न्यायपालिका व संवैधानिक संतुलन, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और न्यायपालिका का सशक्त दायरा – Constitutional institutions

Constitutional institutions, non constitutional institutions
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Constitutional institutions: भारत की शासन व्यवस्था का तीन आधार है.. विधायिका, कार्यपालिका और न्याय पालिका.. विधायिका यानि की लेजिसलेचर, कार्यपालिका, एक्जीक्यूटिव और न्याय पालिका यानि की ज्यूडीसियरी..इन तीन स्तंभो को देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए संविधान में जगह दी गई,..लेजिसलेचर जिसमें संसद के दोनो सदनो की कार्यप्रणाली शामिल होती है, एक्जीक्यूटिव जिसमें प्रेसीडेंट, प्राइम मिनिस्टर, मंत्री परिषद और government employees की कार्यप्रणाली शामिल है तो वहीं न्यायपालिका में.. सुप्रीम कोर्ट, हाइकोर्ट, और सभी लॉअर कोर्ट शामिल है। लेकिन आंतरिक रूप से इनके कामों को आसान करने के लिए भी कई संस्थागत विभाग बनाये गए.. ऐसी संस्थायें बनाई गई। जो सरकार के बर्डन को कम करने का काम करती है.. जैसे कि चुनाव आयोग.. इलेक्शन कमीशन, संघ लोक सेवा आयोग(यूपीएससी), फाइनेंस कमीशन समेत कई और संस्थाओं को संवैधानिक रूप से मान्यता दी गई है। लेकिन सवाल ये है कि ये काम कैसे करता है और संविधान में कैसे उन्हें सरकार का बर्डन कम करने की जिम्मेदारी दी गई.. उनका देश की तरक्की में क्या योगदान है।

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जानें दो तरह की संस्थाये कौनसी है?

पहली संवैधानिक और दूसरी गैर संवैधानिक..दोनो को एक उदाहरण के तौर पर समझते है.. एक छात्र जिसे आईएएस अफसर बनना है.. उसके लिए वो जीतोड़ मेहनत कर रहा है.. लेकिन एक आईएएस अफसर बनने के लिए उसे तीन चरणो से गुजरना होगा.. आवेदन करने वालो की उम्र 18 से 32 साल की होनी चाहिए, ओबीसी के लिए 35 साल और एससी एसटी वालो के अधिकतम उम्र 37 साल मान्य है। वहीं वो किसी भी मान्यता प्राप्त कॉलेज से ग्रेजुएट होना चाहिए.. जनरल कैटेगरी वाले 6 बार और ओबीसी वाले 9 बार इग्जाम दे सकते है तो वहीं एससी एसटी वाले अपनी आयु सीमा तक कितनी भी बार दे सकते है.. ये परिक्षायें संघ लोक सेवा आयोग यानि की यूपीएससी द्वारा ली जाती है.. जिसे सिविल सर्विस इग्जामिनेशन कहा जाता है.. इसके तीन चरण है प्रीलिम्स, मैन्स, और इंटरव्यू.. ये सारी प्रक्रिया को पास करके अधिकारी बनने वाला शख्स एक सरकारी कर्मचारी बनता है।

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संवैधानिक संस्थायें वो संस्थायें जो सरकार के लिए काम करती है

यानि की .यूपीएससी भारत सरकार के लिए काम करती है.. जो पूरा प्रोसेस खुद देखती है लेकिन अंत में चुना हुआ कैंडीडेंट इंडियन गवरमेंट के लिए काम करने के लिए बाध्य होता है। बदले में उसे सरकार की तरफ से सारी सुविधायें दी जाती है.. इससे आप ये समझ सकते है कि संवैधानिक संस्थायें वो संस्थायें हुई जो सरकार के लिए काम करती है, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद में जगह मिली और ये स्वंतत्र रूप से शाक्तिशाली तरीके से काम करती है। इसमें चुनाव आयोग को अनुच्छेद 324 में जगह दी गई है, जो देश के हर छोटे से लेकर बड़े चुनावो पर नजर रखते है..वहीं कई और संवैधानिक संस्थाये है जो संविधान में शामिल है।

जिसमें Union Public Service Commission, Articles 315 to 323, State Public Service Commission (Articles 315–323), Finance Commission (Article 280), National Commission for Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Articles 338, 338A), Comptroller and Auditor General of India (Article 148), Attorney General of India (Article 76), Advocate General of the State (Article 165)….में ऐसे  प्रावधान है जिन्हें संविधान में भी अहम जगह मिली है.. जो स्वतंत्र रूप से काम करते है और ज्यादा शक्तिशाली है।

गैर संवैधानिक संस्थायें जिन्हें संविधान में जगह नही मिली

वहीं गैर संवैधानिक संस्थायें वो संस्थायें है जो काम तो सरकार के लिए ही करते है, लेकिन इन्हें संविधान में जगह नही मिली है। जिनका गठन करने के लिए सरकार को संसद से मंजूरी लेनी पड़ती है और वो किसी विशेष उद्देश्य को पूरा करने के लिए बनाया जाता है। जिन्हें कभी भी सरकार को भंग करने की शक्ति होती है.. हालांकि इनका काम भी सरकार के एक्सट्रा बर्डन को कम करने का ही होती है। इसमें NITI Aayog, National and State Human Rights Commissions, Central Bureau of Investigation, Central Vigilance Commission, Lokpal and Lokayuktas, Central and State Information Commissions जैसे गैर संवैधानिक संस्थायें है, जो संसद द्वारा ही पारित किये गए प्रस्तावों को पास करने के बाद बने है..और उनके नियम भी संविधान के नियमों में बतायें नियमों पर ही तय किये जाते है लेकिन उन्हें संविधान में जगह नहीं मिली है।

बता दें कि सभी संवैधानिक संस्थाओं को राजनातिक प्रभाव से दूर रखा जाता है ताकि उनकी कार्यशैली निष्पक्ष हो सकें। अगर संवैधानिक संस्थानो के किसी भी नियम को बदलना होगा तो पूरी तरह से संविधान के संशोधन के बाद ही किया जा सकता है। जिसके लिए संसद में पूर्ण सहमति की जरूरत होती है। उम्मीद है आपको संवैधानिक और गैर संवैधानिक संस्थाओ के अंतर का पता चल गया होगा।

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