाराष्ट्र के महार जाति में आने के कारण वो हिंदू होते हुए भी अछूत थे, नतीजा जैस जैस बाबा साहब बड़े हुए वैसे वैसे उन्होंने हिंदू धर्म में फैले जातिगत भेदभाव और अंधविश्वास के कारण शूद्रों और अछूतों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार से उबने लगे। वो हिंदू धर्म से बुरी तरह से चिढ़ने लगे थे, हालांकि पहले तो उन्होंने खुद कोशिश की कि वो हिंदू धर्म में रहकर ही जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़े, और अपनी शिक्षा के दम पर समाज में बदलाव लेकर आए, मगर जब बड़ौदा रियासत में सरकारी नौकरी के बाद भी उन्हें केवल अछूत होने के कारण घर नहीं मिला तो वो फूट फूट कर रोने लगे।
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बाबा साहब के बौद्ध धर्म अपनाने का महत्व
यहाँ पहली बार वो समझे थे कि उनकी जाति उनकी शिक्षा, और ज्ञान पर भारी पड़ेगी। हिंदू धर्म की व्यवस्था ही जातिवाद और चतुर्थ वर्ण व्यवस्था पर टिकी है तो भला वो उससे कैसे छूटेगी। इसलिए हिंदू धर्म से जातिवाद कभी नहीं जाएगा। जिसके बाद तमाम रिसर्च करने के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। अब सवाल है कि अगर बाबा साहब बौद्ध धर्म नहीं अपनाते तो क्या होता। कैसी होती अभी व्यवस्था। लेकिन इस फैसले को साकार करने में उन्होंने 20 सालों का समय लिया, यानी कि वो समाज का सीधे तौर पर एक संदेश देना चाहते थे कि भले ही कुछ फैसलों में समय लगे, लेकिन वो ऐसा हो जो न केवल आपको सोच बदले बल्कि समाज की भी सोच को बदल दें। बाबा साहब ने बौद्ध धर्म अपनाने के पहले भी कई धर्मिक का जगह अध्ययन किया था, मगर बौद्ध धर्म पर ही आकर उनका मन लगा। अब जरा सोचिए कि बाबा साहब बौद्ध धर्म नहीं अपना कर किसी और धर्म को अपना लेते तो क्या होता। 12 अक्टूबर 1956 की तारीख केवल हर एक आंबेडकरवादी के लिए ही खास नहीं है बल्कि भारत से बिल्कुल लुप्त होते बौद्ध धर्म को फिर से नया जीवन देने की तारीख के रूप में भी याद किया जाता हैं।
भारत में बौद्ध धर्म को स्थिति बेहद खराब
धर्म परिवर्तन करने के मामले में बाबा साहब और करीब पौने 4 लाख दलितों का एक साथ हिंदू धर्म छोड़ कर बौद्ध अपना एक ऐतिहासिक धर्म परिवर्तन माना जाता है। हम सभी जानते है कुछ बाबा साहब ने साल 1935 मे ही हिंदू धर्म छोड़ने का फैसला सुनाया था। जब बाबा साहब ने बौद्ध धर्म अपनाया तब भारत में बौद्ध धर्म को स्थिति बेहद खराब थी। जरा सोचिए कि बाबा साहब को बौद्ध धर्म को करीब से जानने के लिए श्री लंका, म्यांमार और कंबोडिया की यात्रा पर गए थे, जहां उन्हें अपनी किताब बुद्ध एंड हिज धम्म को पूरी करने की प्रेरणा मिली थी।
बाबा साहब ने बौद्ध धर्म को जानने के बाद महायान, थेरवाद, तंत्रयान और अन्य परंपराओं में से किसी एक को अपनाने के बजाय खुद एक नई परंपरा की स्थापना की,जिसे आज भारत में नवयान परंपरा कहते है। उन्होंने अपने अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएं भी दिलाई। अगर बाबा साहब बौद्ध धर्म नहीं अपनाते और किसी और धर्म को अपनाते तो उसका असर भारत के जनसांख्यिकी और सामाजिक स्थिति पर भी पड़ता। वहीं बह साहब ने नवयान परंपरा की शुरुआत करके फिर से धम्म चक्र प्रवर्तन किया था, लेकिन ऐसा नहीं होता तो भारत की भूमि पर जन्म बौद्ध धर्म भारत से लगभग विलुप्त ही हो जाता। वहीं नवयान बौद्ध आंदोलन का भी कोई अस्तित्व नहीं होता।
बौद्ध धर्म में किसी तरह का भेदभाव नहीं
बौद्ध धर्म समानता, बराबरी, समता और बंधुत्व की भावना को सिखाता है, अगर बाबा साहब बौद्ध धर्म की सीख नहीं देते तो समाज के पिछड़े, वंचितों को सामाजिक सम्मान और बराबरी का आभास ही नहीं होता। वो आत्मसम्मान से जीने की स्थिति को शायद अब भी समझ नहीं पाते। बाबा साहब ने काफी गहनता से समझा कि हर धर्म में किसी न किसी तरह से भेदभाव है, या बाहरी लोगों को आसानी से नहीं अपनाया जाता, मगर बौद्ध धर्म में हर एक प्राणी समान है, सबका एक ही ध्येय है मुक्ति, इसलिए कोई भेदभाव नहीं करता, क्योंकि वो अच्छी तरह से समझते है कि इन अब से निकल कर सबको एक बार वहां जाना है, जहां आपकी जाति से आपको नहीं तौला जाएगा, आपके कर्मो से तौला जाएगा।
इसलिए बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम ने सामाजिक भेदभाव और उंचनीच की विचारधारा को छोड़ कर सबको एक समान मानने की सीख दी थी। जो हिंसा, व्याभिचार, और मनुष्य के अवगुणों को छोड़ कर सतगुणों को अपना कर चलें, मोह माया से परे हट कर उस मोक्ष के रास्ते को देख औऱ समझ सकें, जो उनके मुक्ति दिलायेंगा। इसलिए बाबा साहब ने बौद्ध धर्म को सभी धर्मों में सबसे खास माना था। बाबा साहब ने भारत में बौद्ध धर्म को एक नयी जागृति दी थी, जो शायद बाबा साहब ही कर सकते थे।



