महाबली सिंह का राजनीतिक सफर, जिसने बनाई अलग पहचान – Mahabali Singh

Mahabali singh, Bihar Politician Mahabali Singh
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Mahabali Singh: आप किसी सुपरस्टार से जुड़ कर सुर्खियो में तो आ सकते है लेकिन एक दलित जाति से आने वाले के लिए जनता के दिलों में जगह बनाना, और सुर्खियों में रहना क्या आसान होगा..लेकिन एक कहावत है न कि मेहनत इतनी खमोशी से करो की आपकी सफलता शोर मचाये.. साल 2024 के आम चुनावों में संसदीय सीट से पीछे हटने के बाद भी विधानसभा चुनाव में एक ऐसी प्रत्याशी को टक्कर देना.. जिसकी फैन फॉलोइंग लाखों में है.. आसान नहीं था.. लेकिन बिहार के जेडीयू प्रत्याशी महाबली सिंह ने अपनी मेहनत के दम पर जीत कर बता दिया कि अगर शेर एक कदम पीछे लेता है तो वो बड़ी छलांग लगाने वाला है। महाबली सिंह, जिन्होंने काराकाट सीट से सुपरस्टार पवन सिंह की पत्नी ज्योति सिंह को कड़ी टक्कर दी थी। बिहार की राजनीति में दलित समुदाय के हक में आवाज बुलंद करने वाले एक दलित नेता.. जो जदयू के प्रमुख नेताओं में गिने जाते है।

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कौन थे महाबली सिंह?

साल 2022 में बिहार में जातिगत जनगणना का मांग काफी हाइलाइट हुई थी, बिहार सरकार चाहती थी कि जातिगत जनगणना हो, और उन्हें समर्थन देने वालों में महाबली सिंह भी थे। बिहार में जातिय भेदभाव और उनके अधिकार को लेकर अक्सर होने वाली बहस पर रोक लगाने के लिए जातिय जनगणना को सही ठहराने वाले महाबली सिंह कुशवाहा समुदाय से आते है। उनका जन्म 20 अप्रैल 1955 को बिहार के कैमूर जिले के भभुआ में हुआ था। महाबली सिंह ने कैमूल जिले के ही भगवानपुर हाई स्कूल से आठवी तक ही पढ़ाई की थी। उनके पिता का नाम नागेश्वर सिंह और माता का नाम यशोदा देवी था। उन्होंने आगे पढ़ाई नहीं की और पिता का खेती बाड़ी में हाथ बंटाने लगे। इसी बीच बिहार में उंचि जाति के खिलाफ शुरु हुए सामाजिक आंदोलनों में उन्होंने हिस्सा लेना शुरु कर दिया।

महाबली सिंह राजनितिक करियर की शुरुआत

वो सामाजिक कार्यों से जुड़ गए और दलितों पिछड़ो के लिए आवाज बुलंद करने लगे। इस दौरान उनकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए बहुजन समाज पार्टी ने बिहार में अपनी जमीन तैयार करने के लिए महाबली सिंह को 1995 में पहली बार चैनपुर विधानसभा सीट के टिकट दिया, ये उनके राजनितिक करियर की शुरुआत थी.. और जिस उम्मीद के साथ बसपा ने महाबली सिंह को चुना था, वो उम्मीद कायम रखते हुए उन्होंने पहली ही बार में चुनाव जीत दर्ज की थी.. और वो चैनपुर से विधायक चुने गए। लेकिन जल्द उन्हें अहसास हुआ कि बसपा के साथ रहकर शायद को तरक्की न कर पाये, बस फिर क्या था दूसरे कार्यकाल में उन्होंने पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव के साथ हाथ मिला लिया और 2002 में राबड़ी देवी के नेतृत्व वाली सरकार में पीडब्ल्यूडी मंत्री बने। एक विधायक से सीधा मंत्री पद मिलना उनकी कुशल राजनीति को दर्शाता है। लेकिन जल्द ही लालू यादव के साथ जुड़ी कंट्रोवर्सी के कारण उन्हें आरजेडी का भविष्य भी अंधेरे में दिखा और उन्होंने फिर से दलबदल किया और 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल हो चैनपुर सीट जीत ली।

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राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी का गठन

साल 2009 में जेडीयू ने उनपर बड़ा भरोसा दिखाया और काराकाट संसदीय क्षेत्र से आम चुनाव में खड़ा किया.. राजनीति में कब पाला बदलना है और कब किसके साथ खड़ा होना है महाबली सिंह को पता है.. उन्होंने काराकाट सीट से जीत दर्ज की। वो वहां से सासंद चुने गए और उनके योगदान के लिए  31 अगस्त 2009 को उन्हें रक्षा समिति का सदस्य नियुक्त किया गया। हालांकि 2014 के आम- चुनावों में बीजेपी लहर के कारण और जेडीयू से विवाद के कारण अलग हुए उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी का गठन किया औऱ काराकट से महाबली सिंह के खिलाफ खड़े हुए.. जिसके कारण उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.. लेकिन जल्द ही महाबली सिंह की कीमत भी लोगो को समझ आई और 2019 में वो फिर से वो जेडीयू की ओर से खड़े हुए औऱ सासंद बने थे। हालांकि 2024 में वो सीट उन्हें नहीं मिली.. लेकिन उन्होंने जेडीयू के लिए लड़ना जारी रखा।

2025 विधानसभा चुनाव में वो फिर से खड़े हुए लेकिन वो इस सीट को फिर से हासिल नही कर सकें और भाकपा माले के अरूण माले से 2836 वोटों से हार गए। महाबली सिंह दूसरे स्थान पर रहे थे। फिलहाल वो जेडीयू के ही बिहार प्रदेश उपाध्यक्ष के पद का कार्य कर रहे है। जेडीयू को मजबूत स्थिथि देने में महाबली कुशवाहा का भी बड़ा योगदान रहा है हालांकि वो विवादों में भी रहे है।  दलितो को एकजुट करके उन्हें जातिगत प्रताड़ना के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित करने में महाबली कुशवाहा का नाम काफी सम्मान से लिया जाता है। उन्होंने शाहाबाद में दलित एकजुट करने के लिए अभियान चलाया था. इतना ही नहीं सोर्सेज की माने तो 18 मार्च 1999 को बिहार के सेनारी नरसंहार को करवाने में महाबली सिंह का भी नाम सामने आया था, लेकिन कोर्ट ने इस नरसंहार में किसी को भी आरोपी नहीं बनाया जिसके कारण महाबली सिंह का नाम भी साफ हो गया। हालांकि अब भी कभी कभी उनका नाम उछाला जाता है। लेकिन उससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता वो जेडीयू के प्रति, समाज के पिछड़े वंचितो के प्रति बेहद समर्पित नेता है।

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