AMBEDKAR: बाबा साहब की जिंदगी में ऐसे कई मौके आये जब उन्हें अपने सबसे छोटे और चहेते बेटे राजरतन की याद आई हो और उनकी आंखो डबडबा गई.. लेकिन अपने बेटे को न बचा पाने का बोझ वो सारी जिंदगी अपने कंधो पर धोते रहे.. और जब भी मौका मिला उन्होंने तमाम बच्चों की मदद करके उस बोझ को थोड़ा कम करने की कोशिश की.. मगर क्या हुआ उस रात को.. जब बाबा साहब एक बच्चे के लिए अपनी ट्रेन के सफर को आधे में ही छोड़ कर चले गए। उस सर्द रात में बाबा साहब के उठाये एक कदम ने उनकी आत्मग्लानि को लगभग पूरी तरह से खत्म कर दिया था। जब शायद पहली बार बाबा साहब ने अपने सपने से समझौता कर लिया औऱ अपने सपने के करीब आकर भी सपमे के बजाये एक मासूम की जिंदगी को चुना.. अपने इस वीडियो में जानेंगे कैसे बाबा साहब ने दुनिया को साबित किया कि इंसानियत से बढ़ कर कभी भी जातपात धर्म अधर्म नहीं हो सकता है।
अंबेडकर की ट्रेन यात्रा का वो किस्सा
साल 1927 का समय चल रहा था, बाबा साहब ने एक साल पहले ही 1926 में अपने छोटे बेटे राजरतन को खोया था, लेकिन बेटे के जाने के ग़म को उन्होंने दलितों और पिछड़ों को आवाज बुलंद करने और उनके लिए सामाजिक न्याय की लड़ाई में भुलाने की कोशिश की। बाबा साहब उस वक्त वकालत कर रहे थे, वो गरीबों, पिछड़ों और वंचितों की आवाज बन कर लड़ रहे थे, लेकिन देश के एक बड़े वर्ग की आवाज तभी बना जा सकता था जब बाबा साहब के विचार उन तक पहुंचे। इस लिए तमाम आपदाओं में भी उन्होंने अपना प्रिटिंग प्रेस शुरू करने का फैसला किया। और तब शुरू हुई बहिष्कृत भारत पत्रिका की नींव रखने को शुरुआत। बाबा साहब के इस सपने में उनकी जीवन संघनी रमा बाई फिर से उनका सबसे मजबूत स्तंभ बन कर खड़ी हुई। एक एक पैसा जोड़ा गया। खर्चो में आधी कटौती की गई। और धीरे धीरे पैसा जमा किया गया ताकि एक प्रिंटिंग मशीन खरीदी जाए। बाबा साहब पैसा लेकर निकले लेकिन दिसंबर की सर्द रात में उन्होंने कुछ ऐसा देखा जिसने उन्हें उनके सपने और इंसानियत में से एक को चुनने पर मजबूर कर दिया।
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बाबा साहब को एक केस के सिलसिले में नासिक के एक छोटे से गांव में जाना था। उन्होंने तय किया कि वो नासिक से आते वक्त प्रिंटिंग मशीन भी खरीदते आयेंगे। वो पैसों का बैग लेकर ट्रेन में बैठ गए। पहली उनकी जाति और दूसरा आर्थिक रूप से बदहाल होने के कारण बाबा साहिब ट्रेन के थर्ड क्लास डिब्बे में सफ़र कर रहे थे। दिसंबर का महीना था, और हड्डियों को गला देने वाली सर्दी थी। रात के अंधेरे में ट्रेन किसी छोटे से स्टेशन पर रुकी, पता चला कि इंजन में कुछ खराबी है इसलिए कुछ घंटे लग सकते है। बाबा साहब ने सोचा कि स्टेशन पर उतर कर आसपास का मुआना किया जाए, और कंधे पर छोटा सा बैग टांगकर वो स्टेशन पर उतर गए। लेकिन उनका ये कदम न केवल किसी की जिंदगी बचाने वाला था बल्कि अपने बेटे की मौत के आत्मग्लानि से भी निकलने वाला था। रात के अंधेरे में उन्हें सड़क किनारे कचड़ो के ढेर पर एक इंसानी छवि दिखी। पहले उन्हें विश्वास नहीं हुआ। लगा कि शायद वो उनका भ्रम है, मगर धीरे कदमों से वो उस आकृति के पास पहुंचे और माचिस जला कर देखा तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गई। वहां करीब 8 साल का बच्चों बहस बुरी स्थिति में बेहोश पड़ा। शरीर पर चोट के निशान, फटे हुए कपड़ों, ठंड से काले पड़ चुके हाथ, और निष्प्राण शिथिल हो चुका शरीर।
बाबा साहब ने अपने कपड़ों की परवाह किए बिन बच्चे को गोद में उठा लिया और भागते हुए स्टेशन की तरफ आए। बच्चे का शरीर बुखार से तप रहा था। बाबा साहब ने स्टेशन मास्टर की तरफ देखते हुए पूछा कि क्या पास में कोई दवाखाना है.. मास्टर ने नाक सिकोड़ते हुए कहा.. अरे बाबूजी.. ये बच्चा पास की गंदी अछूतो की बस्ती का है। लावारिस है.. और कोई लाइलाज बीमारी हो गई है। इसलिए गांव वालो ने उसे गांव से बाहर फेंक दिया। बाबा साहब ये सुनकर गुस्से में भड़ग गए.. उन्होंने कहा कि यहां एक बच्चे की जान पर बन आई है औऱ तुम्हे छुआछूत की पड़ी है। मुझे मेरे सवालों का जवाब दो.. वैद या डॉक्टर का पता बताओ। स्टेशन मास्टर घबरा गया और उसने पता बताया। लेकिन जैसे ही बाबा साहब वैद्य के घर पहुंचे.. लेकिन वैद्य ने उस बच्चे का इलाज कराने से साफ इंकार कर दिया। वैद्य ने कहा कि इस बच्चे को जो बिमारी है ।
उसके इलाज के लिए शहर से दवाईया मंगानी पड़ेगी.. जिसमें खर्चा लगेगा.. एक अनाथ के लिए क्या आप पैसे खर्च करेंगे.. बाबा साहब कुछ देर के लिए शांत हो गए.. उन्होंने बच्चे की तरफ देखा.. जिसमें उन्हें अपना बेटा राजरत्न नजर आ रहा था। जिसका इलाज के अभाव में निधन हो गया.. वो अब अपनी आंखो से सामने इलाज के बिना किसी बच्चे को मरने नहीं दे सकते थे.. उन्होंने तुरंत प्रिटिंग मशीन के लिए जमा किये गए पैसों को निकाला.. और वैद्य की तरफ बढ़ाते हुए कहा.. आप इसमें से जितना पैसा चाहे ले लो और तुरंत इलाज शुरु करो..वैद्य ने बिना समय गंवाये इलाज शुरु किया। बाबा साहब रातभर बच्चे के बगल में में बैठे रहे.. वो बच्चे को ठंडे पानी की पट्टियां करते रहे। यहां भारत का एक ढृढ़ निश्चयी अंदोलनकारी डॉ भीम राव अंबेडकर नही थे.. यहां केवल एक पिता थे.. जो किसी भी हाल में बच्चे की उखड़ती सांसो को फिर से जोड़ना चाहते थे।
सुबह तक बच्चा नॉर्मल हो गया.. और धीरे धीरे आंखे खोली.. सामने थे बाबा साहब, जिनहे देखकर बच्चे ने केवल इतना कहा कि क्या आप भगवान है। जो मेरी रक्षा करने के लिए आये है। बाबा साहब ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि वो भगवान नहीं है बल्कि एक इंसान है जो चाहते है कि भारत के किसी भी बच्चे को वो दर्द न सहना पड़े जो उन्होंने सहा है। बच्ची ठीक हो गया था। इंसानियत जीत गई थी, लेकिन सपना हार गया था.. लेकिन बाबा साहब के चेहरे पर एक सूकून था। उनकी बैचेनी खत्म हो गई थी.. वैद्य ने जब बाबा साहब ने उनका नाम पूछा तो उन्होंने कहा कि बच्चा खुद को जब काबिल बना लें.. कि वो समाज में नजरें मिला कर बात कर सकते तो वहीं उनका सबसे बड़ा नाम होगा। समय बीतता गया, बच्चा बड़ा हो गया और एक स्कूल में टीचर बन गया..जब भारत आजाद हुआ और देश का गणतंत्र लागू हुआ… तो बाबा साहब की छपी तस्वीर को देखकर वो पहचान गया। उनसे बाबाब साहब के सपने को जीने का फैसला किया औऱ दलितों और वंचित वर्ग के लिए काम करना शुरु कर दिया. वो मुफ्त में उन्हें शिक्षित करता था.. उस बच्चो को जिंदगी बाबा साहब ने दी थी और उस बच्चे ने वो जिंदगी बाबा साहब के ही नाम कर दी थी। बाबा साहब ने एक बच्चे को जीवन दान दिया था और उस बच्चे ने अपना पूरा जीवन बाबा साहब के नाम कर दिया।



