नास्तिक नहीं, वैज्ञानिक थे बुद्ध! जानिए बिना ईश्वर के दुनिया चलने का गुप्त नियम – Buddha’s secret law

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Buddha’s secret law: बौद्ध धर्म एक ऐसा धर्म है जिसमें तथागत बुद्ध ने हमेशा ईश्वर के अस्तित्व को नकारा है, जहां हर धर्म में ईश्वर, अल्लाह और परमेश्वर को पूजने, उनकी शक्ति पर विश्वास करने की बात की जाती है वहीं बौद्ध धर्म इकलौता ऐसा धर्म है जो ये कहता है कि संसार में ईश्वर जैसी कोई शक्ति है ही नहीं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि अगर ईश्वर नहीं है तो फिर संसार को चला कौन रहा है। बुद्ध के अनुसार संसार का अस्तित्व आखिर कैसे बना हुआ है और संसार को कौन चला रहा है। अपने इस वीडियो में हम बात करेंगे उस गहरे रहस्य के बारे में जिसे खुद भगवान बुद्ध ने संसार को बताया है। जो ये बताते है कि आखिर क्यो उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार किया है.. और कैसे संसार गतिमान है।

बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त करने के बाद संसार को 4 आर्य सत्य और 8 अष्टांगिक मार्ग पर चलने का पहला ज्ञान दिया था.. उन्होंने संसार को ये बताया कि संसार में हर दुख, हर तकलीफ की वजह केवल संसारिक मोहमाया ही है.. और इस मोह और इच्छाओं से मुक्ति ही असली मुक्ति है जो संसार में बार बार आने जाने के चक्र से मुक्त होने के लिए अनिवार्य है। इस दौरान जब बुद्ध अपने संसार को मुक्ति का मार्ग बता रहे थे, तब उन्हें सुनने वाले कुछ हिंदू पंडितो, जिन्होंने सदैव अपने वेदो और पुराणों में ईश्वर का गुणगाण ही पढ़ा और सुना है, जो ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने और जो होता है ईश्वर की इच्छा से होता है, मानने के लिए कहा जाता रहा है। उन्होंने तथागत के पास आकर एक ऐसा सवाल किया जिसके बारे में हमेशा संसार में जिज्ञासा बनी रहती है। सभी जानना चाहते है… पंडितो ने तथागत बुद्ध से पूछा- तथागत.. आप कहते है कि ईश्वर नहीं है… अगर ये सत्य है तो संसार कैसे गतिमान है, रोजाना सूर्य कैसे निकलता है, और कैसे अस्त हो जाता है, जमीन कैसे हमें भोजन देती है, नदी कैसे हमारी प्यास बुझाती है। आखिर ऐसा क्या है इस ब्राह्मांड में जो इसके चलायमान होने का कारक है।

बुद्ध पंडितो की बात को सुनने के बाद मुस्कुराने लगे,.. उन्होंने उनके चेहरे पर भय औऱ कौतुहल के भाव को अच्छी तरह से समजा और उनके सवालो का जवाब देना शुरु किया। बुद्ध ने कहा कि ये सत्य है ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है और ये संसार एक ही नियम से चलता है, जिसे हम प्रतीत्य समुत्पाद नियम कहते है।

इस नियम के अनुसार व्यक्ति जिस अवधारना पर चलता है, जिसमें अगर ये होता तो वो भी होता, और ये नहीं होता तो वो भी नहीं होता। किसी भी घटना का होने का कारण और उसका क्या परिणाम होगा, उसके नियम को ही प्रतीत्य समुत्पाद नियम कहा जाता है। जिस बीज को आप बोते है, वहीं अंकुरित होकर जमीन से निकलता है. और पहले पौधा बनता है और फिर पेड़ बनता है। यानि की आप जिस कर्म की शुरुआत करते है उसका परिणाम आपको जरूर दिखेगा, इसे ही बुद्ध ने प्रतीत्य समुत्पाद नाम दिया। जरा सोचिये अगर आप बीज ही जमीन में न बोये तो क्या परिणाम होगा.. कोई पौधा नहीं, कोई फल नहीं होगा.. ब्रह्मांड का भी तो यहीं नियम है.. सबकुछ कर्म से निर्धारित होता है। अब बात करें कि अगर सूरज रोज निकलता है औऱ डूबता है तो क्या किसी देवता उन्हें ये आदेश दिया नहीं, हरगिज नहीं.. पृथ्वी अपनी धुरी पर घूम रही है, इसलिए एक तरफ दिन है तो दूसरी तरफ रात.. जबकि सूरज को कभी डूबता ही नहीं.. ये केवल मनगढ़त कहानी बना दी गई कि सुबह शाम ईश्वर की इच्छा से होता है। इनके पीछे ईश्वरीय ताकत नहीं विज्ञान है। संसार में हर चीज के होने का कोई न कोई कारण होता है और उसके खत्म होने का भी कारण होता है। अगर शुरु होने कारण ही जन्म नहीं लेता तो परिणाम भी नहीं होगा।

पंडितो ने आगे बुद्ध से पूछा कि मनुष्यों का होना, उनका चेतन मन, उनकी सोच क्या ये भी किसी कारण से है और उसके परिणाम क्या है।

बुद्ध ने कहा कि हां मनुष्य का अस्तित्व असल में पांच स्कंदो से निर्मित होता है, ये स्कंद है संस्कार, विज्ञान, हमारा रूप, हमारी वेदना और संध्या.. इन स्कंदो के मेल के कारण व्यक्ति को आत्मा जैसी चीज का भ्रम पैदा होगा है जिससे उसमें मैं, मेरा वाली भावनायें आती है। सच तो ये है ये केवल कारण और परिणाम है, कोई स्थाई आत्मा होती ही नहीं है, किसी का भी अस्तित्व हर मिनट बदलता रहता है लेकिन व्यक्ति उसे हमेशा एक जैसा मान लेता है। रही बात ईश्वर के न होते हुए संसार में न्याय कौन करता है, हमारे कर्मों का फल कौन निर्धारित करता है, तो सत्य ये है कि हमारे कर्म ही हमारा न्याय करते है और हमें फल देते है। आग में हाथ डालने से जलना जिस तरह के प्राकृतिक परिणाम है वैसे ही जो सतकर्म करता है, जो मन से पवित्र है वो दुखो को नहीं भोगेगा, इंसान के साथ जो होता है वो उसके किये गए कर्मो का ही परिणाम होता है। कोई खास देवी देवता उन्हें सजा देने संसार में नहीं आते है, यानि की कर्म ही सर्वोपरि है, कर्म और उसके परिणाम ही संसार का सबसे बड़ा नियम है। हर घटना के पीछे कोई न कोई दूसरी घटना जरूर जुड़ी होती है, जो आगे की सभी घटनाओं के लिए जिम्मेदार होती है। इसलिए केवल आपकी कर्म कती उर्जा ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होती है। किसी आत्मा को या ईश्वर को स्वीकार कर भ्रम की स्थिति में रहने के बजाय कर्म को स्वीकार कर लिजिये उसके परिणामो को स्वीकार कर लिजिये। आपके साथ जो होता है वो आपके द्वारा किये गए कर्मौ का परिणाम है। इसमें ईश्वर का किया कुछ नहीं है। बुद्ध ने संसार को समझाया कि व्यक्ति को केवल अपने कर्मों और उसके परिणामों के बारे में विचार करना चाहिए। तभी आप मुक्ति के मार्ग पर जा सकेंगे।

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