Bihar news: आरक्षण और पूना पैक्ट पर मांझी का बड़ा दावा, गांधी-अंबेडकर विवाद का किया जिक्र!

Jeetan Ram Manjhi
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Bihar news: हाल ही में बिहार (Bihar) के पटना (Patna) खबर सामने आई है,जहां पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी (Former Chief Minister Jitan Ram Manjhi) ने बाबा साहब अंबेडकर (Babasaheb Ambedkar) की दलितों और पिछड़ो के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग को फिर से दोहराया है।

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जीतनराम मांझी ने बाबा साहब की मांग दोहराई

दरअसल केंद्रीय मंत्री (Union Minister) और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (Hindustani Awam Morcha) (सेक्युलर) प्रमुख जीतन राम मांझी (Jitan Ram Manjhi) पटना में आयोजित राज्य परिषद की बैठक  में पहुंचे थे, जहां उन्होंने 1932 में पूना पैक्ट (Poona Pact) के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि बाबा साहब द्वारा SC और ST वर्ग के लिए अगर अलग निर्वाचन क्षेत्र बना दिया गया होता तो आज एसटी (ST) और एससी (SC) जाति के प्रतिनिधि केवल उन्ही जाति के लोगो द्वारा चुने जाते है।

उन्होंने कहा कि ये बेहद दुभाग्यपूर्ण है कि हमारे लिए सीट तो आरक्षित है लेकिन दलित और पिछड़ो के वोट कोई और ले जाता है। वहीं जब सराकरी लाभो को देने की बात होती है तो हम पीछे क्यों छूट जाते है। उन्होंने कहा कि हमारा प्रतिनिधि न होने की वजह से दलितों और पिछड़ो के पास न तो प्रोपर रोजगार है और न ही शिक्षा।

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अलग निर्वाचन क्षेत्र की वकालत की

आज भी केवल 32 प्रतिशत अनुसूचित जाति की साक्षरता दर है। उन्होंने बिना नाम लिये कांग्रेस (Congress) को भी घेरा है, कि बाबा साहब को गांधी जी (Gandhiji) का नाम लेकर डराया गया कि अनशन के कारण अंबेडकर को इस क्लॉज (धारा) के बिना पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर होना पड़ा।’ गांधी जी मर गए तो दलितों को जला दिया जायेगा। इतना ही नही उन्होंने ये भी कहा कि आज़ादी के सात दशकों से ज़्यादा समय बीत जाने के बावजूद, अनुसूचित जातियों में साक्षरता दर केवल 32 प्रतिशत है और उनकी सामाजिक स्थिति संतोषजनक नहीं है।

जीतन राम मांझी ने कहा, “हमारे लोग आरक्षित सीटों पर वोट तो देते हैं, लेकिन जब रोज़ी-रोटी की बात आती है, तो उनको सरकार भूल जाती है और सिर्फ मेहनत-मज़दूरी तक ही सीमित रह जाते हैं। सारे फ़ायदे प्रभावशाली लोग ले जाते हैं।”  लेकिन करीब 94 साल बीतने के बाद जीतनराम मांझी ने फिर से अलग निर्वाचन क्षेत्र की वकालत की है। ऐसे में देखना ये होगा कि अब भी इस पर सामाजिक सहमति बनती है या नहीं। वैसे आपको क्या लगता है।

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