Prayagraj HC: हाल ही में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से एक बड़ी खबर सामने आई है। जहां जातिगत टिप्पणी को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक कड़ा फैसला सुनाया है। तो चलिए इस लेख में जानते है आखिर चमार शब्द के इस्तेमाल पर इलाहाबाद HC की टिप्पणी, क्या बिना इरादे के कहे गए शब्द अपराध हैं?
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केवल चमार बोलने से जातिगत अपमान नहीं होता
अक्सर ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब दलितों को जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करके अपमानित किया जाता है, उनकी जाति के आधार पर उन्हें गालियां दी जाती हैं और इन सभी जातिवादी टिप्पणियों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक कड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने ज्योगत टिप्पणी को एससीएसटी एक्ट के दायरे से बाहर रखने की बात है, बशर्ते वो टिप्पणी किसी को अपमानित करने के लिए intentional न कही गई हो। वही मीडिया रिपोर्ट्स से मिली जानकारी के मुतबिक न्यायमूर्ति संतोष राय ने एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि जब तक अपमानित करने के लिए चमार जैसे शब्दों का इस्तेमाल न हो, तब तक वो प्रथम दृष्टया एससी एसटी अधिनियम (SC ST Act) के तहत अपराध नहीं माना जाता है।
जातिगत टिप्पणी के खिलाफ दर्ज कराया मामला
दरअसल ये मामला बरेली जिले (Bareilly district) के इज्जतनगर पुलिस स्टेशन (Izzatnagar Police Station) का है जहां हिम्मत सिंह, उसके पिता वेगराज सिंह और बड़े भाई दौलत के खिलाफ जातिगत टिप्पणी करने को लेकर मामला दर्ज कराया गया था। लेकिन सबूतो के अभाव में वेगराज सिंह और दौलत सिंह को रिहा कर दिया गया, मगर कोर्ट ने अब इस मामले में सुनवाई करते हुए तर्क दिया कि केवल चमार बोलने से ये साबित नहीं होता कि ये मानहानी करने के लिए गलत इरादे से बोला गया था।
HC ने खारिज किया मुकदमा
इस मामले में अपील करने वाले की स्पष्ट भूमिका का पता नहीं चल रहा है.. इसलिए ये सिद्ध ही नहीं होता है कि जातिगत अपमान किया गया है। इसलिए ये मामला ही बेबुनियाद है.. कोर्ट के फैसले के बाद जातिगत अपमान करने की बात करके जो मुकदमा दर्ज किया गया था वो रद्द हो गया। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब पीड़ित ने कहा कि उसका जातिगत अपमान हुआ…और वहां चश्मदीद भी थे। तो फिर कोर्ट किस भूमिका को तलाश रही थी।
वही कोर्ट के इस फैसले से क्या आप सहमत है? इसके अलावा, आपको बता दें कि ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां कोर्ट ने जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने पर केस खारिज कर दिया है और यह फैसला सुनाया है कि यह तब तक मान्य नहीं होगा, जब तक यह जातिगत भेदभाव के लिए न किया गया हो और कोई गवाह मौजूद न हो।



