यशपाल आर्य कौन हैं? जानिए उनके राजनीतिक सफर और अहम जिम्मेदारियों के बारे में – Yashpal Arya political career

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Yashpal Arya political career: उत्तराखंड की राजनीति के एक पारंगत दिग्गज खिलाड़ी, जिन्होंने ब्रेक लिए कांग्रेस पार्टी को उत्तराखंड मे दलित नेता के तौर पर जमीन तैयार करने में दिन रात एक कर दिया.. 40 सालों तक वो कांग्रेस पार्टी की सेवा करते रहे, लेकिन एक बेज्जती ने सब बदल दिया..न केवल खुद पार्टी 40 साल पुराने रिश्ते को तोड़ बल्कि अपने बेटे को भी पार्टी से निकाल कर बीजेपी में ले गए। लेकिन इस एक शख्स ने साबित कर दिया कि पार्टी कोई भी हो.. पहचान उनकी है।  ताकत उनकी है, वोट बैंक उनका है। कांग्रेस हो या बीजेपी.. उन्होंने अपनी जीत की हैट्रिक लगाई..लेकिन सवाल ये है जब कोई नेता जो अपने राजनैतिक करियर की शुरूआत से किसी एक ही पार्टी से जुड़ा हो फिर अचानक पार्टी बदल लें।   जाहिर है कुछ तो ऐसा हुआ होगा जिसने इतना बड़ा फैसला लेने पर मजबूर किया.. लेकिन जहां 40 साल बिताये हो वो घर कैसे छोड़ा जाता..फिर से घर वापसी हो ही गई..जी हां हम बात कर रहे है कांग्रेस के कद्दावर नेता यशपाल आर्य की.. यशपाल आर्य कांग्रेस का एक बड़ा दलित चेहरा, जो 7 बार बिना हारे लगातार विधायक चुने गए.. 74 साल की उम्र में भी वो एक मजबूत नेता प्रतिपक्ष है.. आईये जानते है कि यशपाल आर्य की उस राजनैतिक सफर के बारे में, जिसने उन्हें 7 बार अजेय बनाया।

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कौन हैं यशपाल आर्य? Yashpal Arya

8 जनवरी 1952 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश के एक जिले नैनीताल के रामगढ़ ब्लॉक स्थित त्यूनरा बोहराकोट गांव में नंद राम आर्य के घर जन्मे थे यशपाल आर्य। कुमाऊ क्षेत्र में आर्य लोग असल में अनूसूचित जाति से आते है.. उनके पिता एक साधारण खेतीहर किसान थे। गांव की मिट्टी और ग्रामीण परंपरा के बीच ही उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा हासिल की थी, पढ़ाई में बेहद होशियार होने के बाद भी उनकी जिंदगी आसान नहीं थी.. देश के लाखों करोड़ो किसान परिवार की तरह उनकी जिंदगी भी कई तरह के अभावो से भरी थी, जिसने उन्हें अपने लोगो के लिए कुछ करने का जज्बा दिया था। यशपाल आर्य के दिये हलफनामे में उन्होंने साल 1977 में कुमाऊं यूनिवर्सीटी के ही एम.बी. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय हल्द्वानी से ग्रेजुएश की ड्रिग्री हासिल की. कॉलेज के दौरान ही उन्होंने छात्र राजनीति का हिस्सा बनना शुरु कर दिया था। 1977 के आम चुनालों में उन्हें पहली बार एक्स सीएम एनडी तिवारी के साथ काम करने का मौका मिला.. उनकी बातें इतनी प्रभावशाली थी कि कांग्रेस को उनमें एक बेहतर भविष्य नजर आने लगा..लेकिन शुरुआत जमीन से ही करनी था इसलिए उन्हें 1977 आम चुनाव में देवलचौड़ गांव में कांग्रेस का बूथ एजेंट बनाया गया। कांग्रेस ने उन्हें राजनीति की पहली सीढ़ी चढ़ाई थी।

दलितों के बीच लोकप्रिय नेता

1977 से लेकर 1984 तक यशपाल आर्य कांग्रेस के कार्यकर्ता के तौर पर काम करते रहे। वो दलितों के मुद्दे पर बेहद खुल कर बोलने के कारण वो दलितों के बीच लोकप्रिय हो चुके थे। 1984 में उन्हे प्रधान का चुनाव लड़ने का मौका मिला, और कट्टर जातिवाद के होते हुए भी वो सवर्णो के बीच जीतने में कामयाब रहें..लेकिन यहां केवल वो प्रधान ही नहीं बने थे बल्कि युवा कांग्रेस के नैनीताल जिलाध्यक्ष भी चुने गये। प्रधान रहते हुए जो कार्य उन्होंने वहां की जनता के लिए किये, वो कांग्रेस से अनदेखा नहीं था.. अब जरूरी था कि उन्हे थोड़ा बूस्ट किया जायें। इसलिए 1989 उन्हें खटीमा विधानसभा सीट से कांग्रेस ने टिकट दिया.. और जैसा कि कांग्रेस को उम्मीद थी। यशपाल आर्य ने खटीमा सीट पहले ही अटैम्प में जीत ली थी। लेकिन 1991 में चुनाव में उनकी हार हुई, फिर 1993 में वो फिर से खटीमा से खड़े हुए और विधानसभा चुनाव में जीत गये, लेकिन 1996 में उन्हें फिर से हार का सामना करना पड़ा।

यशपाल आर्य मुक्तेश्वर सीट से जीत दर्ज की

जब साल 2000 में उत्तराखंड का गठन हुआ, तब 2002 में यहां पहले विधानसभा चुनाव हुए, जिसमें यशपाल आर्य मुक्तेश्वर सीट से जीत दर्ज की थी.. इस दौरान एनडी तिवारी उत्तराखंड के सीएम थे,, जिन्हें यशपाल आर्य अपना गुरु भी मानते है.. एनडी तिवारी भी यशपील आर्य को बेहद पसंद करते थे। इसलिए 2002 में उनके सीएम बनने के बाद यशपाल आर्य को विधानसभा अध्यक्ष चुना गया जो कि 2007 तक बने रहे थे। फिर 2007 में भी उन्होंने मुक्तेश्वर सीट से जीत दर्ज की थी। 2007 में वो काग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष चुने गए, जो कि 2014 तक रहे। फिर तो 2012 हो, 2017 हो या 2022.. सभी विधानसभा चुनावों में वो बाजपुर सीट का प्रतिनिधित्व करते आये और बाजपुर सीट पर अपनी पकड़ बाज की ही तरह मजबूत बनाये रखे हुए है। इस दौरान उन्हे 2012 में सिंचाई, राजस्व और तकनीकी शिक्षा विभाग का मंत्री भी बनाया गया।

2017 में जब हरीश रावत उत्तराखंड के सीएम थे, तब उनकी मनमानी और कार्यप्रणाली से तंग आकर वो इतने नाराज हो गए कि उन्होंने कांग्रेस पार्टी ही छोड़ दी। करीब 40 साल पुराना साथ टूट गया.. ये कांग्रेस के लिए बेहद बहुत बड़ा नुकसान था। यशपाल अपने बेटे संजीव आर्य के साथ बीजेपी में शामिल हो गए.. लेकिन पार्टी कोई भी हो, पहचान पार्टी से नहीं बल्कि उनकी शख्सियत से थी.. बाजपुर सीट से बीजेपी के टिकट पर लड़े औऱ फिर से जीत गए.. 5 सालों तक वो बीजेपी के विधायक बन कर ही रहे..इस दौरान उन्हें समाज कल्याण और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री चुना गया। लेकिन वो कांग्रेस से ज्यादा दिनो तक दूर नही रह सकें, कांग्रेस ने उन्हें मनाया और अक्टूबर 2021 में उन्होंने बीजेपी से इस्तीफा देकर कांग्रेस को फिर से थाम लिया था। 2022 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए और बाजपुर सीट के बादशाह यशपाल आर्य ने हैट्रीक लगाई..

समाज कल्याण और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री रहते हुए उन्होंने कई अहम फैसले लिये थे.. राज्य की 13 आरक्षित सीटो पर यशपाल आर्य की बेहद मजबूत पकड़ है। उन्होंने कुमाऊं और गढ़वाल दोनो क्षेत्रों में दलित नेताओ को आगे बढ़ने के लिए जमीनी स्तर पर काम किया.. उन्होंने एससी छात्रों को उच्च शिक्षा देने के लिए मिलने वाले स्कोलरशिप के प्रोसेस को ईजी बनाया, ताकि उनके लिए अपलाई करना आसान हो, जिससे उनकी पढ़ाई न छूटे..साथ ही एससी वर्ग के लिए वृद्धावस्था, दिव्यांग औऱ विधवा पेंशन जैसी योजनाओ को और सटीक किया और इसका दायरा बढ़ाया, ताकि हर जरूरतमंद तक लाभ पहुंचे। वो दलित बस्तियों के जीर्णोधार के लिए अंत्योदय, औऱ समाज कल्याण विभाग की मदद से विशेष बजट आवंटित कराते है। साथ ही राज्य में होने वाले दलित उत्पीड़न के मामले में खुल कर बोलते है। वो हमेशा से जातिगत भेदभाव औऱ छुआछूत की मानसिकता का विरोध करते आये है। 2012 से लेकर 2022 तक वो उत्तराखंड के सीएम पद से प्रबल दावेदार थे, हालांकि जातिगत भेदभाव और विरोध के कारण ऐसा नहीं हो सका.. लेकिन वो दिन दूर नहीं जब कोई दलित राज्य का सीएम बनेगा। आपकी क्या राय है हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

 

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