Babasaheb के वायलिन बजाने के पीछे का वो दर्दनाक सच, जो कोई नहीं जानता

Babasaheb Playing Violin, Dr BR Ambedkar
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Babasaheb ने केवल अपनी जिंदगी में संघर्ष ही नहीं देखा था, बल्कि उन्होंने अकेलापन भी काफी झेला था। भले ही किताबों से उनकी यारी बेहद गहरी थी, लेकिन कई तरह की बिमारियो से ग्रसित होने के बाद उन्हें पहली बार अपनी पत्नी रमाबाई के न होने की कमी खली थी। एक जीवनसाथी जिन्हें उन्होंने काफी कम उम्र में खो दिया था, पत्नी के जाने का गम भुलाने के लिए उन्होंने खुद को दलित उत्थान के लिए झोंक दिया.. 1935 में रमाबाई के निधन के बाद वो करीब 13 सालो तक अकेले ही रहे थे।

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बाबा साहेब के वायलिन बजाने का सच

लेकिन इस अकेलेपन को भरने में अहम भूमिका निभाई 1948 में उनकी संगिनी बनी सविता अंबेडकर ने.. मगर वो भी बाबा साहब के उस खालीपन को नहीं भर सकी, जो उनके सबसे प्रिय और छोटे बेटे के जाने से हुई थी..मगर हमेशा अपने दर्द को दिल में दबा कर सबकुछ शांति से बर्दाश्त करने वाले बाबा साहब दिल्ली के अलीपुर रोड पर स्थित अपने घर में एक गहरी वेदना में डूब गए थे.. उस वेदना को अपने शब्दों के जरिये नहीं बल्कि संगीत के जरिये कहने की कोशिश कर रहे थे.. अपने इस वीडियो में हम जानेंगे उस रात की कहानी जब बाबा साहब के हाथों में वायलिन था और आँखो में दर्द का सैलाब..

ये वक्त 1950 के दशक का.. बाबा साहब अंबेडकर ने राजनीति छोड़ दी थी, औऱ वो अपना ज्यादातर समय बौद्ध धर्म के बारे में जानकारी इक्टटठा करने में औऱ अपनी किताब बुद्धा एक हिज धम्मा लिखने में व्यस्त रहते थे। उनके घरेलू सहायक को भी पता था कि बाबा साहब अक्सर देर रात कर किताबों में डूबे रहते थे…लेकिन ये बहुत कम लोगो को पता है कि बाबा साहब को वायलिन बजाना काफी पसंद था, और उन्होंने बतौर उसकी शिक्षा ली थी। किताबों से फुरसत होती तो वो वायलिन बजाते थे।

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बाबा साहेब को संतानो को खोने का दर्द

संगीत उन्हें सूकून देता था.. ऐसे ही एक रात उनके सहायक को बाबा साहब के कमरे से वायलिन बजाने की आवाज आई, लेकिन आज इस आवाज में सूकून नहीं बल्कि केवल दर्द और पीड़ा थी। जैसे बाबा साहब कोई बहुत पीड़ादायक सिचुएशन से गुजर रहे हो। बाबा साहब के इकलौते जीवित बेटा यशवंत राव अंबेडकर बाबा साहब से नाराज रहते थे क्योंकि वो मानते थे कि बाबा साहब ने समाज के भले के लिए उनकी मां और भाई बहनो को नजरअंदाज किया जिसके कारण उनके मां को गरीबी के कारण अपनी संतानो को खोने का दर्द झेलना पडा था।

अगर बाबा साहब समाज के बारे में सोचने के बजाय परिवार पर ध्यान देते तो शायद ईलाज के अभाव में उनके परिवार में किसी की मृत्यु नहीं होती.. बाबा साहब का वायलिन सुनकर उनका सहायक उनके पास पहुंचा। उसने देखा कि बाबा साहब एक गहरी वेदना में थे। उनकी बंद आंखो से भी आंसू निकल रहे थे औऱ वायलिन की आवाज भी शोक संलिप्त थी। बाबा साहब के सहायक ने उन्हें रोका और पूछा… क्या हुआ बाबा साहब.. आज आपका संगीत काफी उदासी भरा है.. बाबा साहब ने आंखो खोली और आंसुओ से भरे आंखो से कहा.. पता नहीं क्यों आज राजरतन की बहुत याद आ रही है।

बाबा साहब सभी बच्चों में सबसे लाडले

राजरतन, बाबा साहब के सबसे छोटे बेटे, जिनता जन्म 1924 में हुआ था, बाबा साहब के सभी बच्चों में सबसे लाडले थे। लेकिन जब वो 2.5 साल के हुए तो डबल निमोमिया के कारण बुरी तरह से बीमार हो गए.. बाबा साहब वकालत किया करते थे.. लेकिन वो अक्सर बेहद कम पैसे लिया करते थे या मुफ्त में ही मुकदमे लड़ा करते थे, जिससे उनके घर में आर्थिक तंगी हमेशा बनी रही.. राजरतन के बिमार होने के बाद देशी इलाज हुआ, अच्छे अस्पताल में दिखाने के लिए पैसे नहीं थे। देशी इलाज के बाद भी लाभ नहीं हुआ और 1926 में ढाई साल की उम्र में उनकी मौत हो गई।

माता रमाबाई बुरी तरह से टूट गई.. लेकिन परिक्षा तो अभी शुरु ही हई थी.. राजरतन के अंतिम संस्कार की तैयारी हुई, लेकिन तब पता चला कि घर में इतने भी पैसे नहीं है कि बच्चे को लपेटने के लिए कफन तक खरीदा जा सकें.. इस वेदना से किसी का भी दिल छलनी हो जाये.. लेकिन बाबा साहब के चेहरे पर एक अजीब की खामोशी थी.. रिश्तेदारों औऱ दोस्तो ने मदद की भी कोशिश की, लेकिन बाबा साहब का स्वाभिमान आड़े आ गया .. और आखिर अंत में माता रमाबाई की एक पुरानी साड़ी में ढाई साल के लाडले राजरतन के शव को लपेटा औऱ उसका अंतिम संस्कार पूरा किया गया।

बाबा साहब जब भी हाथों में वायलन लेकर बजाते तो उन्हें अहसास होता कि वो रमाबाई औऱ अपने मृत बच्चों से बात कर रहे है। बाबा साहब संगीत के जरिये अपने परिवार से जुड़ते थे। आज एक पिता था जो वायलिन बजा रहा था.. हम सभी जानते है कि बाबा साहब ने भारत के वंचितो, दलितो, पिछड़ो अछूतो को समानता औऱ सम्मान दिलाने के लिए जो संघर्ष किया वो सबके लिए आसान नहीं था, लेकिन कहते है न कि समाज के लिए रोशनी बनने वाले को पहले खुद को जलाना ही होगा।

अपने व्यक्तिगत मसलो को, दुखों को नजरअंदाज करके उस मुद्दो पर ध्यान देना आवश्यक होता है जिससे भविष्य में बड़ा बदलाव आ सकता था और बस फिर क्या था बाबा साहब ने सबकुछ खोने के बाद भी वो हासिल किया था, जिसके लिए बचपन से उन्होंने संघर्ष किया था। उन्होंने दलितो और पिछड़ो को बराबरी का हक देने वाला संविधान बनाया था। जो समाज में उन्हें सम्मान और समता देने वाला था। बाबा साहब के त्याग को, तकलीफ को केवल उनके परिवार ने देखा था, लेकिन उनकी सफलता पूरी दुनिया ने देखी.. यहीं बात बाबा साहब को सबसे महान और हटकर बनाती है।

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