बेटे की बलि चढ़ी तो उठाई कलम! जानिए Ambedkar और उनके पिता के अनोखे इंतकाम की कहानी

Ambedkar educational transformation
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Ambedkar: महाराष्ट्र का एक छोटा सा गांव.. जहां दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में आधी रात को अपने पांच साल के छोटे से बच्चे को लेकर अंधेरे में भागता एक महार जाति का युवक.. जिसकी रेस अपने बच्चे की उखड़ती सांसो के टूटने से पहले उसे बचाने की थी.. महार जाति.. का नाम सुनते ही सबसे पहले आपके जेहन में बाबा साहब अंबेडकर की ही छवि आती है.. लेकिन यहां अपने बच्चे को बचाने की जंग बाबा साहब नहीं बल्कि नासिक के एक छोटे से कस्बे में महार बस्ती में रहना वाला रधुनाथ था। रघुनाथ का 5 साल का बच्चा बुखार से तड़प रहा था.. वो तो बेचारा समय पर वैद्य के पास भी पहुंचा.. लेकिन उसकी जाति यहां उसके बच्चे के लिए काल बन गई.. वो गिड़हगिड़ाता रहा, रोता रहा.. लाख मिन्नते करता रहा, लेकिन सवर्ण जाति के उस वैद्य का कलेजा मासूम का चेहरा देखकर भी नही पसीजा.. वैद्य ने सीधा कहा कि वो राज में अछूतो का इलाज नहीं करते.. उनका धर्म भ्रष्ट हो जायेगा..  और कुछ देर में सब कुछ शांत हो गया.. रघुनाथ के संसार का चिराग बुझ गया था.. लेकिन प्राणहीन हो गया.. लेकिन बाबा साहब से एक मुलाकात ने न केवल रघुनाथ का जीवन बदला बल्कि उसे अपने बेटे की मौत के लिए जिम्मेदार इस जातिवादी कुप्रथा से लड़ने की हिम्मत भी दी। जानेंगे कि कैसे रघुनाथ ने लिया अपने बेटे की मौत का बदला।

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अछूत पिता का अनोखा बदला

बेटे की मौत ने रघुनाथ को शून्य कर दिया था.. वो संसार से बिल्कुल विरक्त होकर हर वक्त शमशान में वहां ही बैठा रहता जहां उसके बच्चे को दफनाया गया था। जैसा कि हिंदू धर्म में परंपरा है, बच्चे की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार करने के बजाय उसे दफनाया जाता है.. ये परंपरा हिंदू महार होने के कारण रघुनाथ ने भी मानी.. लोग रघुनाथ को तरह तरह की बातें कहते.. उसे मनहूस, भाग्यहीन कहते.. पापी कहते, लेकिन रघुनाथ को तो जैसे किसी से कोई लगाव नही थी.. समय गुजरता गया..और इसी बीच साल 1934 में बाबा साहब अंबेडकर एक सभा करने के लिए नासिक पहुंचे थे.. वो दलित उत्थान और उन्हें सम्मान और समानता दिलाने की लड़ाई के लिए उन्हें एकजुट कर रहे थे.. इस दौरान एक शाम रघुनाथ के गांव के कुछ दलितों ने बाबा साहब से रघुनाथ की व्यथा सुनाई.. बाबा साहब ये सुनकर बहुत विचलित हो उठे और उन्होंने तुरंत रघुनाथ से मिलने की इच्छा व्यक्त की।

हम सभी जानते है कि बाबा साहब ने भी गरीबी और लाचारी के कारण अपने कई बच्चों को खो दिया था। उन पर अपने बच्चो के साथ लापरवाही करने का भी इल्जाम लगता रहा है.. लेकिन बच्चे के चले जाने के गम का बोझ वो आजीवन ढोते रहे थे..रघुनाथ पर क्या बीत रही होगी.. इसका अहसास बाबा साहब को भी था। बाबा साहब तेज कदमो से उससे मिलने पहुंचे.. रघुनाथ की टूटी फूटी झोपड़ी, जिसमें रघुनाथ फटे पुराने मैले कुचैले कपड़े पहने खामोश बैठा था। बाबा साहब धीरे धीरे उसके पास पहुंचे और उसी धूलभरी जमीन पर उसके बगल में बैठ गए। उन्होंने अपना हाथ रघुनाथ के कंधे पर रखा, जो मानों ऐसा लगा कि रघुनाथ में कोई चेतना लौट आई। उसने पत्थराई आंखो से बाबा साहब को कहा..मैं पापी हूं.. मेरा बेटा चला गया.. सब कुछ खत्म हो गया। बाबा साहब रघुनाथ को देखकर अपना दर्द छिपा नहीं सकें और उनकी आंखे डबडबा गई। बाबा साहब ने तुरंत खुद को संभाला.. रघुनाथ के दोनो हाथों को पकड़ा और आंखो में एक आग लेकर बोले, रघुनाथ तुम्हारे बेटा का हत्यारा तुम नहीं हो.. कोई बीमारी नहीं हल्कि समाज की वो मानसिकता है, जो जातिपात के भेदभाव जैसी मानसिक बीमारी से ग्रसित है।

वो समाज है जिसके लिए किसी की जान से ज्यादा उसका धर्म मायने रखता है.. बाबा साहब की बातें सुनकर रघुनाथ महीनो बाद चेतना में लौटा था.. वो फूट फूट कर रो पड़ा.. बाबा साहब की बात तपती दोपहरी में शीतल छाया का काम कर रही थी.. उसे पहली बार लगा कि उसके बच्चे की मौत का जिम्मेदार वो नहीं बल्कि बीमार जातिवाद सोच है। बाबा साहब ने तब रघुनाथ को कहा.. तुम अगर रोते रहे तो तुम्हारे बेटे के हत्यारे जीत जायेंगे.. अब तुम्हारे उठने का समय आ गया है.. उठो और सामना करो उस कुरीति का जो तुम्हारे बच्चे को लील गई.. रघुनाथ ने बाबा साहब ने पूछा कि जब बाबा साहब जैसे पढ़े लिखे महापुरूष इस जातिवादी समाज के खिलाफ जीत नहीं पाये तो वो गरीब सफाई कर्मचारी क्या कर सकता है। बाबा साहब ने कहा.. तुम्हें किसी व्यवस्था से लड़ने के लिए हथियार की जरूरत नहीं है। तुम रोज गांव के हर घर से एक मुट्ठी अनाज और एक पैसा इकट्ठा करों..और जब इतना प्रयाप्त हो जाये तो तुम मेरे पास आओ.. मैं और तुम मिलकर गांव में एक ऐसा दवाखाना खोलेंगे, जहां दिन रात नहीं देखा जायेगा.. जाति जाति के नाम पर भेदभाव नहीं किया जायेगा।

जहां सबको समान सम्मान और इलाज मिलेगा। रघुनाथ की जिंदगी का मकसद पूरी तरह से बदल गया था.. वो अपने बेटे की मौत को यूहीं जाया नहीं जाने देखा..वो एक ऐसे समाज को बनायेगा जहां भेदबाव के कारण किसी मां की गोद कभी नहीं उजड़ेगी। वो बिना थके, बिना हारे गांव गांव एक मुट्टी अनाज और एक पैसा मांगने लगा.. से सिलसिला 5 सालो तक चला..और पांच साल के बाद उनकी मेहनत रंग लाई.. उसने बाबा साहब को चिट्ठी भेजी.. और तुरंत गांव के बीचों बीच एक क्लिनिक खोली गई.. जहां डॉक्टर भी पिछड़ी जाति का था। लेकिन ये दवाखाना सार्वजनिक था जिसे रघुनाथ ने अपने बेटे गोविंद के नाम पर खोला था.. इंसान को इंसान मानकर सबका इलाज करने वाले दवाखाने में सवर्ण भी जाने लगे.. ये रघुनाथ के उस संघर्ष की जीत थी.. जो जाति के भेदभाव को मिटाने के लिए किया गया था। लेकिन रघुनाथ की असली जीत तो तब हुई जब उसके बेटे की मौत के लिए जिम्मेदार वैध खुद गोविंद दवाखाने में इलाज कराने पहुंचा। लोग उससे घृणा करते थे, उसे भगाना चाहते थे लेकिन रघुनाथ ने सबको शांत किया औऱ कहा कि वैध जी आप अंदर जाइये.. हमारी बस्ती का, और इस दवाखाने का दरवाजे का दरवाजा सबके लिए 24 घंटे खुला है। वैध शर्म से झुक गया। बाबा साहब ने रघुनाथ को वो चेतना दी जो अक्सर लोग भाग्य को कोसने और रोने पर खो देते है। बाबा साहब ने बताया कि आपदा में अवसर कैसे खोजा जाता है। आपको ये वीडियो कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

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