19वीं सदी का वो अहिंसक विद्रोह, जिसने ‘राम’ को हर इंसान के भीतर स्थापित कर दिया – History of Ramnami Samuday

History of Ramnami samuday
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History of Ramnami Samuday: साल 2022 में अयोध्या में पूरी भव्यता के साथ बने रामलला के मंदिर का उद्घाटन खुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था.. रोजाना हजारों श्रद्धालु जय श्री राम के नारे लगाते हुए रामलला के दर्शन करने जाते है… लेकिन क्या सच में जो जुबान पर है वहीं दिल में भी है.. राम का नाम मुक्ति का मार्ग देता है.. मगर राम को वाकई में कितना समझा है। हमने.. धर्म…धर्म..धर्म का राग अलापने वालों से एक बार धर्म का सही अर्थ पूछ कर तो देखो.. पसीने न छूट जायें, तो कहना.. राम को मंदिरों में तलाशने के बजाये कभी खुद के अंदर झांकने की कोशिश की… राम को एक अलग नजरो से देखने वाले है रामनामी समुदाय..जिन्होंने 19वी सदी में शुरु किया रामनामी आंदोलन.. जिन्होंने राम के नाम साथ नहीं बल्कि राम तो खुद में समा कर जीना शुरु किया..जिनकी नजरो से राम को देखने पर आपको अहसास होगा कि वाकई में राम कौन है.. क्या है।

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रामनामी समाज की शुरुआत और इतिहास

हिंदू धर्म के नाम पर भेदभाव की सीमा जो लोगो ने लांघी है.. जरा धर्म ग्रंथ उठा कर देखो.. क्या राम ने भेदभाव किया था क्या.. राम के नाम पर खुद की विकृत मानसिकता को बढ़ावा देने वाले जरा पहले ये बताये कि राम है कौन.. किसने राम को जाना है। क्या वो केवल अयोध्य के राजा.. रावण वध करने वाले योद्धा… मर्यादा पुरुषोत्तम राम है.. या उनकी पहचान उन सबसे कही बढ़कर है। जिसे आज हमारा समाज खुली आंखो से भी देखना नहीं चाहता..राम.. शृष्टि की वो उर्जा.. जो चेतना बन कर कण कण में बसी है। हर सजीव और निर्जिव वस्तु में राम है.. तो फिर राम के नाम पर कुछ ब्राह्मणी विचारधारा वालों का कॉपीराइट कैसे हो गया। जब राम ने सबरी के जूठे बेर खाये तब उन्होंने भेदभाव नहीं किया तो फिर उसी राम के बनाये मानवो के साथ ये क्रूरता क्यों.. कौन है इसका जिम्मेदार.. रामनामी समुदाय का हर एक शख्स सिर से लेकर पैरो तक राम नाम से ढका है।

रामनामी चादरे तो बहुत देखी होगी.. रामनामी शरीर कैसा होता.. वो उन्हें देखकर अहसास होगा..साल 1890 में ईसाई मिशनरियों और इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओ के धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए शुरु किया गया एक ऐसा आंदोलन.. जिसने लोगो की सोच को बदल दिया। हर साल छत्तीसगढ़ के महानदी के किनारे सर्दियों में एक 3 दिवसीय भजन मेले का आयोजन होता है। ये तीन दिनो में मेले में आने वाले भी रामभक्त होते है और सामूहिक रूप से रामायण का पाठ करते है.. इस मेले में एक अनोखी बात देखने को मिली.. बहुत से लोगो ने पूरे शरीर पर राम राम गुदवाया हुआ था.. जिन्हें लोग रामनामी कहते है।  रामनामी समुदाय की शुरुआत पहली बार 19वी सदी के मध्य में हुई थी, जिसे जांजगीर-चांपा ज़िले के चारपारा गांव में दलित जाति में पैदा हुए व्यक्ति ने शुरु किया था।

परशुराम को 30 साल की उम्र में कुष्ठ रोग

रामनामी समुदाय की शुरुआत को लेकर दो अलग अलग कहानियां है। पहली कि जब परशुराम को अछूत कह कर मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया और राम नाम कहते पह उसका अपमान किया तो उसने अपने माथे पर ही राम राम लिखवा लिया..वहीं दूसरी कथा के अनुसार परशुराम को 30 साल की उम्र में कुष्ठ रोग हो गया था, लाख कोशिशो को बाद भी उसे आराम नहीं हुआ।  इस दौरान रामानंदी साधु रामदेव  से मिला जिन्होंने उसे राम नाम का जाप करने की सलाह दी.. राम नाम के जाप से उसका कुष्ठ रोग ठीक हो गया, तब उसने सोचा कि केवल नाम लेने से ऐसा चमत्कार हुआ तो अगर उसे खुद में समाहित कर लें तो क्या होगा। बस उसने शरीर पर राम नाम गुदवा लिया। धीरे धीरे उसके प्रभाव में आकर पूरे गांव वाले भी राम के नाम का जाप करते और उसे शरीर में गुदवाने लगे.. वो सात्विक जीवन जीने लगे.. ये समय करीब 1870 का था.. जब ईसाई मिशनरीयो और इस्लामिक कट्टरपंथियों ने हिंदुओ और सिखों का धर्म परिवर्तन कराना शुरु किया जिसमें वो दलितों और आदिवासियों को निशाना बनाते थे।

रामनामी समुदाय के क्रांतिकारी कदम

ऐसे में रामनामी समुदाय ने जो क्रांतिकारी कदम उठाये उसने उन्हें हमेंशा के लिए महान बना दिया। जब कट्टरपंथियों ने उनके हिंदू धर्म को मानने और अपनी परंपरा रो फॉलो करने के लिए आंदोलन शुरु किया तब उन्हें बुरी तरह से प्रताड़ित किया जाता.. नतीजा ये हुआ कि उन लोगो ने अपने कपड़ो,  चादर, गमछा, ओढ़नी… सब जगह राम-राम लिखना शुरु कर दिया। लेकिन जब इससे भी काम नहीं बना तो उन्होंने खुद के शरीर पर ही राम राम गुदवाना शुरू कर दिया। मगर अत्याचार का दौरा खत्म नहीं हुआ। बगावत करने वाले और राम राम शरीर पर लिखवानें वालों के शरीर को लोहे की छड़ो से दाग दिया गया.. घर के घर जला दिये गए.. लेकिन जो राम नाम उनके दिल में बसा था भला उसे कैसे निकाल सकते थे। शरीर पर राम नाम गुदवाने को ‘नख शिख’ कहा जाता है। हैरानी की बात तो ये है कि इस एक आंदोलन के कारण जिन दलितो को कभी मंदिर में जाने और राम का नाम लेने की इजात नहीं थी.. उन्हें राम नाम लेने का हक मिला.. पढ़ने का अधिकार मिला.. हालांकि ये शिक्षा उन्हें स्कूल से नहीं बल्कि रामायण से मिली।

राम का नाम लेने से कुछ मनुवादियों को इतनी परेशानी हुई कि उनके खिलाफ मुकदमा कर दिया गया.. मगर तब रामनामी समुदाय के लोगो ने तर्क दिया कि वो राजा राम का नाम नहीं ले रहे है वो तो संसार के कण कण में समाहित है.. हमारा सगुण राम से कोई लेना देना नहीं है.. कोर्ट ने उनकी दलीलों को सही ठहराया औऱ 12 अक्टूबर 1912 को रायपुर के सेशन जज ने रामनामी समुदाय के हक में फैसला सुनाते हुए कहा कि रामनामी नो तो राम की मूर्ति पूजा कर रहे है औऱ न ही मंदिर में जा रहे है.. तो उनका राम नाम लेना पाप कैसे हुआ.. वो राम को अपनित्र कैसे कर रहे है। कोर्ट ने केवल उन्हें मान्यता दी बल्कि  उनकी सुरक्षा का भी आश्वासन दिया। रामनामी कहते है कि जब दशरथ पुत्र राम का जन्म नहीं हुआ था तब भी रामनाम संसार में था.. लोग मंदिर जाकर मूर्ति पूजते है हमने अपने देह को ही मंदिर बना लिया। आप वेद पुराण, धर्म ग्रंथ सब उठाकर देखो..सबका एक ही सार है राम-राम.. रामनामी समुदाय एक ऐसा समुदाय है जो स्त्री पुरुष के भेदभाव के बिना सबको एकसमान मानता है। सबको एक साथ भजन करने का हक है, कोई पंडित औऱ महंत नहीं है, कोई मंदिर, कोई मूर्ति पूजा नहीं है, कोई शिष्य कोई गुरु नहीं है.. अगर कुछ है तो केवल आपरूपी राम नाम..जो उनके शरीर पर है।

हालांकि नई पीड़ी गोदना करवाने से कतराती है.. वो रामनामी समाज की हर परंपरा को मानती है निभाती है लेकिन नख शिख परंपरा से बचती है.. उनके अपने कारण है.. मौजूदा समय में नई पीड़ी किसानी करने के बजाय नौकरी पेशा से जुड़ रही है.. और इस तरह से शरीर पर गुदवा कर काम करना आसान नहीं है। मगर रामनामी समुदाय को उससे कोई फर्क नहीं पड़ता.. वो परंपरा के नाम पर युवाओ को प्रताड़ित नहीं करते.. बस इतना चाहते है कि उनका श्रद्धा सच्ची हो। एक दलित समुदाय को एक नई पहचान और सम्मान दिलाने वाली रामनामी समुदाय शायद आज के समय में उन समुदायों में एक है जो बाहरी आंडबरो पर नहीं बल्कि राम नाम की सच्ची भक्ति पर टिके है।

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