बाबा साहेब का महापरिनिर्वाण, 6 दिसंबर, दलित-बहुजन समाज के लिए काला अध्याय – Ambedkar Mahaparinirvan Diwas

Baba Shahab Ambedkar
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Ambedkar Mahaparinirvan Diwas:  6 दिसंबर 1956, दिल्ली के प्रधानमंत्री कार्यालय में पीएम पंडित जवाहरलाल नेहरू के लिए एक फोन कॉल आया। ये कॉल आया था दिल्ली के ही 26 अलीपुर रोड से, और कॉल की दूरी तरफ थे नानकचंद रत्तू। जैसे ही पंडित नेहरू ने रत्तू का नाम सुना, उन्होंने बिना किसी देरी एक फोन ले लिया, क्योंकि ये कॉल उस शख्स के निवास स्थान से थी, जिनका ओहदा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से भी बड़ा हो चुका था। रत्तू ने पीएम को एक ऐसी मनहूस खबर दी, जिसे जानने के बाद पीएम ने उस दिन के सारे काम छोड़ दिए और सीधा रुख किया 26 अलीपुर रोड का। बाबा साहब आंबेडकर नहीं रहे, उनका परिनिर्वाण हो गया था। नेहरू तुरंत वहां पहुंचे, धीरे धीरे जमा होने लगी, लेकिन तभी नेहरू ने एक फैसला किया, बाबा साहब का अंतिम संस्कार दिल्ली में नहीं बल्कि मुंबई ने किया जाएगा। और उसी रात उनके पार्थिव देह को मुंबई भेज दिया गया, लेकिन क्यों। बाबा साहब को अचानक हुई मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए थे। उनकी पत्नी सविता आंबेडकर पर उनकी हत्या का इल्जाम क्यों लगा। वहीं जब अंतिम समय तक बाबा साहब दिल्ली में थे तो क्यों नेहरू नहीं चाहते थे कि बाबा साहब का अंतिम संस्कार दिल्ली के हो, लेकिन जब बाबा साहब के मौत पर संदेह हुआ तो उन्होंने क्यों जांच के आदेश दे दिए।

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बाबा साहब अचानक हुई मौत पर उठे कई सवाल

बाबा साहब की उम्र 66 साल थी, और 2 महीने पहले ही उन्होंने अक्टूबर में बौद्ध धर्म अपना कर नवयान परंपरा की शुरुआत की थी..ऐसे में उनकी अचानक हुई मौत से कई सवाल उठने शुरु हुए। उनकी मौत वाकई में नेचुरल थी या किसी की लापरवाही.. यहां तक कि उनकी पत्नी पर भी आरोप लगे कि उन्होंने ही बाबा साहब को मारा है.. लेकिन इस बात में कितनी सच्चाई है.. उसे लिए हमारा ये जानना जरूरी है कि 5 दिसंबर 1956 को क्या क्या हुआ था.. साल 1956, बाबा साहब राजनीति से दूर होकर बौद्ध के शरण में अपना जीवन बिता रहे थे। वो अपनी अंतिम किताब बुद्ध एंड हिज धम्म के अंतिम भाग पर काम कर रहे थे। कई सालों तक बौद्ध धर्म को जानने के बाद उन्होंने तय किया था कि वो बौद्ध धर्म अपनाएंगे, 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर के चैत्य भूमि पर लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया। यहां उन्होंने एक नई बौद्ध परंपरा नवयान शुरू की थी। इसी बीच उनकी तबियत थोड़ी खराब चल रही थी। वो वापिस दिल्ली आ गए थे और अपना ज्यादातर समय अपने घर पर ही बिताते थे।

बाबा साहब को थी डायबिटीज और हाइ बीपी बीमारी

इस दौरान उनके सहायक नानकचंद रत्तू ही उनका ज्यादातर काम किया करते थे, वो पिछले 16 सालों से बाबा साहब के पास काम कर रहे थे। 5 दिसंबर को भी उनकी तबियत थोड़ी खराब थी तो बाबा साहब थोड़ा देर से सो कर उठे। रत्तू ने बाबा साहब के उठने के बाद उनसे ऑफिस जाने की बात की, बाबा साहब ने उन्हें जाने की इजाजत दे दी। वहीं बाबा साहब की तबियत को लेकर परेशान उनकी पत्नी डॉ सविता आंबेडकर ने बाबा साहब की जांच के लिए उनके सीनियर डॉक्टर और बाबा साहब के मित्र मालवंकर को मुंबई से बुलाया था। मालवंकर ने सुबह उनकी जांच की तो वहीं पुरानी डायबिटीज और हाइ बीपी के कारण बाबा साहब का स्वस्थ गिर गया था। मालवंकर को 5 दिसंबर को वापिस मुंबई जाना था तो दोपहर में सविता आंबेडकर और मालवंकर कुछ जरूरी सामान लेने के लिए बाजार चले गए। शाम को 6 बजने पर भी जब सविता वापिस नहीं लौटी तो बाबा साहब काफी नाराज़ हो गए, तभी रत्तू लौट आए थे। उन्होंने बाबा साहब का नाराजगी भरा चेहरा देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा। रत्तू ने जांच ने दौरान बताया कि बाबा साहब को लगता था कि उनका ध्यान नहीं रखा जा रहा है, बाबा साहब ने उसके बाद रत्तू को कुछ टाइप करने के लिए पेपर दिए।

बाबा साहब की किताब बुद्ध एंड हिज धम्म

जब वो अपना काम खत्म करके लौटने वाले थे तभी सविता आंबेडकर लौटी। बाबा साहब सविता को देख कर काफी नाराज़ हो गए और उनके काफी डांट लगाई थी।सविता इतनी शालीन महिला थी कि उन्होंने बाबा साहब की सारी बातें चुपचाप सुन ली। लेकिन इसी बीच जैन धर्म का प्रतिनिधि मंडल बाबा साहब से मिलने पहुंचा, बाबा साहब बीमार थे लेकिन उन्हें मिलना पड़ा क्योंकि वो मुलाकात बाबा साहब ने तय की थी। बाबा साहब रत्तू को ही पकड़ कर ड्राइंग रूम तक हुए और सोफे पर बैठ गए। उन्हें कमजोरी सी लग रही थी। लेकिन तब भी उन्होंने धीरे धीरे प्रतिनिधिमंडल ने बात की। मंडल ने बाबा साहब को 6 दिसंबर के कार्यक्रम के आमंत्रित किया था। इस दौरान मालवंकर जिन्हें उसी रात मुंबई निकलना था उन्होंने अंतिम बार बाबा साहब का चेकअप किया, और बाबा साहब को आराम करने को कहा। बाबा साहब ने मंडल से कहा कि उनकी सेहत अगर इजाजत देगी तो वो जरूर आएंगे। जिसके वो लोग चले गए।

इस दौरान उनका रसोइया बाबा साहब से पूछने आया कि वो क्या खाएंगे, बाबा साहब ने बस इतना कहा कि वो थोड़ा चावल खाएंगे। रत्तू बताते है कि बाबा साहब ने थोड़ा सा खाना खाया और रत्तू से कहा कि उनके सिर पर थोड़ा सा तेल लगा दो, और बुद्धम शरण गच्छामि गुनगुना रहे थे।जिसके बस उन्होंने रत्तू को जाने से पहले कुछ किताबें उनके सिरहाने के पास के टेबल पर रख देने को कहा, जिसने उनकी अंतिम किताब भी थी, क्योंकि उन्हें बुद्ध एंड हिज धम्म के भूमिका और परिचय पर कुछ काम करना था। रत्तू ने बन साहब के कहे अनुसार किया और चले गए।

बाबा साहब की अंतिम विदाई मुंबई की चैत्य भूमि

बाबा साहब पढ़ने के शौकीन थे इसलिए बीमार होने के बाद भी वो पढ़ते रहे। वहीं बगल में सविता आंबेडकर सो रही थी। लेकिन अगले दिन जब सविता आंबेडकर की आंख खुली तो उन्होंने देखा कि बाबा साहब कुशन पर पैर रख कर सो रहे थे। सविता अंबडेकर ने उन्हें आवाज दी.. लेकिन बाबा साहब के शरीर में कोई हलचल नहीं हुई..कई आवाज दी लेकिन कोई हलचल न होने पर उन्होंने तुरंत रत्तू को लाने का संदेश दिया। रत्तू भागते हुए पहुंचे तो सविता अंबेडकर पत्थर की सोफे पर बैठी थी.. बाबा साहब दुनिया छोड़ कर चले गए थे.. रत्तू ने बाबा साहब को आवाज दिया,, उनके छाती को दबाया.. मुंह में पानी डाला, लेकिन सब बेकार था.. बाबा साहब जा चुके थे। इस खबर को तुरंत पीएमओ में दी गई और नेहरू तुरंत वहां पहुंचे.. लेकिन उन्होंने बाबा साहब का अंतिम संस्कार करने के लिए उनके शरीर को मुम्बई भेजने का फैसला किया.. जिसके दो कारण थे..पहला बाबा साहब के इकलौते बेटे यशवंत अंबेडकर चाहते थे ।  उनकी अंतिम संस्कार मुम्बई की चैत्य भूमि पर बौद्ध रीति रिवाज से हो.. वहीं दूसरा कारण था कि नेहरू जानते थे कि बाबा साहब का कद नेहरू और महात्मा गांधी से ज्यादा हो चुका था.. अगर दिल्ली में अंतिम संस्कार होता तो गाँधी जी की समाधि की चमक फीकी पड़ जाती, वहीं दिल्ली में जातिवादी कट्टरवादियों का जमावड़ा था, जिन्हें खुश करने के लिए ये फैसला लिया गया था और मुम्बई की चैत्य भूमि पर लाखों लोगों ने बाबा साहब को अंतिम विदाई दी थी। वहीं सविता अंबेडकर पर लगे आरोपो की जांच के आदेश के पीछे भी नेहरू का अपना स्वार्थ था.. वो ये साबित करना चाहते थे कि भले ही राजनैतिक रूप से दोनो के विचार अलग है, लेकिन नीजि तौर पर वो बाबा साहब के जाने से बेहद दुखी है.. और उनकी मौत का सही कारण वो भी जानना चाहते है। बाबा साहब का जाना बहुजन समाज के लिए बहुत बड़ा नुकसान था.. जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी।

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