बालाघाट में मासूमों की मौत पर मीडिया की चुप्पी क्यों? 18 बच्चों की मौत की पूरी कहानी – Madhya Pradesh child deaths

Madhya Pradesh child deaths
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Madhya Pradesh child deaths: आप जानते है कि मीडिया को देश का चौथा स्तंभ क्यों कहा जाता है, क्योंकि इसी स्तंभ के दम पर हम सही को सही और गलत को गलत कह सकते है। जो सच दिखाने की ताकत रखते है, जिनकी नजरों में राजा हो या रंक सभी एक जैसे ही होते है, न्याय अगर न्यायपालिका में मिलता है तो उसे सही न्याय की कसौटी पर खरा उतारने का काम मीडिया का होता है, लेकिन क्या सच में ऐसा है। मीडिया की विश्वशनीयता पर अगर सवाल उठते है तो क्यों उठते है। वजह हम आपको बताते है। जी हां, बीते कुछ दिनों से मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले से एक ऐसी दिल को दहला देने वाली खबर सामने आ रही है, जिसे सही मायने में मैंन स्ट्रीम मीडिया के जरिए भारत के कोने कोने में पहुंचनी चाहिए, 18 मासूम छोटे छोटे बच्चे बिना मौत मारे गए, पूरे  गांव में चीख पुकार मची है लेकिन आप बताइए, कितने लोग है जिन्हें इस बारे में जानकारी है। कुछ चुनिंदा ये बच्चे जो सरकार की लापरवाही की भेंट चढ़ गए, कौन कौन है उनकी मौत का जिम्मेदार। और आखिर इन खबर से देश परिचित क्यों नहीं हो पाया.. जानेंगे क्या है इन 18 मासूमों की मौत के पीछे की सच्चाई, और क्या है सरकार की प्रतिक्रिया।

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बालाघाट में 18 मासूमों की मौत

दरअसल अगस्त के आखिरी सप्ताह में आदिवासी कांग्रेस के प्रमुख विक्रांत भूरिया ने एक सनसनीखेज खुलासा किया.. उन्होंने बताया कि बालाघाट जिले के बिरसा ब्लॉक और उसके आसपास रहने वाले बैगा समुदाय के आदिवासियों के करीब 18 से 22 बच्चो की मौत हो गई… और इस मौत की वजह थी खसरा, मलेरिया, चेचक औऱ कुपोषण। वहीं कुछ आकड़ो की माने तो बच्चो की मौतो की गिनती 27 तक पहुंच चुकी है। जहां एक तरफ सरकार बच्चो को देश का भविष्य कहती है.. वहीं भविष्य कुपोषण से मर रहे है। लेकिन ये खबर राज्य तो छोड़िये जिले के बाहर भी जाने नहीं दिया गया था। कांग्रेस नेता के खुलासे के बाद प्रशासन नींद से जागा। राष्ट्रीय अनूसूचित जनजाति आयोग ने इस मामले में बेहद कड़ा रूख अपनाया और खुद मामले की जांच शुरु कर दी।

गाँव से स्वास्थ्य केंद्र करीब 20 किलोमीटर दूर

उन्होंने स्वास्थ्य सचिव औऱ बालाघाट कलेक्टर को भी नोटिस भेजा..साथ ही तीन सदस्यों की टीम गांव का दौरा करने के लिए भेजा औऱ जो रिजल्ट जांच में आया वो आपको भी हिला कर रख देगा. दरअसल बैगा समुदाय बालाघाट के जिले इलाके में रहते है.. उन तक पिछले 6 महीने से पोषित अनाज तक नहीं पहुंचा है, वहीं सबसे करीबी स्वास्थ्य केंद्र भी करीब 20 किलोमीटर दूर है। जिन जमीनो पर वो रहा करते थे उससे वन विभाग और सरकार ने मालिकाना हक छीन लिया है.. स्वास्थ्य केंद्र के इतने दूर होने के कारण बैगा समुदाय के करीब 80 प्रतिशत बच्चों को बेसिक सरकारी टीका तक नहीं लग पाता है। केंद्र तक जाने के लिए उनसे पास बेसिक सुविधायें भी नहीं है, न तो वहां कोई एंबुलेंस आती है और न ही कोई दूसरी सवारी। इसमें सबसे शर्मनाक बात तो ये है कि सरकार की तरफ से अगर किसी आदिवासी बच्चे की मौत स्वास्थय लापरवाही के कारण होती है उन्हें 20 हजार रूपय देकर टरका दिया जाता है।

बेसिक स्वास्थ्य सेवायें भी नहीं उपलब्ध

मतलब एक आदिवासी बच्चे की कीमत मात्र 20 हजार रूपए… बच्चो की मौत के लिए वहां मौजूद दूषित पानी भी जिम्मेदार है..जहां पीने के लिए साफ पानी भी नहीं है.. सरकार ने बैगा आदिवासियों को ऐसे नजरअंदाज किया है जैसे वो इस देश का हिस्सा ही नहीं है और दो चार की मौत हो भी जाती है कि सरकार का क्या ही चला जायेगा।  इसलिए उन्हें पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया.. न घर है, न सड़के, न पीने का पानी ह और न ही बेसिक स्वास्थ्य सेवायें। ऐसा लगता है कि जैसे उनकी देखभाल की जिम्मेदारी सरकार के दायरे में आती ही नहीं।  ये बच्चे बिना ईलाज के मारे गए। किसी को समय पर इलाज नहीं मिला तो किसी को समय पर डॉक्टर.. हालांकि अब आयोग ने सख्ती दिखाई है। गांव में एंबुलेंस उपलब्ध करा दिया है, प्रशासन से एक हफ्ते में जवाब भी मांगा है। स्वास्थय विभाग की अनदेखी, महिला बाल विकास विभाग की लापरवाही, और उसमें स्थानीय प्रशासन की भूमिका को लेकर भी जांच शुरु कर दी गई है।

आयोग ने पीड़ितो को आश्वासन दिया है कि जो भी बच्चो की मौत का जिम्मेदार होगा,, उन्हें बख्शा नहीं जायेगा.. लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि जहां केंद्र सरकार और राज्य सरकार आदिवासियों के उत्थान, उन्हें समाज के साथ लाने के लिए तमाम योजनाओं को लाकर वाहवाही बटोरने की कोशिश करती है। तो फिर ये चूक किसकी देन है.. क्या बैगा समुदाय आदिवासियों में नहीं गिने जाते.. क्या उनके लिए बेसिक सुविधाओं को मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए.. और सबसे बडा सवाल अगर इन मौतो को लेकर शुरु में ही पूरी जानकारी दुनिया को होती तो शायद दो दर्जन भर माओं की गोद सूनी होने से बच जाती.. आखिर कौन है इन बच्चों की मौत का जिम्मेदार.. जवाब आप खुद तय कीजिये।

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