3 दशक का संघर्ष, एक बड़ी जीत… कौन हैं Dr. K. Krishnasamy, जिन्होंने बदली दलित राजनीति की तस्वीर?

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Dr. K. Krishnasamy: बाबा साहब ने कहा था जब राजनैतिक ताकत किसी पढ़े लिखे दलित के हाथों में होगी तो जो बदलाव होगा उसे इतिहास याद रखेगा। तमिलनाडु की राजनीति को एक ऐसा ही धुरंधर मिला जब डॉ. के. कृष्णसामी ने पहली बार राजनीति में कदम रखा था। साल 1991 का समय था, तमिलनाडु की अनुसूचित जाति की लिस्ट में आने वाली 7 अलग-अलग उप-जातियों जिसमें पल्लर, कुडुम्बन, कदैयन, पन्नाडी, कालाडी, वधिरियन और देवेंद्रकुलथार को अलग अलग बांटने के बजाय एक साझा जाति और सम्माननीय नाम देवेंद्रकुला वेल्लार दिया जाए इसका संघर्ष शुरू हुआ।

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कौन है डॉ के कृष्णशामी?

अनगिनत भूख हड़ताल हुए, कई  लोगो ने अपनी जान की बाजी लगाई लेकिन फिर भी 3 दशकों तक संघर्ष जारी रहा। लगातार कोशिशें की गई कि ये संघर्ष बंद हो जाए, लेकिन जब तक साल 2021 में केंद्र और राज्य सरकार ने संसद में कानून पारित कर इन सभी उप-जातियों को आधिकारिक रूप से ‘देवेंद्रकुला वेल्लार’ नाम नहीं दे दिया तब तक  डॉ. के. कृष्णसामी ने हार भी मानी, इतनी लंबी लड़ाई जीतने के बाद भी वो शांत नहीं हुए बल्कि पूरे आत्मविश्वास के साथ अब वेल्लार समुदाय को अनुसूचित जाति से हटा कर ओबीसी कैटिगरी में लाने की लड़ाई शुरू कर दी है। अपने इस लेख में हम राजनीति के पहले शिक्षित दलित पॉलिटिशियन , सामाजिक कार्यकर्ता और पेशे से डॉ के कृष्णशामी के बारे में बात करेंगे।

दलितों और पिछड़ों के लिए मसीहा

3 अप्रैल 1952 को तमिल नाडु के तिरुपुर (तत्कालीन कोयंबटूर) जिले के उडुमलाईपेट्टई के पास मसागौंडेनपुदूर गांव में एक वेल्लार समुदाय में जन्मे डॉ के कृष्णसामी के तमिलनाडु की राजनीति में दलितों और पिछड़ों के लिए किसी मसीहा से कम नहीं है। जिन्होंने न केवल दलितों के हक की आवाज उठाई बल्कि राजनीति में भी उनके टक्कर का कोई नहीं हुआ। उनके पिता का नाम करुप्पुसामी और मां का नाम थामराई अम्मल है। के कृष्णसामी के पिता किसान परिवार से थे और खेती करके की अपना परिवार का भरण पोषण करते थे। के कृष्णसामी का बचपन बेहद अनुशासित और ग्रामीण परिवेश ने गुजरा था। एक अनुसूचित जाति से होने के कारण उन्होंने ऊंची जाति के बीच अपनी सामाजिक पहचान के लिए संघर्ष को बेहद करीब से देखा था।

कॉलेज के दिनों में राजनीति की तरफ किया रुख

जिसने उनके अंदर अपने समाज के लोगों के साथ साथ अपने आसपास के लोगों को भी सामाजिक न्याय और सम्मान दिलाने का जज्बा जगा। उन्होंने गांव के पास सरकारी हाई स्कूल, पूलावडी से ही अपनी हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की। बाबा साहब की तरह वो भी मानते थे कि अगर अपने समाज के लिए सही न्याय चाहिए तो न्याय की पेचीदगी समझना जरूरी है, और उसके लिए शिक्षित होना। उन्होंने हाई स्कूल पास करके कोयंबटूर कृषि विश्वविद्यालय में कृषि से जुड़ी शिक्षा के लिए एडमिशन लिया लेकिन उनकी प्रतिभा को देख कर उनके प्रोफेसर ने उन्हें मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेने की सलाह दी, जिसके बाद उन्होंने नीट की परीक्षा दी और तिरुनेलवेली मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। सीमित संसाधनों के बीच भी अपनी कड़ी मेहनत और कुछ कर दिखाने के जज्बे ने कृष्णसामी के  दिनों में ही राजनीति की तरफ मोड़ दिया।

सामाजिक भेदभाव और जातीय उत्पीड़न को बेहद करीब से देखा

अपनी MBBS, MD की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने तमिल नाडु के दक्षिणी जिलों कोयंबटूर और तिरुनेलवेली क्षेत्र में सेवा देना शुरू कर दिया। उन्होंने वहां के ग्रामीण इलाकों में दलितों और देवेंद्रकुला वेल्लार समुदाय के लोगों के साथ गंभीर सामाजिक भेदभाव और जातीय उत्पीड़न को बेहद करीब से देखा जिसके बाद उन्होंने उस भेदभाव के खिलाफ लड़ने का फैसला किया। उन्होंने सामाजिक सुधारो के लिए काम करना शुरू कर दिया.. लेकिन 1995 में जब थूथुकुडी (Tuticorin) जिले के कोदियंकुलम गांव में दलितो और पिछड़ो पर ऊंची जाति वाले थेवल समुदाय और पुलिस वालो ने मिलकर जो बर्बरता की, उस जातीय हिंसा ने डॉ के कृष्णासामी की जिंदगी में बड़ा बदलाव लाया। उन्होंने अपनी डॉक्टरी का पेशा छोड़ कर खुद को पूरी तरह से दलितों और वंचितो के लिए न्याय के लिए झोंक दिया।

शोषित वर्गों को दिलाया सामाजिक न्याय

उनके भाषणों का प्रभाव ऐसा था कि कुछ ही समय में उन्होंने देवेंद्रकुला वेल्लार समुदाय के लोगो को एकजुट करने में सफलता हासिल कर ली थी। इस आंदोलन ने उन्हें सामाजिक रूप से दलितो की आवाज उठाने वाला एक नेता बना दिया था.. उनकी इस सफलता ने उनके लिए राजनीति के रास्ते खोल दिये थे। साल 1996 में उन्होंने राजनीति में कदम रखते हुए देवेंद्रकुला वेल्लार समुदाय और अन्य शोषित वर्गों के लिए सामाजिक न्याय का मुद्दा उठाते हुए ओट्टापिडारम विधानसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लडड़ने का फैसला किया, जहां उस दौर में द्रविड़ पार्टियों जिसमें DMK और AIADMK का भारी दबदबा पूरे तमिलनाडु में था, वहीं उनकी लहर के बीच भी डॉ के कृष्णसामी का जलवा ऐसा था कि वे निर्दलीय ही विजयी हुए।

17 मजदूरों के बाद चाय बागन में किया आंदोलन

विधानसभा में अक्सर दलितों और पिछड़ो के साथ होने वाले भेदभाव औऱ उत्पीड़न का मुद्दा उठाने वाले कृष्णासामी ने खुद को मजबूती से राजनीति में स्थापित करने के लिए 15 दिसंबर 1997 को घोषणा की थी कि वो अपनी नीजि पार्टी बनाने जा रहे है। वहीं 1999 में ही हुए तिरुनेलवेली के मांजोलाई में चाय बागानों में वेल्लार समुदाय के मजदूरो के लिए अधिकारों औऱ सैलरी को बढ़ाने के लिए उठनी वाली आवाज और आवाज को दबाने के लिए पुलिस की लाठी के बाद 17 मजदूरों का थामिराबरानी नदी में कूदने से हुई मौत के बाद मांजोलाई चाय बागान आंदोलन काफी व्यपक हो गया था, जिसके केंद्र में थे डॉ के कृष्णसामी। जिसके बाद भारी समर्थन से उन्होंने 1999 में पुथिया तमिलगम (Puthiya Tamilagam) पार्टी की स्थापना की थी।

वो 2001 तक एमएलए रहे थे जिसके बाद वो दुबारा 2011 से 2016 तक एमएलए रहे। फिलहाल वो पार्टी अध्यक्ष के तौर पर काम कर रहे है, लेकिन उनका फोकस ऐसा है कि वो फालतू की राजनैतिक चर्चाओं में पड़ने के बजाये अपने समुदाय को अब एससी वर्ग से हटा कर ओबीसी में लाने के लिए संघर्ष कर रहे है, उनका कहना है कि उनका समुदाय कभी अछूत तो था ही नहीं, वो तो जमींदारों औऱ पूंजीपति हुआ करते थे, फिर वो एससी कैसे हो सकते है। अछूत का कलंक लगा कर उनके समाज की तरक्की को जानबूझ कर रोका गया है। के कृष्णासामी अब भी अपने समाज के लिए संघर्ष कर रहे है। सदियों में बेहद कम ऐसे नेता होते है तो अपना पूरा जीवन वंचितों और बहुजनो के हित में लगा दें।

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