Top 5 Dalit news: जब कोई किसी एक वर्ग के लिए खड़ा होता है तो उसे गिराने की कोशिश करने वालों की कमी नहीं होती.. लेकिन हैरानी की बात तो ये है कि जिस लड़ाई को आसानी से जीता जा सकता है उसे उसके अपने ही लोग रास्ते में खड़े होकर कठिन बना देते है। तो चलिए आपको इस लेख में पिछले 24 घंटे में दलितो के साथ होने वाली घटनाओ के बारे में बतायेंगे जो इस वक्त सुर्खियों में है, जिसमे उस सच्चाई को उजागर किया है कि कैसे अपने ही समाज के लोग आपके सबसे बड़े दुश्मन बन जाते है।
बसपा सुप्रीमो ने काफी लंबे समय के बाद लगाई हुंकार
1, दलितों से जुड़ा पहला मामला उत्तर प्रदेश से है, जहां काफी लंबे समय के बाद बहुजन समाज पार्टी की मुखिया और पूर्व सीएम मायावती ने मीडिया के सामने आ कर हुंकार लगाई है। इतना ही नहीं एक तरफ उन्होंने जनता को साधने की कोशिश की तो साथ ही नगीना सांसद चंद्र शेखर आजाद पर भी तीखा कटाक्ष किया है। मायावती ने बाबा साहब अंबेडकर की विचारधारा का जिक्र करते हुए दलित समुदाय को जागरूक करने की कोशिश की और कहा कि बाबा साहब खुद कहते थे कि अगर निचली अदालत में न्याय नहीं मिलता तो खुद कानून हाथ में उठाने की जरूरत नहीं है.. उन्होंने आजाद पर निशाना साधते हुए कहा कि किसी नेता और पार्टी के उकसावे और बहकावे में आकर सड़को पर उतरने के बजाय सबकुछ संवैधानिक तरीके से मसले को सुलझायें। बसपा सुप्रीमो ने कहा कि बाबा साहब को खुद जातिवादी ताकतो का विरोध झेलना पड़ा था, लेकिन बावजूद इसके उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता औऱ दूरदर्शिता से एक ऐसा संविधान दिया जो वंचित लोगो को भी बराबरी की हक देता है। उनको मौलिक अधिकार देता है। वो यहीं नहीं रूकी, उन्होंने कहा कि आजकल कुछ संकीर्ण राजनीति का रास्ता अपना कर पीड़ितो को, उनके परिवार को भड़का कर गुमराह करते है, प्रदर्शन करवाते है, हिंसा अशांति औऱ अवरोध पैदा करते है, औऱ फिर पीड़ितो से मिलकर मगरमच्छ के आंसू बहा कर अच्छा ड्रामा करते है, जिससे उन्हें तो राजनीतिक लाभ मिल जाता है लेकिन क्या सच में पीड़ित परिवरा को या उस क्षेत्र को कोई मदद मिलती है या नहीं.. ये जानकारी कौन देगा। मायावती ने सीधे तौर पर आजाद की कार्यशैली को ढोंगपूर्ण करार दिया है। अब देखना ये होगा कि मायावती की बातों से क्या आजाद की लोकप्रियता पर कोई असर पड़ेगा।
राजस्थान में दलित शब्द को लेकर बड़ा फैसला
2, दलितो से जुड़ा अगला मामला राजस्थान से है, जहां अब राजस्थान पुलिस विभाग के लिए दलितो से जुड़े मामलों में और पारदर्शिता लाने के लिए नए आदेश जारी किये है। जी हां, सरकार के नए आदेश के बाद विभाग को प्रशासनिक और आधिकारिक शब्दावली में दलित शब्द का प्रयोग करने की मनाही हो गई है। यानि की अब से जब भी कोई सरकारी काम में दलित व्यक्ति का नाम होगा, तो उन दस्तावेजो में दलित शब्द का प्रयोग बैन हो गया है। उनकी जगह अब से विभाग अनूसूचित जाति या फिर स्केड्यूल कास्ट का इस्तेमाल करेंगे। ये आदेश केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय औऱ राजस्थान सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा एक साथ जारी किया गया। हालांकि आपको जानकर हैरानी होगी कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट और भारत सरकार ने 2015 में आदेश जारी किये था। जिसे अब राजस्थान में लागू किया गया है। सरकार का कहना है कि अनूसूचित जाति का प्रयोग करने से सरकारी कामकाज में पारदर्शिता आयेगी, संवैधानिक मर्यादा बरकरार रहेगा और स्थापित कानूनी नियमों के साथ भी कोई खिलवाड़ करने की कोशिश नहीं करेगा। इसी के साथ ये भी आदेश जारि किये गए है कि हिंदी औऱ अंग्रेजी भाषा के साथ साथ क्षेत्रिये भाषा का अगर ऑप्शन है तो दस्तावेजो को क्षेत्रिये भाषा में भी लिखा जाये ताकि उस उन दस्तावेजो को लेकर जिनके लिए तैयार किये गए है वो आसानी से समझ सकें। वैसे राजस्थान सरकार की ये पहल आपको कैसी लगी.. क्या दलितों के बजाय एससी इस्तेमाल करने कुछ बदलाव होगा।
सुल्तानपुर में बेटी पैदा होने से दलित महिला को घर से निकाला
3, दलितो से जुड़ा अगला मामला उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर से है, जहां एक तऱफ बेटियों को दहेज की आग में जला दिया जाता है, वहीं आज भी समाज में बेटी पैदा होने को श्राप माना जाता है, बेटी के जन्म देने वाली मां के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है जैसे बेटी जन्म दे कर उसने घोर पाप कर दिया.. जी हां, दिल को झकझोर देने वाला एक मामला सुल्तानपुर और अंबेडकरनगर के महरुआ थाना क्षेत्र की है, जहां बेटी पैदा होने के बाद एक दलित जाति से आने वाली महिला को उसके ससुरालवालों ने जातिसूचक गालियां देते हुए मारपीट करके घर से निकाल दिया.. जिसके बाद पीड़िता ने पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय में न्याय की गुहार लगाई है, उसने बताया कि 6 साल पहले उसकी मुलाकात जयसिंहपुर थाना क्षेत्र के दलईपुर (मोकलपुर) के रहने वाले अतुल कुमार तिवारी से हुई थी और दोनो के बीच प्रेम प्रंसंग शुरु हो गया था, दोनो ने तीन साल पहले गुजरात के सूरत में मंदिर में शादी भी कर ली थी। चुंकि ये एक इंटरकास्ट शादी थी तो अतुल के घरवाले उसे कभी दिल से स्वीकार नहीं कर पायें, वहीं 10 महीने पहले जब उसकी बेटी हुई तो उनका व्यावहार और खराब हो गया। यहां तक कि उसका पति भी उससे ठीक से पेश नहीं आता था। लेकिन 28 जून को दोपहर करीब 2 बजे न लोगो ने पीड़िता से बहस शुरु करनी शुरु कर दी, उसे जातिसूचक गालियां देने लगे औऱ मारपीट कर घर से निकाल दिया। पीड़िताने पुलिस से भी मदद मांगी लेकिन वहां भी निराशा हाथ लगी, जिसके बाद 10 जुलाई को उसने एसपी ऑफिस में अर्जी दी है। अब देखना ये होगा कि क्या यहां भी पीड़िता तो न्याय मिलता है या नहीं। या फिर यहां भी जातिवाद आड़े आ जायेगा।
शिक्षा मंत्राल ने एससी एसटी शिक्षकों को लेकर दी रिपोर्ट
4, दलितों से जुड़ा अगला मामला राजधानी दिल्ली से है, जहां से उच्च शिक्षा संस्थानों में एससी एसटी जाति के कोटा होने के बाद भी प्रयाप्त शिक्षकों की भर्ती नहीं होती है, जिसमें पुरुष शिक्षको से ज्यादा बुरी स्थिति तो एससी एसटी जाति से आनी वाली महिला शिक्षको के आकड़े चिंता देने वाले है। दरअसल अभी हाल ही में शिक्षा मंत्रालय के अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण यानि की All India Survey on Higher Education (AISHE) की एक रिपोर्ट आई है, जिसमें ये खुलासा किया गया है कि विश्वविद्यालयों में IIT और NIT जैसे संस्थानों में एससी एसटी वर्ग के आने वाले शिक्षको में बेहद कमी दर्ज की गई है। जी हां, आकड़े बताते है कि सभी उच्च संस्थानों को मिलाकर अनुसूचित जाति (SC) से केवल 10 प्रतिशत शिक्षक है तो वहीं अनूसूचित जनजाति से केवल 3 प्रतिशत आते है.. इतना ही नहीं हाल के कुछ सालों में एससी एसटी वर्ग की महिला शिक्षिकांओं में भारी कमी आई और ये आकड़ा 44 से घटकर 27 प्रतिशत ही रह गया। इसमें सबसे बुरी स्थिति उत्तर प्रदेश की है.. मंत्रालय ने ये रिपोर्ट 1,278 यूनिवर्सिटीज, 46,468 कॉलेजों और 11,787 इंडीपेंडेट संस्थानों के साथ मिलकर बनाई है। हैरानी की बात तो ये है कि सभी संस्थानों में एससी एसटी वर्ग के लिए पर्याप्त कोटा तय है लेकिन फिर भी जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के कारण जो आकड़े सामने आये है वो दर्शाते है कि केवल एससी एसटी छात्र ही नही, शिक्षक भी जातिगत भेदभाव औऱ उत्पीड़न से अछूते नहीं है। ऐसे में देखना ये होगा कि क्या सरकार कोई ऐसी रणनीति तैयार करेगी जिससे ये रिक्त स्थान भरे जा सकें.. औऱ साथ ही उचित कैंडीडेट को ही पद मिले।
भीम आर्मी चीफ ने फिर से लगाई हुंकार
5, दलितो से जुड़ा अगला मामला भीम आर्मी चीफ चंद्र शेखर आजाद को लेकर है, जिन्होंने मेरठ में दलित छात्रा ललिता गौतम की हत्या के बाद न्याय के लिए आवाज उठा रहे दलित संगठन पर पुलिस के व्यावहार और लाठीचार्च करके उन्हें गिरफ्तार करने को लेकर प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। आजाद ने सीधा मांग की है कि जिस पुलिस वाले के इशारे पर ये विभत्स हमला किया गया, उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए तो वहीं सभी गिरफ्तार बेगुनाग बहुजन भाईयो को बरी किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आखिर अपराध के लिए बहुजन लोगो को डिटेन किया गया है। संविधान सबके लिए समान है, लेकिन प्रशासन ने जानबूझ कर किसी के इशारे पर जातिगत मानसिकता को बढ़ावा देने वाला कृत्य किया है। आजाद ने कहा कि प्रशासन को माफी मांगने पड़ेगी अपनी हरकतों के लिए क्योंकि सम्मान तो बहुजनों का भी बहुत कीमती है। वहीं आजाद पर किये गए मायावती के कटाक्ष को लेकर भी दलित समुदाय ने तीखा पलटवार करते हुए कहा जुल्म के खिलाफ असली लड़ाई सड़को पर लड़ी जाती है, एसी कमरो में बैठ कर नहीं। और सही मायने में दलितो और वंचितो के खिलाफ अगर कोई आज के वक्त में लड़ रहा है तो वो आजाद ही है। आजाद जिस तरह के लोकप्रिय बन चुके है, कहीं न कहीं प्रतिद्वंदियो को डर सताने लगा है कि कहीं वो राजनीति से गायब ही न हो जायें।



