Dr. Ambedkar: बाबा साहब का जन्म 20 सदी के अंत में हुआ था.. और उन्होंने 21 वी सदी में एक नए भारत की कल्पना को साकार होते देखा था। उन्होंने न केवल दलितों और पिछड़ो के लिए सम्मानपूर्ण जीवन की कल्पना की थी, बल्कि उसके लिए लंबी लड़ाई भी लड़ी थी। ये उनकी दूरदर्शिता ही थी कि उनके बनाये संविधान ने नए और हाइटेक भारत की नींव रखी थी। मनुस्मृति पर चलने वाले समाज को संविधान की किताब थमाई.. जहां कोई छोटा या बड़ा नहीं बल्कि सभी सामान है। बाबा साहब ने 21वी सदी का भारत कैसा होना चाहिए। उसपर कई बार चर्चा की थी.. लेकिन उनकी संकल्पना को शब्दों में पिरोया देश के 13 राष्ट्रपति स्वर्गीय प्रणब मुखर्जी.. जिन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर स्मृति व्याख्यान के अवसर पर डॉ. अम्बेडकर द्वारा परिकल्पित 21वीं सदी में भारत की संकल्पना कैसी होनी चाहिए उसके बारे में बताया था। बाबा साहब के उस अनोखे सपने की कहानी, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की जुबानी..
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डॉ. भीमराव अंबेडकर स्मृति व्याख्यान
4 सितंबर 2014 की तारीख थी… मानीनिय प्रणब मुखर्जी देश के 13वें राष्ट्रपति थे.. और दिल्ली का विज्ञान भवन बाबा साहब अंबेडकर की यादों में डूबा था। डॉ अंबेडकर फाउंडेशन ने तत्कालीन सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री श्री थावर चंद गहलोत की देखरेख में ये कार्यक्रम आयोजित किया था। यहां राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्र के विकास और निर्माण के लिए जो भी सपने बाबा साहब ने देखे थे, उनके बारे में चर्चा की थी। उन्होंने कहा कि बाबा साहब का रोल अब केवल संविधान निर्माता और दलितो के मसीहा तक सिमित कर दिया गया है लेकिन सच तो ये है कि बाबा साहब एक ऐसे असाधारण नेता थे.. जिन्होंने सामाजिक लड़ाई को लड़ने के लिए दलितों में चेतना भरी थी। एक विद्वान व्यक्ति थे, शिक्षाविद थे, अर्थशास्त्री थे। एक बेहद विवेकशील व्यक्ति जिन्होंने बचपन से लेकर शिक्षा हासिल करना हो या कार्य करना हो, बिना कठिनाईयों और संघर्ष के उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ.. लेकिन फिर भी ये उनका विश्वास औऱ साहस ही था कि तमाम संघर्षों और अपनो को खोने के बाद भी उनकी हिम्मत कभी कम नहीं हुई।
भारत को सेंट्रल बैंक बाबा साहब ने दिया
हम कह देते है कि उन्होंने 31 डिग्री हासिल की थी, वो बड़े ज्ञानी थे लेकिन उस ज्ञान को पाने के पीछे उनके त्याग को हम नही देखना चाहते है.. दलितों के मसीहा होने के नाम पर उनके द्वारा किये गए ऐसे बहुत से काम है जिसे दबा कर उनकी महानता को फीका कर दिया गया। वो अर्थशास्त्री थे, उन्होंने लंदन में पीएचडी में द इवोल्यूशन ऑफ प्रोविंसियल फाइनेंस इन ब्रिटिश इंडिया में थिसिज दिये थे.. जो कि भारत के वित्त आयोग के लिए सैद्धांतिक आधार बना औऱ संविधान के अनुच्छेद 280 में शामिल भी किया गया। भारत की सेंट्रल बैंक भी बाबा साहब की संकल्पना की देन है.. जब उन्होंने 1925 में ‘‘रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस’’ के सामने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया बनाने की पेशकश रखी थी। 1934 में बाबा साहब की किताब ‘द प्रॉब्लम ऑफ द रुपी—इट्स प्रॉबलम्स एंड इट्स सोल्यूशन’ में बाबा साहब के बतायें आधारो और सुझावों पर ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया बनाया गया। उन्होंने 1942 में श्रम मंत्री रहते हुए कामन के घंटे 12 से घटाकर 8 करवाये थे। देश के विकास में कई क्रांतिकारी योगदान भी बाबा साहब ने दिये थे।
1945 में जन शिक्षा सोसायटी की स्थापना
दामोदर घाटी परियोजना, हीराकुंड परियोजना तथा सोन परियोजना की शुरुआत करने और उसका ढ़ाचा तैयार करने का क्षैय़ भी बाबा साहब को जाता है। साथ ही Central Technical Power Board, the National Power Grid System, और the Central Water, Irrigation and Navigation Commission… की स्थापना का श्रैय तो पूरी तरह से बाबा साहब को ही जाता है। खुद एक शिक्षित होने के कारण उन्हें शिक्षा का महत्व बखूबी पता था इसलिए बाबा साहब ने 1945 में जन शिक्षा सोसायटी की स्थापना की थी। प्रणव मुखर्जी ने कहा कि हम बाबा साहब का नाम लेते तो है लेकिन उन्हें फॉलो कितने करते है। उन्होंने एक ऐसे देश की कल्पना की थी जिसमें भारत का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तौर पर सकारात्मक बदलाव हो। देश जातिवाद औऱ साम्प्रादायिक सोच से मुक्त हो जाये.. और सभी स्वतंत्रता औऱ समान अवसरो का बराबरी से लाभ उठायें।
शिक्षा और विकास देश के हर कोने में पहुंचे। वो चाहते थे कि एस ऐसा समाज बने जहां भाईचारे को वैल्यू दी जाती हो, पिछड़ापन खत्म हो सकें। हालांकि बाबा साहब ये बदलाव कानूनी तौर पर लाना चाहते थे बिना किसी का खून बहायें। बाबा साहब कहते थे कि जब तक सामाजिक स्वतंत्रता, समानता औऱ बंधुत्व ना हो तब कर राजनैतिक लोकतंत्र के होने के बाद भी सामाजिक लोकतंत्र कायम नहीं होने वाला। बाबा साहब कहते थे कि हथियार उठा कर खून बहाकर कोई जंग सहीं मायने में जीती ही नही जाती। अगर बदलाव चाहिए तो शिक्षा को महत्व दीजिये। बाबा साहब चाहते थे कि एक ऐसे समाज का निर्माण हो. जिसमें उन्हें ये यकीन हो जाये कि समाज में रहना वाला हर शख्स एक समान है,. सबके अधिकार समान है। कोई किसी से साथ उसकी जाति, उसके आर्थिक स्तर को देखकर भेदभाव न किया जाये।
प्रणव मुखर्जी ने कहा कि हम बाबा साहब के सपने को साकार करने के लिए क्या कर रहे है.. जबकि उन्होंने 25 नवंबर 1950 को संसद में भी एक लंबा भाषण देकर अपने आजाद भारत के सपने का जिक्र किया था। ये बेहद दुख की बात है कि बाबा साहब के सपनो को हम सही मायने में भूल गए है.. और ऐसे समाज का हिस्सा बन गए है जिसने उन्हें अपनाया ही नहीं। अगर हम उनके सपनो को जीते तो शायद स्थिति कुछ औऱ ही होती।



