Buddha Mahaparinirvana: बिहार का बोधगया शाक्य मुनि गौतम बुद्ध के लिए और उनके हर एक अनुयायी के लिए बेहद पवित्र और अहम स्थान है। बुद्ध के जीवन से जुड़े आठ मुख्य तीर्थ स्थल में से एक है बोधगया। बौद्ध गया में बुद्ध काले ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, लेकिन उससे ज्यादा प्रचलित हुआ है यहां मौजूद 100 फिट की लेटी हुई अवस्था में बुद्ध प्रतिमा। ये प्रतिमा बुद्ध के महापरिनिर्वाण की अवस्था को दर्शाती है। बुद्ध ने 29 साल की उम्र में घर छोड़ा था, 36 साल की उम्र में उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और वो 80 साल की उम्र तक बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करते रहे थे, जिसके बाद उनकी जहर के कारण महापरीनिर्वाण हो गया था। लेकिन बुद्ध को जहर दिया गया असल में देने वाले को भी नहीं पता था कि बुद्ध ने उनकी आस्था और दिल को रखने के लिए जहरीला खाना खा लिया है, वो चुपचाप खाते गए और फिर सीधा अपने मठ की तरफ चले गए। उन्होंने कभी भी किसी को दोष नहीं दिया था, लेकिन बुद्ध ने ऐसा क्यों किया था, सबकुछ जानते हुए भी बुद्ध ने वो खाना क्यों खाया था। क्या क्या हुआ था बुद्ध के महापरिनिर्वाण से 24 घंटे पहले।
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महापरिनिर्वाण से पहले क्या हुआ था?
483 ईसा पूर्व की बात है, बुद्ध 80 साल के हो चुके थे। करीब तीन महीने पहले ही बुद्ध ने अपने शिष्यों ने अपने महापरिनिर्वाण की बात की थी, उस दिन वैशाख पूर्णिमा थी और बुद्ध का 80वाँ जन्मदिवस भी। वो अपने शिष्यों के साथ उत्तर प्रदेश के कुशीनारा से कुछ किलोमीटर दूर पावा में भ्रमण कर रहे थे। पावा में ही उनका एक परम भक्त था चुंद, जो कि लोहार जाति से था। बुद्ध के आगमन की खबर से वहां बड़े बड़े अमीर लोगों ने बुद्ध को अपने यहां आमंत्रित करने के लिए लाइन लगा रखी थी, लेकिन उन्हीं के बीच लुहार चुंद भी हाथ जोड़े खड़ा था। बुद्ध ने उन्हें देखा और मुस्कुराते हुए उसका आमंत्रण स्वीकार कर लिया। सभी हैरान थे कि बुद्ध ने 56 भोज छोड़कर एक गरीब लुहार के घर का आमंत्रण स्वीकार कर लिया। बुद्ध अपने शिष्यों के साथ लुहार के घर पहुंचे, जहां लुहार और उसकी पत्नी ने पूरी आस्था के साथ उनका स्वागत किया।
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बुद्ध ने लुहार और उसकी पत्नी को आशीर्वाद दिया
बुद्ध खाने बैठे तो उन्हें खाने में ‘सूकरमदव’ नाम का एक मशरूम परोसा गया, जो कि असल में जहरीला था। लेकिन इस बात की जानकारी खुद लुहार और उसकी पत्नी को भी नहीं थी। दरअसल हुआ यूं था कि सूकरमदवकि दो प्रजाति होती थी, जिसमें एक खाने योग्य होती थी और दूसरी लेकिन केवल देख के इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं था, केवल खा कर ही पता चल सकता था। बुद्ध ने दोनों की आस्था देखी और बिना सोचे उसे खाना शुरू के दिया लेकिन पहले ही निवाले से उन्हें पता चल गया कि वो जहरीला है, उन्होंने चुंद से कहा कि उन्हें सब्जी बहुत पसंद आई और सारी सब्जी उन्हें दी जाए। उनके शिष्यों को बुद्ध का ये व्यवहार कुछ अटपटा लगा लेकिन वो खामोश रहे। उन्होंने चुंद से कहा कि ये बाकी बची सब्जी को जमीन में गाड़ देना , क्योंकि कोई उसे पचा नहीं सकता है। मगर खाना खाने के तुरंत बाद बुद्ध ने लुहार और उसकी पत्नी को आशीर्वाद दिया और तेजी से वो कुशीनगर की तरफ चल पड़े।
बुद्ध को गंभीर अतिसार और तेज पेट दर्द
दरअसल जहरीला मशरूम खाने के कारण बुद्ध को गंभीर अतिसार (dysentery) और तेज पेट दर्द, और खूनी पेचिश शुरू हो गई। उनके साथ उनके परम शिष्य आनंद भी थे, बुद्ध ने पहली बार उन्हें बताया कि जो भोजन उन्होंने किया वो जहरीला था, लेकिन इसमें चुन्द का कोई दोष नहीं है, वो खुद अनजान था। बुद्ध ने कहा कि अब तक पूरे जीवन में उन्हें दो भोजन सबसे ज्यादा पसंद आए । पहली सुजाता की खीर जिसे खाने के बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और दूसरा चुंद का दिया भोजन, जिसे खा कर वो महापरिनिर्वाण पाने वाले है। करीब 20 किलोमीटर की यात्रा उन्होंने पैदल तय की थी, और रात को कुशीनगर पहुँचे और हिरण्यवती नदी के तट पर वे शाल वृक्षों के नीचे ही उत्तर दिशा में सिर करके लेटकर आराम करने लगे। जिसे बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण मुद्रा कही जाती है, लेकिन उनकी स्थिति बिगड़ती गई, उसे रात बुद्ध ने लेटी हुई अवस्था में अपने शिष्यों को अंतिम बार प्रवचन दिया था।
वहीं उनका अंतिम शिष्य सुभद्द नाम के एक संन्यासी बुद्ध के दर्शन करने आया जहां बुद्ध ने उसका मार्गदर्शन किया और उन्हें अपना अंतिम शिष्य बनाया। वहीं बुद्ध ने अपने अंतिम ज्ञान में अपने शिष्यों को बताया कि उनके न रहने पर जो ज्ञान और नियम उन्होंने बताए है उसे ही धर्म मन कर अनुशरण करें। बुद्ध ने अप्पो दीपों भव का गया दिया। यानी कि अपने दीपक खुद बनो। सांसारिक चीज़ों का सुख छोड़ कर अपने मुक्ति का मार्ग आपको खुद प्रशस्त करना है। बुद्ध ने उसी रात के अंतिम पहर में सूर्योदय से पहले अपने शरीर को त्याग दिया, और महापरिनिर्वाण को प्राप्त किया। बुद्ध की लेटी हुई प्रतिमा उनके महापरिनिर्वाण को दर्शाती है। इस तरह बुद्ध ने शारीर छोड़ने से पहले भी मानवता का भला करने के लिए शिष्यों का मार्ग दर्शन किया था।



