Buddhist refugees: 15 अगस्त 1947 को हम अक्सर इंडिया के इंडिपेंड कंट्री बनने के लिए याद करते है। ये वाकई में खुशी की बात है और हमेशा याद भी रखा जाना चाहिए लेकिन उसी आजादी के बीच हम उस बंटवारे को भी नहीं भूलना चाहिए जिसके कारण भारत तीन टुकड़ों में बंट गया था। एक बना पूर्वी पाकिस्तान और दूसरा बना पश्चिमी पाकिस्तान। वहीं इस बंटवारे में दो करोड़ लोगो को विस्थापित होना पड़ा था। हिंदुओं और सिखो ने हिंदुस्तान चुना और मुसलमानों ने पाकिस्तान को।।
ये बंटवारा हिंदू, सिख, मुस्लिम तक सीमित हो गया है, लेकिन इन बंटवारे के बीच एक और समुदाय था, जिन्हें बंटवारे की मार झेलनी पड़ी थी, जिन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा था, जो आज भी भारत के कई राज्यों में शरणार्थी बन कर रह रहे हैं। जिसमे एक ऐसा गांव भी है जिसे पाकिस्तान से आये बुद्ध शर्णाथियों का गांव कहा जाता है। अपने इस लेख में हम ऐसे ही गांव के बारे में जानेंगे.. जो बौद्धों का गांव कहलाते है।
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पश्चिमी पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान पर तानाशाही शुरु
1947 में एक तरफ पंजाब का बंटवारा हुआ.. और पश्चिमी पाकिस्तान बना था तो दूसरी तरफ बंगाल का बंटवारा हुआ और पूर्वी पाकिस्तान बना.. मगर पश्चिमी पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान पर तानाशाही शुरु कर दी। उस दौरान वहां की सेना ने जो बर्बरता की,, उससे पूर्वी पाकिस्तान की जनता त्राही त्राही कर रही थी..वहीं जब इस्लामिक शासकों का बौद्ध भिक्षुओं और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के साथ जिस तरह का बर्बरतापूर्वक व्यावहार किया गया, वो किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में पाकिस्तान में बौद्ध ऐसे में पाकिस्तान में बौद्ध धर्म को मानने वालों के लिए वहां रहना, सांस लेना तक भी दूभर हो गया, तब साल 1971 में तत्कालीन भारत के पीएम इंदिरा गांधी की मदद से पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान से आजाद कराया और तब जन्म हुआ बंग्लादेश का.. इस दौरान भी करीब 1 करोड़ लोगों ने विस्थापन किया और विस्थापित होकर वो भारत के ज्यादातर पूर्वोत्तर राज्यों में आकर बसने लगे। जिसमें असम, मेघालय, अरूणाचल प्रदेश जैसे राज्य शामिल है।
सीमा पार से आये बौद्ध धर्म के शरणार्थी
इन्हीं में से अरूणाचल प्रदेश का चांगलांग और मियाओ एक ऐसा क्षेत्र है, जहां सीमा पार से आये बौद्ध धर्म के लोग शरणार्थी के रूप में रह रहे है। पाकिस्तान से भारत आये बौद्ध शरणार्थियों को चकमा बौद्ध शरणार्थी कहा जाता है। चांगलांग और मियाओ एक ऐसा क्षेत्र है जहां सबसे पहले 1950 के दशक में तिब्बत से आये शरणार्थियों ने डेरा डाला था। वो तिब्बती परंपरा को फॉलो करते थे, लेकिन 1971 में बंग्लादेश के शरणार्थियों ने भी इस स्थान को ही चुना.. आज अरूणाचल प्रदेश के चांगलांग और मियाओ में सबसे ज्यादा बौद्ध लोग रहते है जो कि तिब्बत औऱ बंग्लादेश से आये शरणार्थी ही है। चकमा शरणार्थी असल में चटगांव पहाड़ी क्षेत्र की एक प्रमुख जनजाती मानी जाती है।
शरर्णाथियों ने पहली बार 1962 में चटगांव से पलायान शुरु किया
रिपोर्ट के मुताबिक चकमा शरर्णाथियों ने पहली बार 1962 में चटगांव से पलायान शुरु किया था, जब रिपोर्ट के मुताबिक चकमा शरर्णाथियों ने पहली बार 1962 में चटगांव से पलायान शुरु किया था, दरअसल चटगांव में कर्णफुली नदी पर पूर्वी पाकिस्तान की सरकार ने कपताई जलविद्युत परियोजना के तहत डैम का निर्माण शुरु किया था, जिससे उस इलाके में रहने वाले चकमा समुदाय की करीब 40% उपजाऊ कृषि भूमि डूब गई। नतीजा रातों-रात करीब 1 लाख से ज्यादा चकमा बौद्ध लोगों को बेघर कर दिया। वहीं उसके बाद उनकी जमीनों को हड़पने और धार्मिक-सांस्कतिक भेदभाव के कारण साप्रादायिक दंगो के कारण चकमा बौद्धो को सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया।
चकमा समुदाय के बुद्ध लोग
उनके पास उपजाई भूमि हुआ करती थी, जिसे छीनने के लिए उन्हें बुरी तरह से प्रताड़ित किया गया। उनकी रक्षा के लिए उस दौरान 1964 से लेकर 1969 तक नेफा ऩर्थ ईस्ट फ्रंटिंयर एजेंसी ने उन्हें अरूणाचल प्रदेश में बसाना शुरु किया। जिसमें चांगलांग, मियाओ के साथ साथ डियाम, बोर्दुमास, लोहित औऱ पापुम जैसे क्षेत्रों में भी बौद्ध अनुयायी रह रहे है। उसके अलावा मिजोरम के चांगते में भी चकमा समुदाय है, यहां उन्हें बसाने के लिए चकमा स्वायत्त जिला परिषद Chakma Autonomous District Council – CADC) बनाया गया है.. जो चांगते में ही है। साथ ही त्रिपुरा के कंचनपुर और असम में भी चकमा बौद्ध समुदाय अब स्थाई रूप से बस गया है। ये वो शरणार्थी है जो पाकिस्तान से भारत आये थे.. वहां की असंवेदनशील जनता औऱ सरकार के अत्याचारों से तंग होकर.. औऱ भारत ने उन्हें खुले हाथों से गले लगाया है।



