History of caste system in India: ऋग्वेद में चार वर्णों के बारे में तो है लेकिन जातियों के बंटवारे का जिक्र नहीं है। साफ था कि घर में काम के हिसाब से वर्ण बंटे थे.. लेकिन आर्यो के आने के बाद उन्होंने यहां के मूल लोगो को बरगलाना शुरू किया..इतिहास की माने तो वर्ण व्यवस्था को एक नए रूप में बताते हुए उसे जाति से जोड़ दिया।आर्यों की मानसिकता इतनी विकृत और सामंतवादी थी कि वो यहां के मूल नागरिकों को ही एक दूसरे के खिलाफ करने लगे.. कहते है कि जब एक मजबूत चट्टान पर भी बार बार चोट की जाये तो वो एक दिन टूट ही जाती है। मूल भारतीयो के साथ भी यहीं हुआ। उन्होंने अपनी बेटियों को आर्यो से ब्याह दिया। आयों ने उन्हें दासियों के भांती केवल सेवा करने योग्य बता कर रखना शुरु किया.. जो उनके पुरुषार्थ को पोषित करता। ये व्यवस्था मूल लोगो को भी भाने लगा.. धीरे धीरे वो भी आर्यो के रंग में रंग गए.. और पीड़ा और उत्पीड़न का जो दौर शुरु हुआ वो कई सदियो तक चलता रहा। कई संत हुए जो जातपात के भेदभाव के खिलाफ लड़े लेकिन उनकी पूजा होने लगी.. और उनके विचार को लोगो ने भुला दिया। मगर कुछ ऐसे भी क्रांतिकारी हुए, जिन्होंने भक्ति मार्ग नहीं बल्कि वो रास्ता चुना.. जिसकी भाषा मनुवादी समाज को समझ आती थी..
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मनुवाद के खिलाफ क्रांति का बिगुल
जिसमें सबसे पहले आते है दलित आंदोलन को सबसे पहले शुरु करने वाले ज्योतिबा फूले और सावित्री बाई फूले.. जिन्होंने सत्य शोधक आंदोलन शुरु कर अछूतो को एक नई पहचान दिलाई थी.. दोनो पत्नी पति थे.. 19वी के मध्य में जब महिलाओ को दहलीज पार करने की भी इजाजत नही थी.. ऐसे दौर में ज्योतिबा फूले ने न केवल सावित्री बाई फूले को पढ़ाया लिखाया बल्कि उन्हें महिलाओ को शिक्षित करने का एक बड़ा हथियार भी बनाया। जो समाज महिलाओ के पढ़ने लिखने के सख्त खिलाप था। वो समाज सावित्रीबाई को देखकर बुरी तरह से सकपका गया था। एक महिला है कमजोर है.. क्या ही कर लेगी। कुछ दिनो में थक हार कर घर ही बैठेगी.. ऐसा सोचने वालों के गालों पर तब करार तमाचा पड़ा जब ज्योतिबा फूले ने सावित्रीबाई फूले को केवल देवी समझा नहीं बल्कि देवी माना भी.. कहने के लिए तो शिक्षा हो या धन.. सबके लिए देवी की आरधना होती है, लेकिन समाज में जो घर में बैठी महिला है, उसे कोने में पड़े झाड़ू के बराबर भी इज्जत नहीं दी जाती.. इस सोच को ज्योतिबा फूले और सावित्रीबाई फूले ने तोड़ दी थी। न केवल महिलाओं को बल्कि दलित को भी समाज में सिर उठा कर जीने का हक है.. वो किसी के बाप के गुलाम नहीं है.. और अछूत जैसे विकृत शब्द के खिलाफ उन्होंने ही दलित शब्द कहना शुरु किया था इस क्रांति को देश के पिछड़े और वंचित वर्ग के दिलों में जगाने वाले थे फूले दंपत्ति। साल 1873 में सत्य शोधक आंदोलन पहला ऐसा आंदोलन था जब वाकई में दलितों औऱ वंचितो ने एक साथ सामाजिक असमानता और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद की थी।
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नामशूद्र आंदोलन- बंगाल का आंदोलन
19वी सदी के अंत और 20सदी की शुरूआत में बंगाल में जातिगत भेदभाव और हाशिए पर पड़े नामसुद्र समाज के लोगों के लिए सामाजिक और धार्मिक रूप से बराबरी और सम्मान देने के लिए नामसुद्र आंदोलन की शुरुआत की गईं थी। ये आंदोलन हरिचंद ठाकुर औऱ गुरुचंद ठाकुर ने शुरु किया था। नामसुद्र समुदाय जिन्हें इस आदोंलन से पहले चंडाल समुदाय कहा जाता था, जो कि एक अपमानित शब्द माना जाता था… लेकिन इस अपमान के खिलाफ ठाकुर भाइयो ने बंगाल में आंदोलन शुरु किया और 1911 में ब्रिटिश सरकार में याचिका दायर की कि वो चंडाल शब्द का उच्चारण बैन कर के उसकी जगह नामसुद्र शब्द कहा जाये। आंदोलन का लक्ष्य मानव समानता को बढ़ावा देने, उंची जाति वाली ब्राह्मणी परंपरा और रीति रिवाजो को न मानने और मेहनत के दम पर रोजी रोटी कमाने की सोच रखने वाले मतुआ संप्रदाय की सोच से प्रेरित थी। इसका नतीजा ये हुआ कि शोषित वर्गो ने अपने अधिकारों के लिए लड़ना शुरु कर दिया, वो पूंजीवादियों के दमन के खिलाफ हड़ताल पर चले गए औऱ अपनी मेहनत के लिए उचित मेहनताना की मांग करने लगे। इस आंदोलन से बंगाल में दलित खुद ही प्रभावी रूप से एकजुट होने लगे.. नामसूद्र आंदोलन बंगाल में दलित क्रांति का सबसे सटीक उदाहरण है। हालांकि 1947 के बंटवारे के बाद ज्यादातर बांग्लादेश चले गए और बाकि बिखर गए.. जो कहीं न कहीं दलितों के बिखरने का भी कारण बना.. और ये आंदोलन खत्म हो गया।
सतनामी आंदोलन-गुरु घासीदास, छ्त्तीसगढ़
दलितों से बराबरी का सम्मान दिलाने के लिए भक्तिमार्ग के साथ साथ सामाजिक हिस्सेदारी को चुना था गुरु घासीदास ने.. जिन्होंने 19वी सदी में दुबारा से सतनामी आंदोलन को शुरु किया था। ये जातिवाद के खिलाफ छत्तीगड़ में 1820 के दशक में किया गया विद्रोह था.. गुरु घासीदास ने इस बाद सतनामी आंदोलन को केवल धार्मिक सुधार आंदोलन तक ही सिमित रखने के बजाय उन्होंने जातिवाद भेदभाव, सामंतवाद, ब्रिटिश साम्राज्यवाद और लैंगिक उत्पीड़न के खिलाफ भी आवाज बुलंद कर दी थी। इतिहास में इसे सतनामी क्रांति भी कहा जाता है। इस क्रांति का मूल कारण था कि छत्तीसगढ़ के वो किसान जिन्हें वंचित, अछूतो माना जाता था, उनके जमीनों को सांमतो और ब्रिटिश अधिकारियों ने जबरन अपने कब्जे में ले लिया था.. जिसके खिलाफ ही गुरु घासीदास ने क्रांति की शुरुआत की थी। सतनामियों ने केवल शोषक मालगुजारों की संपत्ति को लक्ष्य बनाया.. जो छत्तीसगढ़ के ज्यादातर हिस्से पर अपना जबरन कब्जा जमा कर बैठे थे। उन्होंने कभी आम लोगो को परेशान नहीं किया। गुरु घासीदास के सतनामी आंदोलन को सोनाखान के राजा रामराय और उनके बेटे वीर नारायण सिंह के साथ साथ छत्तीसगढ़ के स्थानीय आदिवासी समुदाय का भी समर्थन मिला..सतनामी क्रांति को आर्थिक संघर्ष के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है। जहां लोग केवल अपने हक की ही जमीन के लिए लड़ रहे थे।
विटाल विध्वन्शक – गोपाल बाबा वलंगकर महाराष्ट्र
गोपाल बाबा वलंकगर, एक ऐसे शख्स थे जिनकी तारीफ खुद बाबा सहब अंबेडकर ने भी की थी। भारत के पहले ऐसे दलित पत्रकार जिन्होंने समाज के छुआछूत, भेदभाव और असमान व्यावहार की बात बेहद तीखे तरीके से उठाई थी। 19 सदी के मध्य में जन्मे गोपाल बाबा ज्योतिबा फूले के बहुत बड़े समर्थक थे। उनका पूरा नाम गोपाल विट्ठल नाक वलंगकर था. और वो महाराष्ट्र के ही महार जाति से थे.. और मराठा आर्मी के एक सिपाही थे, 1856 में वो आर्मी से रिटायर हुए और उन्होंने सामाजिक सुधार की दिशा में काम करना शुरु कर दिया.. वो पत्रकार के तौर पर कार्य करने लगे और वो दलितो को लेकर उनके लिए न्याय़ और सामाजिक सुधारो को लेकर आर्टिकल लिखा करते थे.. उनके लेखों को बहुत प्रभाव पड़ने लगा और उन्होंने अनार्य दोष परिहार नाम की एक संस्था बनाई..सामाजिक आंदोलन को और ज्यादा हवा देने के लिए 1888 में उन्होंने किताब विटाल विध्वन्षक लिखी थी। इस किताब में बाबा ने हिंदू धर्म ग्रंथो में लिखी बातों के आधार पर 26 सवाल पूछे थे.. यहां पहली बार उन्होंने खुल कर सनातनी हिंदूओ को स्वार्थी और लालची कहा था। वो मानते थे अछूतो की जो स्थिति है उसके लिए जिम्मेदार हिंदू और उनके दकियानूसी धर्म ग्रंथ है। महार जाति से होने के बाद भी उन्होंने ब्राह्मणों और ब्रिटिश के आगे सिर नहीं झुकाया.. और समय समय पर दलितों की ताकत का नमूना दिखाते रहे.. उन्होंने महारो के लिए समाजिक और आर्थिक तौर पर मजबूती देने के लिए संघर्ष किया था।



