Allahabad High Court: हाल ही में दलितो से जुड़ा अगला मामला उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के प्रयागराज (Prayagraj) से है, जहां एक दूसरी जाति में शादी करने के बाद भी जातिगत भेदभाव का शिकार हुई महिला का केस रद्द करने की अपील को इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने खारिज करते हुए साफ कर दिया है कि किसी दूसरी जाति या धर्म में शादी कर लेने से किसी की जाति नहीं बदल जाती। इसके अलावा, कोर्ट ने साफ़ किया कि जन्म से मिली जाति की पहचान शादी या धर्म बदलने से खत्म नहीं होती है, और ऐसे मामलों में SC/ST (अत्याचार निवारण) एक्ट के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा बनी रहती है।
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SC/ST Act को लेकर इलाहाबाद हाइकोर्ट का बड़ा फैसला
दरअसल साल 2022 में अलीगढ़ के विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी अधिनियम (SC/ST Act) के आधार पर एक पक्ष के खिलाफ समन जारी किया गया था, क्योंकि शिकायतकर्ता ने मारपीट करने और उसके परिवार पर जानलेवा हमला करने का आरोप लगाया था। साथ ही जातिसूचक गालियां देने का आरोप लगा कर एससीएसटी एक्ट के साथ साथ कई धाराओं में मामला दर्ज कराया था। लेकिन उल्टा आरोपी पक्ष ने क्रोस केस कर दिया किया कि शिकायतकर्ता ने जाट समुदाय के एक व्यक्ति से शादी कर ली है औऱ उस आधार पर अब वो एससी एसटी एक्ट (SC/ST Act) का इस्तेमाल नहीं कर सकती है।
जातिगत रूप से प्रताड़ित करने का किसी को अधिकार नहीं
लेकिन कोर्ट ने इस अपील को खारिज करते हुए कहा कि केवल इस आधार पर की पीड़िता ने दूसरी जाति में शादी कर ली है, उसे जातिगत रूप से प्रताड़ित करने का अधिकार किसी को नहीं है। क्योंकि शादी करने से उसकी जाति में कोई बदलाव नहीं आयेगा। वही जस्टिस अनिल कुमार-X की अध्यक्षता वाली बेंच ने दिनेश और अन्य लोगों की अपील को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। आरोपियों ने दलील दी थी कि चूंकि वह महिला—जो अनुसूचित जाति से थी—ने जाट समुदाय में शादी की थी, इसलिए वह SC/ST एक्ट के तहत कार्रवाई शुरू नहीं कर सकती; कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।
याचिका को लेकर हाईकोर्ट का फैसला
कोर्ट ने अपने फैसले से साफ कर दिया है कि अगर कोई शादी या धर्म बदलने के नाम पर जातिगत अपमान करता है तो वो पूरी तरह से गैरकानूनी ही है.. हालांकि इलाहाबाद हाइकोर्ट का ये फैसले सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के लिए एक चुनौती जैसा लग रहा है जिसमें दलितों के ईसाई और मुसलमान बनने के बाद एससी एसटी के सारे हक छीन लिये जाते है। क्या आपको लगता है कि कोर्ट के इस फैसले के बाद दलित इसाईयों और मुसलमानो को अपने हक के लिए लड़ने का एक और मौका मिल गया है।



