Article 352: 12 जून 1975.. ये तारीख भारत की उस तानाशाही का कारण है, जो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की लगाई इमरजेंसी के कारण देशवासियों को 21 महीनों तक झेलनी प़ड़ी थी। दरअसल 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाइकोर्ट ने 1971 में हुए लोकसभा चुनावों में की गई धांधली और भ्रष्ट आचरण के साबित होने के बाद चुनावों को रद्द कर देने का फैसला किया था। साथ ही इंदिरा गांधी पर 6 सालों तक चुनाव लड़ने से बैन लगा दिया था। लेकिन वो यूहीं आयरन लेडी नहीं कहलाती। कोर्ट के फैसले को चुपचाप स्वीकार करने के बजाय इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की आधी रात में संविधान के अनुच्छेद 352 का हवाला दिया और देश में राजनैतिक अस्थिरता का दावा करते हुए पूरे देश में भारत की तीसरी इमरजेंसी लागू कर दी। इमरजेंसी करीब 21 महीनों तक चली.. जिसमें न केवल नागरिको के मौलिक अधिकारों का हनन करते हुए अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 के मौलिक अधिकारों को रद्द कर दिया गया। बल्कि इंदिरा गांधी के खिलाफ उठने वाली विपक्षी नेताओ की आवाज को दबाने के लिए उन्हें सीधा सलाखो के पीछे पहुंचा दिया गया। प्रेस पर काबू करने के लिए सेंसरशिप लागू की गई.. अव सवाल ये कि क्या संविधान इसका अधिकार देता है.. क्या है आर्टिकल 352?
क्या कहता है आर्टिकल 352
इंडियन CONSITITUTION का आर्टिकल 352 कहता है कि अगर देश किसी राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे से गुजर रहा है, किसी दूसरे देश के साथ आधिकारिक रूप से युद्ध की घोषणा हो जाये, या फिर अचानक दुश्मन देशों का भारत पर हमला हो जायें, या फिर देश के अंदर ही एक गिरोह सशस्त्र विद्रोह शुरु कर दें, जिससे देश को आंतरिक तौर पर अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है तो ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार के पास .ये हक होगा कि वो आर्टिकल 352 का इस्तेमाल करके देश में इमरजेंसी लागू कर सकते है।
आपातकाल लगाने के लिए नियम
आपातकाल लगाने के लिए नियमों का पालन करना अनिवार्य है। सबसे पहले देश के प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट को लिखित में राष्ट्रपति को याचिका देनी पड़ेगी। जब राष्ट्रपति मंजूरी दे देती है तो आपातकाल तो लागू हो जायेगा, लेकिन उसके बाद एक महीने के अंदर संसद की दोनो सदनो से आपातकाल के प्रस्ताव को विशेष बहुमत से पास कराना अनिवार्य होगा। अगर विशेष बहुमत नही मिलता तो इमरजेंसी रद्द कर दी जायेगी। संसद से बहुमत मिलने के बाद एक बार में 6 महीनों तक ही इमरजेंसी लागू की जा सकती है.. 6 महीनो के बाद फिर से केंद्र सरकार को विशेष बहुमत से पास कराना होगा.. ऐसा हर 6 महीनें में करना अनिवार्य है, हालांकि इमरजेंसी लागू करने की कोई समय सीमा नहीं है।
इंदिरा गांधीं पर सत्ता का दुरूपयोग करने का आरोप
इमरजेंसी लागू होने के बाद राज्यो की ताकत भी केंद्र सरकार के हाथों में होती है, केंद्र राज्य सरकारों को अपने अनुसार निर्देश दे सकती है। ऐसे में संघीय ढांचा एक ही होता है। इस दौरान आर्टिकल 19 रद्द हो जाता है, जिसमें बोलने और संघ बनाने की आजादी शामिल है। मतलब की इमरजेंसी के दौरान आपको सार्वजनिक रूप से तोल मोल कर ही बोलना चाहिए.. वरना आप जेल की हवा खा सकते है। भारत में अब तक 3 बार इमरजेंसी लगी है, जिसमें पहला 1962 के युद्ध के दौरान, दूसरा 1971 के युद्ध के दौरान तो वही तीसरा 1975 में, जिसमें इंदिरा गांधीं पर सत्ता का दुरूपयोग करने का आरोप लगा था। 1977 में इमरजेंसी के खत्म होने के बाद बनी जनता पार्टी की सरकार में पीएम मोरारजी देसाई ने संविधान में 44वां संशोधन किया.. और 44वां संविधान सशोंधन अधिनियम 1978 लेकर आये.. जिसमें आंतरिक अशांति शब्द को हटा कर सशस्त्र विद्रोह को जोड़ा गया।
क्योंकि आंतरिक अशांति के नाम पर इंदिरा गांधी ने काफी लोगो को कुचला था.. अब से आंतरिक अशांति के नाम पर इमरजेंसी नहीं लगेगी.. पहले राष्ट्रपति केवल पीएम के कहने पर इमरजेंसी लागू कर सकते थे, लेकिन अब से पूरे मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश होना अनिवार्य है। वहीं एक महीने के अंदर विशेष बहुमत के साथ संसद की दोनों सदनो की मंदूरी मिलना अनिवार्य किया। वहीं आपातकाल होने पर इसे रद्द करने की चुनौती सुप्रीम कोर्ट में दी सकती है। वहीं केवल अनुच्छेद 19 को ही रद्द किया जायेगा बाकि अनुच्छेद 20, दोषसिद्धी के संबंध में संरक्षण करने और अनुच्छेद 21 जीने और व्यक्ति स्वतंत्रता का अधिकार, किसी भी स्थिति में निलंबित नहीं किया जायेगा। सुप्रीम कोर्ट और हाइ कोर्ट की सभी शक्तियां बकरार रहेगी, वहीं मीडिया भी सेसंरशिप से आजाद रहेगा। यानि की इस संशोधन के जरिए इमरजेंसी का मनमाने ढंग से इस्तेमाल रोका गया था।



