क्या तिरुपति बालाजी का बौद्ध इतिहास छुपाया गया? जानिए प्राचीन मंदिर के दावों का पूरा सच! Tirupati Balaji Buddhist history

Buddha River water story
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Tirupati Balaji Buddhist history: साल 2020 में IIT गांधीनगर और पुरातत्व विशेषज्ञों ने सोमनाथ मंदिर के नीचे की संरचना को लेकर एक रिपोर्ट दी थी, वहां एक सर्वे किया गया जिसमें ग्राउंड-पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) तकनीक के जरिए कुछ ऐसी संरचना सामने आई जिसके बाद से सोशल मीडिया का बाजार गर्म हो गया कि सोमनाथ मंदिर पहले बौद्ध मठ हुआ करता था। यहां तक कि इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिए अपील भी दायर की गई, लेकिन जून 2026 में गुजरात हाई कोर्ट ने न केवल इस याचिका को बेबुनियाद बताते हुए खारिज के दी केवल कही सुनी बातों और सोशल मीडिया के दावों के कारण अपील करने से कोर्ट का समय बर्बाद करने के कारण दो लाख रुपयों का जुर्माना भी लगाया गया।

हालांकि कोर्ट ने माना कि सोमनाथ मंदिर के आसपास की भौगोलिक स्थिति से कई साक्ष्य मिले है जैसे ये पता चलता है कि वहां बौद्ध धर्म की काफी मान्यता थी, लेकिन अब सोमनाथ के बाद मशहूर मंदिर तिरुपति बालाजी मंदिर का कनेक्शन भी बौद्ध धर्म से जुड़ने लगा है। क्यों दावे किए जा रहे है कि तिरुपति के कई ऐसे नियम है जो बौद्ध धर्म से मिलते है। अपने इस लेख में हम तिरुपति बालाजी मंदिर से जुड़े बौद्ध कनेक्शन के बारे में जानेंगे और कौन सी परम्परा के आधार पर ये दावे किए जा रहे है।

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क्या है तिरुपति मंदिर का बौद्ध कनेक्शन?

जब विष्णु के जस अवतारों की बात करते है तो आपको एक अवतार बुद्ध का भी दिखाई देता है.. जिसके कारण अक्सर बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध को भी विष्णु अवतार मान लिया जाता है। हालांकि इसे लेकर अलग अलग अवधारणायें है.. आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में तिरुमला पर्वत पर स्थित तिरूपति बालाजी की मंदिर भी भगवान विष्णु का ही मंदिर है, जो विश्व प्रसिद्ध है। हिंदुओ की कठोर आस्था  का प्रतीक तिरूपति बालाजी मंदिर में भगवान वेंकटेश विराजमान है। लेकिन समय समय पर वेंकटेश की मूर्ति को लेकर नई नई अवधारनायें सामने आती है, कभी इसे शिव माना जाता है, तो कभी स्कंद, कुछ हरिहर कहते है तो कुछ विष्णु.. लेकिन पिछले कुछ समय से ये दावा किया जा रहा है कि वेंकटेश की जो प्रतिमा है वो असल मे बौद्ध धर्म से जुड़ी है, इतना ही नहीं मंदिर में कई ऐसे तथ्य है तो बौद्ध धर्म से इसे कनेक्ट करते है।

ब्राह्मणों ने बौद्ध विहार पर कब्जा कर लिया

ये मूर्ती बौद्ध धर्म जनजाति में पूजे जाने वाले ईसा देवता की है। प्रसिद्ध लेखक और इतिहासकार के जमनादास ने अपनी किताब Tirupati Balaji Was Originally a Buddhist Shrine’ में ये दावा किया है कि तिरूपति बालाजी मंदिर असल में एक समय पर बौद्ध विहार हुआ करता था, और जो मूर्ति वेंकटेश की कह कर पूजी जाती है असल में वो प्रतीमा बुद्ध की है, लेकिन जब बौद्ध धर्म का पतन हो रहा था तब ब्राह्मणों ने बौद्ध विहार पर कब्जा कर लिया.. औऱ बुद्ध की प्रतिमा को बदलते हुए उन सिर पर बाल, माथे पर,लंबे कान, ललाट पर तिलक, अलग से हाथों को जोड़ा गया, औऱ बुद्ध की मूल प्रतिमा को पूरी तरह से बदल कर उसे हिंदू धर्म का केंद्र बना दिया गया। तिरूमला पर्वत पर होने के कारण उस मंदिर को तिरूपति बालाजी कहा गया। वहीं मंदिर मे बुद्ध की प्रतीमा को विष्णु के ही नामों में से एक वेंकटेश नाम दिया गया।

बौद्ध इतिहास के दावों का पूरा सच

तिरूपति बाला जी के मंदिर की सिर मुंडवाने की परंपरा को बौद्ध भिक्षुओं की मान्यता से जोड़ कर देखा जाता है… जैसे चीवर लेते समय मुंजन कराने की परंपरा रही है वैसे ही बालाजी में वेंकटेश स्वामी के सामने मुंडन कराने की परंपरा है। हैरानी की बात तो ये है बौद्ध भिक्षुणियों की ही तरह यहां पुरुषों के साथ साथ महिलायें भी अपने बाल दान करती है, जो उनके त्यागे गए अहंकार और बाकि के विकारों को दर्शाते है। हालांकि किताब के छपने के बाद भी ये दावे तथ्यो के आधार पर किये गए है, भारतीय पुरातत्व विभाग या फिर मंदिर तरफ से कोई आधिकारी घोषणा नहीं की थी। वहीं इसके गर्भ गृह में  1150 से ज्यादा शिलालेख मिले है लेकिन वहां भी बौद्ध अवशेषों के नामो निशान नहीं मिसे है। हालांकि जमनादास के तर्को को भी झुठलाया नहीं जा सकता है। उनके तर्को पर भी ध्यान दिया जा सकता है लेकिन उनके अलावा ऐसे साक्ष्यों का पाना, जो बौद्ध परंपरा से मिलती है, उन सबके बाद तिरपति बाला जी मंदिर के बौद्ध विहार होने के दावों पर सवाल उठना लाजमी है। वैसे आपको क्या लगता है इन दावों में कितना सच और सहीं है।

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